इस्लाम धर्म एवं समाज कार्य - Islam Religion and Social Work

इस्लाम धर्म एवं समाज कार्य - Islam Religion and Social Work

इस्लाम के वर्तमान स्वरूप का उद्भव अरब में सातवीं शताब्दी ईसवी के प्रारंभ में हुआ। भारतीय उपमहाद्वीप में इसे लाने वाले पहले तो समुद्र के रास्ते व्यापार करने वाले वे अरब मुलमान थे जो उत्तर केरल के मालाबार तट पर बस गए। धीरे-धीरे इस धर्म को स्वीकार किया जाने लगा और यह उपमहाद्वीप के कोने-कोने तक फैल गया। इस्लामी दर्शन में मनुष्य कोई पूर्व नियत जीव नहीं है। कुरान की विभिन्न आयतों में मनुष्य को एक लक्ष्य के साथ जीवन जीने की सलाह दी गई है। कुरान कहता है कि प्रत्येक व्यक्ति को स्वभाव और क्षमताएँ दी गई हैं, और एक तरह का आंतरिक निर्देश और जन्मजात मार्ग दर्शन भी। यह उस पर निर्भर करता है कि वह अपना विकास किस रूप में करें। समाज कार्य में अहस्तक्षेप के सिद्धान्त को स्वीकार नहीं किया जाता। अमीर अथवा ताकतवर लोग अनिवार्यतः 'सक्षम नहीं होते, और गरीब अथवा कमजोर लोग अनिवार्यतः 'अक्षम नहीं होते। समाज कार्य का अभिप्राय समाजीकृत व्यक्तिवाद होता है। इस्लाम मानता है कि ऐसे अनेक व्यक्ति हैं जो अनेकानेक समस्याओं का सामना करते हैं और बिना मदद के इन समर (छल) समाधान नहीं किया जा सकता और न ही उनसे बचा जा सकता है। उन्हें जानकार और अनुभवी व्यक्तियों की सहायता की जरूरत होती है।






समानता और न्याय की अवधारणाओं के बावजूद आबादी का एक तबका वंचित अथवा हाशिए पर रहा। जाता है। उन्हें निश्चय ही अधिकार है कि सम्पन्न तबके के लोग उनकी ओर ध्यान दें। उनकी कमाई में उन लोगों का भी हिस्सा है जो मदद मांगते हैं और वंचित है। कुरान में सभी विश्वासियों से कहा गया है कि वे जरूरतमंदों और गरीबों को खेरात (दान), सदका (प्रियजनों के कल्याण के लिए खैरात), फितरा (रमजान के लिए धन्यावाद ज्ञापन का दान) और जकात (मुसलमान की सालाना बचत का चालीसवाँ हिस्सा जो नगद या किसी वस्तु के रूप में हो सकता है। करें। दरअसल जकात उन पाँच आदेशों में से एक है जिसका पालन प्रत्येक मुसलमान को करना होता है। यहाँ यह समझना जरूरी है कि इस्लामी परोपकार भीख माँगने को प्रोत्साहित नहीं करता है या 'सामाजिक परजीवी' पैदा करता है। इस्लाम यह बताता है कि कौन लोग 'खैरात', 'फितरा और जकात' पाने के हकदार हैं और कौन नहीं।





इस्लाम में यह भी बताया गया है कि इन तरह-तरह के दान का इस्तेमाल किन उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है और किनके लिए नहीं। उदाहरण के तौर पर, इनमें से किसी का भी उपयोग मस्जिद बनाने या उसके लिए सामान जुटाने के लिए नहीं किया जा सकता। इसके अलावा, पैगम्बर ने यह भी कहा है कि अगर देने वाले को पता हो कि देने में कितना सवाब (भलाई) होता है, तो वह कभी भिखारी को मना नहीं करेगा, और अगर भिखारी को यह पता हो कि भीख माँगने में कितनी बुराई या नुकसान है तो वह भीख के लिए कभी हाथ नहीं फैलाएगा। इस्लाम में सामाजिक रूप में विकलांगों तथा वंचितों को सरकारी मदद की व्यवस्था की अवधारणा प्रस्तुत की गई और उसे व्यावहारिक रूप दिया गया है। इन लोगों को उनकी जरूरतों के अनुसार बैत-उल माल अथवा सरकारी खजाने से मदद देने का प्रावधान है।