हिंदू धर्म और समाज कार्य - Hinduism and Social Work
हिंदू धर्म और समाज कार्य - Hinduism and Social Work
हिंदू दर्शन और परंपरा में सेवा तथा करुणा की भावना काकाफी महत्व है। हिंदू अवधारणाओं में इस तथ्य पर जोर दिया गया है कि व्यक्ति का अपना कल्याण दूसरों के कल्याण से जुड़ा है। व्यावसायिक समाज कार्य की तरह हिंदू दर्शन भी इसमें विश्वस करता है कि जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में मनुष्य बदल सकते हैं और बदलते भी हैं। धर्म की अवधारणा और पालन का घनिष्ठ संबंध सामाजिक कार्यप्रणाली की अवधारणा से है। जीवन की किसी भूमिका में किसी विशिष्टस्थिति में हमसे जो अपेक्षित है उसे करने को उसे अच्छी तरह से भरने और उससे संतोष प्राप्त करने को मानसिक कल्याण का आधार माना गया है। तो सामाजिक कार्य के निष्पादन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटक कार्यकर्ता और व्यावसायिक सहायता के इच्छुक व्यक्ति का परस्पर संबंध है। समाज कार्य के विभिन्न सिद्धांतों में स्वीकृति का सिद्धांत सर्वाधिक बुनियादी सिद्धांत है और इसे लगभग एक परम मूल्य ही माना जाता है। मनुष्य की दिव्यता में हिंदू धर्म का विश्वास उसे इस सिद्धांत के अनुकूल बनाता है। समस्तमनुष्य आत्म प्रत्यक्षीकरण के प्रयास में लगे हैं, इस मान्यता के कारण तथाकथित गंभीर अपराधियों के प्रति भी अनिर्णयात्मक मनोवृति बनाकर रखना संभव हो पाता है। हिंदू शास्त्रों में ऐसे अपराधियों के अनेक उदाहरण मिल जाते हैं जिन्हें इसलिए मुक्ति मिल गई क्योंकि सभी में वास करने वाले ईश्वर को पतितपावन के रूप में देखा जाता है अर्थात गिरे हुओं को मुक्त करने वाला हिंदू धर्म में जीवन का लक्ष्यपरमात्मा में विलीन होना समझा जाता है, इसलिए क्षमा और करुणा के गुणों को ईश्वरीय माना जाता है। इस तरह व्यक्ति में इन गुणों का विकास वांछनीय होता है। अहिंसा के पालन में सुधार के आकाक्षी क्ति के प्रति घृणा अथवा दोषारोपण का अभाव होता है। गीता में नियंत्रित भावनात्मक आसक्ति के सिद्धांत की पर्याप्त व्याख्या की गई है। ‘स्थितप्रज्ञ और धीर व्यक्ति वह है जिसने उच्च भावनात्मक स्थिरता प्राप्त कर ली है, जिसमें स्पष्ट बोध है और उच्च स्तर की आत्म चेतना है, जो सामाजिक चेतना से युक्त है, और जो अनासक्त रहते हुए अपने सहचर प्राणियों के प्रति करुणा का भाव रखता है।
समाज कार्य में कार्यकर्ता-सेवार्थी संबंध में अंतर्निहित सत्ता और अधिकार पर बाम्बार आलोचनात्मक ढंग से विचार किया गया से सेवार्थी अपने आपको अकिंचन समझता है और कार्यकर्ता को ऐसा विशेषज्ञ मानता है जो उसकी सहायता करने में सक्षम है और जिसके नियंत्रण में आवश्यक संसाधन हैं। हिंदू शास्त्र मानते हैं कि देने वाला दाता' लेने वाले से बढ़ कर नहीं होता। देने वाले और लेने वाले दोनों एक ही ईश्वर काम करता है। देने वाले को तो बल्कि आभार मानना चाहिए कि लेने वाले ने उसे एक अवसर दिया है कि वह नेक काम के लिए पुण्य कमा सकता है। समाज कार्य में मनुष्यों के सम्मान को जो अनिवार्य मूल्य माना जाता है, वह वास्तव में हिंदू धर्म में प्रमुख विश्वास है यह विश्वास तो आत्मा की अवधारणा से निकला है कि व्यक्ति की वास्तविक पहचान शारीरिक तथा सामाजिक गुणों से नहीं बल्कि उसकी दिव्यता से निश्चित होती है। सभी मनुष्यों का सम्मान होना चाहिए क्योंकि उन सभी में वही आत्मा वास करती है। मनुष्यों के जन्मजात सम्मान को मान्यता देना हिंदू दर्शन का अनिवार्य तत्व है। स्वामी विवेकानंद के शब्दों में, 'मनुष्य में आस्था रखो, चाहे वह तुम्हें अत्यंत विद्वान लगे अथवा अत्यधिक अज्ञानी मनुष्य में आस्था रखो, चाहे वह देवदूत जैसा दिखाई दे या फिर शैतान जैसा (द कॉमन बेसेज़ ऑफ हिंदुज्म) |
