एशिया में समाज कार्य का इतिहास - History of Social Work in Asia
एशिया में समाज कार्य का इतिहास - History of Social Work in Asia
एशिया में समाज कार्य को मुख्य रूप से 4 भागों में बांटा जा सकता है जिसके अंतर्गत दक्षिण एशिया दक्षिण पूर्व एशिया पूर्व एशिया तथा मध्य एशिया है और इस विभाजन के अनुसार इनमें आने वाले देशों की संख्या काफी अधिक है इनमें से कुछ प्रमुख देशों की चर्चा की जा रही है। एशिया के इन देशों में समाज कार्य का उद्भव और विकास किस प्रकार से हुआ है इन सब देशों के बारे में विस्तृत चर्चा आगे की जाएगी।
सबसे पहले दक्षिण एशिया में समाज कार्य कहाँ से प्रारंभ हुआ और इसका विकास कैसे हुआ इसकी वर्तमान स्थिति क्या है? इस संबंध में चर्चा की जा रही है.
दक्षिण एशिया
दक्षिण एशिया के देशों में पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, भारत, नेपाल, भूटान तथा मालदीव को सम्मिलित किया जाता है। इन तमाम देशों में अन्य यूरोपीय देशों की भाँति ही समाज कार्य का प्रादुर्भाव हुआ और विकास होता गया। दक्षिण एशिया के इन देशों में समाज कार्य के विकास का वर्णन प्रस्तुत किया जा रहा है। बांग्लादेश
बांग्लादेश में समाज कार्य का प्रारंभ पाकिस्तान के शासन के दौरान हुआ और आ समय बांग्लादेश में समाज कार्य नये रूप में उभर कर सामने आया। 1950 के दशक के प्रारंभ में तीव्र औद्योगीकरण, नगरीकरण, मलिन बस्ती क्षेत्रों का तीव्र विकास होने के कारण अनेक मनोसामाजिक तथा आर्थिक समस्याएँ जन्म ले रही थी। इस समय ही समाज कार्य ने अपनी महती भूमिका अदा की। समाज कार्य अध्ययन के लिए संस्थान की आवश्यकता तथा संभावना को ध्यान में रखते हुए सर्वप्रथम 1957 में ढाका विश्वविद्यालय में एक समाज कार्य विद्यालय प्रारंभ करने का एक प्रस्तय किया गया। संयुक्तराष्ट्र विशेषज्ञ डॉ. मूरे ने समाज कल्याण मुद्दों के साथ कार्य किया और बांग्लादेश में व्यावसायिक समाज कार्य की वकालत भी की। आगे चलकर उन्हीं के प्रयासों से केंद्रीय तथा साथ ही प्रांतीय सरकार ढाका विश्वविद्यालय में एक समाज कार्य विद्यालय स्थापित करने के लिए सैद्धांतिक रूप से सहमत हो गए किंतु समाज कल्याण पर अधिक महत्व देने से असहमत थे। अनेक प्रयासों के परिणामस्वरूप 9 फरवरी 1973 को ढाका विश्वविद्यालय द्वारा एक महाविद्यालय स्थापित किया गया जो कि समाज कल्याण तथा शोध के क्षेत्र में कार्यरत है। ढाका विश्वविद्यालय स्थित समाज कल्याण तथा शोध संस्थान समाज कार्य में त्रिवर्षीय बी.ए. ऑनर्स उपाधि तथा समाज कल्याण में द्विवर्षीय एम. ए. उपाधि पाठ्यक्रम संचालित करता है। इसके अतिरिक्त राजशाही विश्वविद्यालय के अंतर्गत समाजकार्य महाविद्यालय भी समाज कार्य में ऑनर्स उपाधि संचालित करता है। (हुसैन, 1999) श्रीलंका
श्रीलंका में व्यावसायिक समाज कार्य की वृद्धि तीन मुख्यकारणों से अत्यधिक धीमी गति से चल रही है। प्रथम कारण राजनीतिक वैचारिक दर्शन है। राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत श्रीलंका एकलोक कल्याण राज्य घोषित किया गया। इसने तब आर्थिक समानता और सामाजिक न्याय को प्राप्त करने पर बल दिया और इसके फलस्वरूप सार्वभौमिक कल्याण सेवाएं देना प्रारंभ किया। 1978 में नवीन आर्थिक नीति को अपनाया गया, इसके बावजूद भी शिक्षा तथा स्वास्थ्य देखभाल पर अत्यधिक व्यय हुआ। इसका परिणाम यह हुआ कि राज्य के द्वारा नवीन नीतियों को अनुमति नहीं दी गई और समाज कल्याण कार्यक्रमों को रोक दिया गया, जिससे समाज कार्य के क्षेत्रों में विकास नहीं हो सका।
