समाज कार्य शिक्षा में विश्वस्यापी मानदण्ड का उद्भव - Emergence of Universal Standards in Social Work Education
समाज कार्य शिक्षा में विश्वस्यापी मानदण्ड का उद्भव - Emergence of Universal Standards in Social Work Education
समाजकार्य शिक्षा में विश्वव्यापी मानदण्ड का उद्भव आई. ए. एस. एस. डब्ल्यू. IASSW एवं IFSW के संयुक्त प्रयास से व्यापक व गहन संचालन प्रक्रिया के फलस्कप हुआ। जिसके कारण वैश्विक स्तर पर ग्लोबल स्टैंडर्स फार द एजुकेशन एण्ड ट्रेनिंगऑफ द सोशल वर्क प्रोफेशन जैसे दस्तावेज का उद्भव हुआ। यह दस्तावेज कई स्थानों पर पूर्णत उपलब्ध व प्रकाशित है। सी पाउत ने विश्वव्यापी मानदण्डों की अधिकांश चुनौतियों के दस्तावेजीकरण के क्रम में इतनी स्पष्टव्याख्या की ताकि सदस्य देश सहमत हो जाए। इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यह वर्तमान स्तर का एक जटिल व भावात्मक दृष्टिकोण से बहस किए गए पहलुओं पर एक सहमति या समझौता है समाज कार्य के मानदण्ड के विकास कार्य को चुनौतीपूर्ण ढंग से दर्शाया गया है इसका कारण यह है कि स्वदेशीकरण विश्वव्यापकता तथा स सिद्धांतों को सांस्कृतिक नजरिए से समझा गया। विश्वासों एवं क्रियाकलापों की एक व्यवस्था जो विभिन्न स्तरों पर बोधगम्य हो तथा जिसमें कला, नैतिकता, नियम कानून तथा प्रचलित व्यवहार जो सामाजिक संस्कृति में निहित है इन सबको सम्मिलित रूप से संस्कृति के नाम से संबोधित किया जाता है।
राजनीतिक विचारधारा भी संस्कृति के अंतर्गत समाहित है। जिसके आधार पर कोई समूह या समुदाय अपने को राष्ट्र या राष्ट्र के नागरिक के रूप में परिभाषित करता है। संस्कृति यह पहचान का साधन बन गया है। सामाजिक संगठन की गतिशीलता को बनाए रखा है साथ ही साथ यह एक फ्रेमवर्क के रूप कार्य करता है एवं यह निर्णय करता है कि किसी विचार या क्रियाकलाप को स्वीकार किया जाए या उसको जोखिम समझा जाए। संस्कृति को समझना बहुत आसान है। संस्कृति एक स्थिर समझौता नहीं करने वाले गुणों, रीतिरिवाजों व क्रिया-कलापों का समूह है जो समुदाय को यह आदेश देता है किवह वैसा ही व्यवहार करे जैसा कि उनसे अपेक्षा की जाती हैं। संस्कृति समुदाय को एक सूत्र में बांधे रखती है।
फिर भी यह गतिशील है। समुदाय या समूह के विभिन्नसदस्य इस बार प्रभाव डालने एवं नियंत्रण करने के हेतु आपस में संघर्ष करते हैं
विश्वव्यापकता तथा स्वदेशीकरण की अवधारणा समाज कार्यशिक्षा को निर्देशित करने वाले सिद्धांतों को पहचानने एवं उस पर सहमत होने की प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं विश्व व्यापकता या सार्वभौमिकता को ऐसे उभयनिष्ट सामान्य सिद्धांतों की खोज करने वाले विचार के रूप में समझा जा सकता है जिसका सिद्धांत उसके सांस्कृतिक संदर्भों एवं मतभेदों को पाटते हुए स्वीकार करने योग्य होता हैं। इन तथ्यों को समझने व इससे अवगत होने के बाद सर्वव्यापी मूल्यों एवं लक्ष्यों से जुड़े समाज कार्य व्यवसाय के संबंध में बहस करना संभव हो गया है।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि स्वदेशीकरण की अवधारणा, वस्तुनिष्ठ विचारों को महत्वपूर्ण बनाने तथा किसी संस्कृति की विशेषताओं को जानने का अच्छा माध्यम हैं इसलिए समाजकार्य की प्रकृति एवं क्रियाकलाप को एक परिवेश से दूसरे परिवेश में आयतित करने की परिकल्पना को नए परिवेश के संदर्भ में उसकी महता का आलोचनात्मक परीक्षण किया जाता है। साथ ही उन राजनैतिक सिद्धांतों पर बल दिया जाता है जिसके तहत हम बाहरी या आयतित विचारों की उपयोगिता को देखते हुए उसे लागू करने का निर्णय करते हैं तब निश्चितप से यह ध्यान रखना चाहिए कि स्थानीय परिवेश के समाजकार्य शैक्षिक संस्थाएं एवं व्यासायी जन अपने विचारों के प्रति पूर्ण सम्मान के अधिकारी होते हैं।
गते का कहना है कि जब मानदण्ड या मानकों का हम विकास कर रहे होते हैं तब साम्राज्यवाद से संबंधित विचारों तथ्यों का विश्लेषण व मूल्यांकन करने के बाद ही उपरोक्त पहलुओं को संतुलित करने वाली चुनौतियों को अपेक्षाकृत अच्छे ढंग से समझ कर इन विचारों की ओर संकेतमिलता है कि यह एक ऐसी प्रवृत्ति है जो समाज कार्य के भिन्न स्थानीय व देशज सांस्कृतिक स्वरूप ऊपर पश्चिमी जगत के दृष्टिकोण का समर्थन करती हैं। मंडेल उल्लेख करते हुए कहते हैं कि भारत में समाज कार्य शिक्षा के उद्भव से संदर्भित उपरोक्त बातें हैं।
इस तरह यह निर्धारण अत्यधिक महत्व साथ किया कि भारतीय शोधकर्ताओं को ही प्रशिक्षक के रूप में अमेरिकी समाज कार्य शिक्षा का विकास करना पड़ा है यह 1947 ई. तक यानी स्वतंत्रता प्राप्ति तक माना जाता रहा। अमेरिकन पुस्तकों एवं जर्नलों में व्यापकरूप से भारतीय समाज कार्य शैक्षिक संस्थानों से संबंधित तथ्यों का उल्लेख एवं उपयोग किया गया। आईएफ. एस. डब्ल्यू तथा आई.ए.एस. एस. डब्ल्यू के सदस्यों ने इन अवधारणाओं को ध्यान में रखते हुए एक प्रारूप तैयार किया तथा समाजकार्य की अंतर्राष्ट्रीय परिभाषा को मूर्तरूप देने की कोशिश की। यह परिभाषा है.