समाज कार्यकर्ताओं ने कमियों( अभाव) अथवा समस्याओं पर ध्यस केंद्रित करने के बजाय जिस शक्ति परिप्रेक्ष्य पर जोर देना शुरू कर दिया है वह हिंदू धर्म में लगभग अनायास ही उभर आता है समस्त मनुष्यों में आत्म सिद्धि की जन्मजात शक्ति और प्रवृत्ति होती है। आध्यात्मिक गुरुओं का आग्रह यह रहता है कि समस्त मनुष्यों के आंतरिक संसाधनों को बाहर लाया जाए। शुरूआत उससे की जाए जो प्रत्येक मनुष्य के पास है, इसे उजागर करने से नहीं कि उसके पास क्या नहीं है। व्यक्ति दिशाहीन हो गयाहै, वह भावनात्मक रूप में विचलित है और अपने धर्म के पालन में असमर्थ है- इस वास्तविकता को मायावी संसार में जीवन की प्रकृति से ही बखूबी समझा जा सकता है। किंतु जिस व्यक्ति को सहायता की दरकार होती है वह पूरे तौर पर असहाय नहीं होता। जन्मजात योग्यता की अवधारणा से आत्म सहायता और आत्म निर्धारण के सिद्धांतों की पुष्टि भी होती है। कार्यकर्ता प्रमुख तौर पर सेवार्थों को इस योग्यबनाता है कि वह अपने आंतरिक और बाह्य संसाधनों को जुटा सके और वह इस प्रक्रिया को सुविधाजनक भी बनाता है। समाज कार्य की एक बहु-प्रचलित परिभाषा-समाज कार्य लोगों की मदद करता है इस बात की पुष्टि करती है सेवार्थी को अपनी स्वयं की बदलाव संबंधी प्रक्रिया का स्वामी बनना होता है। कर्म के नियम से युक्त पुनर्जन्मकी अवधारणा यह कहती है कि प्रत्येक मनुष्य में एक समान दिव्य ज्योति होने के बावजूद वह एक अद्वितीय नियति लेकर पैदा होता है। यह उस व्यावसायिक धारणा के अनुकूल है कि प्रत्येक व्यक्ति अद्वितीय होता है। इस तथ्य के बावजूद कि उसमें और उसके सामाजिक समूह में कुछ आम चारित्रिक विशेषताएँ एक जैसी होती है।
समाज कार्य स्वयं का विकास व्यावसायिक समाज कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण का अल्म महत्वपूर्ण अंग है। समाज कार्यकर्ता कुछ धारणाओं में विश्वा करना सीखता है, जैसे कि प्रत्येक मनुष्य अद्वितीय होता है; वह कुछ अनिवार्य मूल्य और कुछ महत्वपूर्ण गुण अपने अंदर विकसित करता है जैसे कि करुणा, नियंत्रित भावनात्मक आसक्ति, समस्त मनुष्यों के प्रति सम्मान आदि; वह उच्च स्तर की आत्म चेतना अर्जित करता है, भावनात्मक स्थिरता प्राप्त करता है; दूसरों की सहायता करता है सामाजिक विवेक के प्रति संवेदनशील नागरिक बनता है आत्म-सिद्धि की ओर लगातार प्रयास करता है, और अंतत एक आदर्श बन जाता है। गीता में विहित निष्काम सेवा के आदर्श का मतलब मुफ्त काम करना नहीं होता इसका मतलब होता है अपने फायदे या प्रशंसा से मुक्तहोका काम करना। इसका मतलब होता है करुणा के साथ किंतु अनासक्त होकर काम करना और सहायता के आकांक्षी व्यक्ति पर अपनी इच्छा अथवा अपने विचार न थोपते हुए उसे मुक्त होकर उसके अनुसार क्रिया करने देना। कार्यकर्ता एक श्रोता एक सामथ्र्यदाता, एक सहायक की भूमिका निभा सकता है अथवा सक्रिय रूप में एक शिक्षक, समन्वयक, मध्यस्थ, अथवा पक्ष समर्थक का काम भी कर सकता है; किंतु अधिकतर वह एक उत्प्रेक काम करता है और केवल एक व्यावसायिक कार्यकर्ता होकर ही बदलाव करता है। वास्तव में, भारत में समाज कार्यकर्ता को लोग ईश्वर की तरह मानते हैं, चाहे उसके व्यक्तिगत आध्यात्मिक तथा धार्मिक विश्वास कुछ भी हो। समाज कार्यकर्ताओं को सामाजिक कार्यकर्ताओं के रूप मैजिम्मेदार माना जाता है कि वे एक उच्च सत्ता की मानवजाति की एक लगभग सार्वभौमिक छवि के अनुसार व्यवहार करें।
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