श्रीलंका में समाज कार्य प्रक्रिया के धीमी गति से चलने का दूसरामुख्य कारण धर्ममूलक समाज रहा है। श्रीलंका में मुख्यरूप से तीन प्रकार के धार्मिक समूह निवास करते हैं प्रथम हिंदू द्वितीय मुसलमान और तृतीय बौद्ध। ये समूह अपनी परंपराओं एवं संस्कृ पर विश्वास करते हैं तथा उसी के आधार पर अपना कार्य करते हैं। इन सभी धर्मों में दान-देना या निर्धन की सहायता करना या मानव सेवा करना प्रारंभ से ही एक सदाचार माना जाता है। ये लोग प्रतिदिन किसी न किसी रूप में समाज के जरूरतमंद व्यक्तियों हेतु कार्य करते रहते हैं। इसी कारण से लोग समाज कार्य को अलग से कोई विधा नहीं मानते हैं। तीसराजो प्रमुख कारण रहा है उसमें परंपरागत पारिवारिक प्रणाली है जिसके माध्यम से महिलाओं, बच्चों, विधवाओं, अक्षमों, वृद्धों, निर्धनों आदि का समाज में कार्य करने हेतु प्रारंभ से ही सक्षम बनाया जाता है। (रणवीरा, 2005)। श्रीलंका में स्वतंत्रता के पश्चात समाज सेवा विभाग, ग्रामीण विकास विभाग, परिवीक्षा विभाग तथा कुछ स्वैच्छिक संगठनों ने भी समाज के विकास हेतु कार्य किया हैं।
श्रीलंका में व्यावसायिक समाज कार्य शिक्षण की दिशा में प्रथम प्रयास 1952 में किया गया जब सिलोन इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल वर्क की स्थापना की गई जिसका मुख्य उद्देश्य सरकार तथा स्वैच्छिक संगठनों में कार्यरत समाज कल्याण कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण प्रदान कराना था। तत्चात् 1964 में इसका पुनर्निमाण किया गया। इसके साथ-साथ विद्यालय द्वारा 1978 में पहली बार समाज कार्य में द्विवर्षीय समाज कार्य पाठ्यक्रम प्रारंभ किया गया। आगे चलकर संसद द्वारा इसे अधिनियम संख्या के तहत 1992 में मान्यता प्रदान की गई और यह संस्थान नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल डवलपमेंट के नाम से स्थापित किया गया। वर्तमान समय में संस्थान के द्वारा समाज कार्य में डिप्लोमा पाठ्यक्रम, परामर्शन में डिप्लोमा पाठ्यक्रम इत्यादि संचालित किए जा रहे हैं।
भारत में यदि हम समाज कार्य के संदर्भ में अध्ययन करते हैं तो स्पष्ट होता है कि इसका इतिहास प्राचीन है। आदिकाल में भारत में यदि हम समूह कार्य के संदर्भ में अध्ययन करते हैं तो स्पष्ट होता है कि इसका इतिहास प्राचीन है। आदिकाल में समूह कार्य के कुछ हिस्से नजर में आते हैं इसके बाद मध्ययुगीन काल में समूह कार्य को स्पष्ट देखा जा सकता है। आधुनिक काल में समाज कार्य में कार्यक्रमों एवं अन्वयन में अंतर स्पष्ट होता है। समाज कार्य को समाज कार्य की एक प्रणाली के रूप में जाना जाता है। आधुनिक समाज में समाज कार्य को व्यावसायिकता के क्षेत्र से भी जोड़कर देखा जा रहा है, जिसकी उत्पत्ति वर्तमान में ही हुई है। आदिकाल और आधुनिक काल में जो समाज कार्य की स्थिति थी, को निम्न बिंदुओं के माध्य से समझा जा सकता है
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