समाजकार्य व्यवसाय सामाजिक परिवर्तन को बढ़ावा देता है मानवीय संबंधों से उत्पन्न समस्या का समाधान करता है तथा मानव कल्याण में बढ़ोतरी के लिए लोगों को सशक्त बनाता है तथा उनकी स्वतंत्रता का समर्थन करता है। समाजकार्य मानवीय व्यवहार एवं सामाजिक व्यवस्था से संबंधित सिद्धांतों का प्रयोग करते हुए उन बिंदुओं पर हस्तक्षेप करता है जहां लोग अपने आसपास की परिस्थितियों से संपर्क स्थापित करते हैं। मानवाधिकार व सामाजिक न्याय के सिद्धांत समाजकार्य के आधरभूत तत्व हैं।
उपरोक्त परिभाषा एवं समस्त कथन सिद्धांत आदि भविष्य में संशोधित एवं पूर्ण संशोधित होते रहेंगे और यह लंबे समय तक चलता रहेगा जब तक कि यह माना जाए कि अब इसका स्कप स्थाई हो गया है। उपरोक्त मानदण्ड समाजकार्य की विश्वव्यापी प्राथमिकताओं से संबंधित हस्तक्षेप पर विशेष बल देता है। तथा इसमें सम्मिलित विचार या दृष्टिकोण निम्नांकित विशेषताओं को संबोधित करते हैं सामाजिक समर्थन, विकासात्मक कार्य सुरक्षा कार्य सीमांत व्यक्ति तथा सामाजिक रूप से अलग-थलग पड़े लोग तथा दलित पीड़ित वर्ग के लोगों के लिए चिकित्सा संबंधी सुविधाएं मुहैया कराने का कार्य। उपरोक्त मानदण्डों के केन्द्रीय विषय में निम्नलिखित का समावेश हैं.
• कार्यक्रम के उद्देश्य व परिणाम
● संस्था का मुख्य उद्देश्य या शिष्टमण्डल का कथन।
• कार्यक्रम के पाठ्यक्रम (क्षेत्र कार्य के व्यावहारिक अनुभव के साथ)
• मुख्य पाठ्यक्रम
• प्रशिक्षित कर्मचारी
• संगठन प्रशासन अधिकार एवं संसाधन
• सांस्कृतिक एवं सैद्धांतिक विविधता एवं लैंगिक समानता।
समाज कार्य के आचार संहिता तथा मूल्यों को मुख्य पाठ्यक्रम के निर्धारण में शैक्षिक संस्थानों को उन तत्वों या तरीकों की पहचान करनी चाहिए जो स्थानीय क्षेत्रीय राष्ट्रीय एवं अन्तराष्ट्रीय स्तर के प्राथमिकताओं के प्रति सम्मानजनक दृष्टिकोण रखते हैं। समाज कार्य शिक्षा के विश्वव्यापी मानदण्डों के निर्धारण में चार संकल्पनात्मक क्षेत्र निम्न हैं
• समाजकार्य व्यवसाय में मानव व्यवहार व सामाजिक वातावरण का विकास सम्मिलित है।
● समाजकार्य शिक्षा को मानवीय क्रिया कलाप विकास एवं संस्कृति सामाजिक मान्यताएं, धर्म तथा रीति-रिवाज प्रत्येक स्तर पर कैसे प्रभावित करते हैं।
• समाजकार्य व्यवसायी या अभ्यास कर्ता वैसे व्यक्तियों के विकास पर बल देता है जो सूक्ष्मता से अपने विचारों का परीक्षण करने वाला तथा परीक्षणी अभ्यास कर्ता हो यह व्यवसाय आधारित मूल्यों तथा कार्यरत कर्मचारियों के कल्याण व दक्षता के विकास पर बल देते हुए उनको भी उत्तरदायित्व सौंपने की मानसिकता रखते हुए समाज कार्य व्यवसाय का संचालन करते हैं।
• कार्यकुशलता, अनुमान लगाने की योग्यता संबंध स्थापित करने तथा सहायता करने का गुण शोध एवं सेवाकार्य का समर्थन मान सम्मान का आदान प्रदान व्यवस्था से भिन्नमेल-मिलाप, किसी को समर्थन या वकालत का गुण क्षमता निर्माण एवं सशक्तिकरण पर ध्यान, सभी मनुष्य की योग्यता प्रभाव तथा उपयोगिता की स्वीकार्यता आदि समस्त गुण समाजकार्य के क्रिया कलाप के अंतर्गत सम्मिलित है।
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