व्यावसायिक समाज कार्य के सिद्धांत - Principles of Professional Social Work
व्यावसायिक समाज कार्य के सिद्धांत - Principles of Professional Social Work
व्यावसायिक समाज के कुछ विशिष्ट सिद्धांत होते हैं जिनकी सहायता से व्यावसायिक कार्यकर्ता अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है। व्यावसायिक समाज कार्य के अंतर्गत निम्न सिद्धांतों का उपयोग किया जाता -
स्वीकृति का सिद्धांत (Principle of Acceptance)
समाज कार्य में स्वीकृती के सिद्धांत से तात्पर्य सेवार्थी व कार्यकर्ता के मध्य एक आपसी सहमति से होता है। इस सिद्धांत का सर्वप्रमुख उद्देश्यहोता है कि कार्यकर्ता सेवार्थी हो जैसा । है वैसे ही रूप में स्वीकार करे, उसे बदलने का प्रयास न करे जब कोई समस्या ग्रस्त व्यक्ति किसी कार्यकर्ता के पास जाता है तो उसका व्यवहार असामान्य असामाजिक या हास्यास्पद हो सकता है। परंतु कार्यकर्ता को उसे वैसे ही स्वीकार करना चाहिए जैसे वह है। स्वीकृति समाज कार्य में सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है। प्रत्येक समाज कार्यकर्ता इस शब्द के महत्व से अवगत होता है तथा समाज कार्य में जहाँ पर कार्यकर्ता की सफलता संबंध की प्रकृति पर निर्भर है, स्वीकृति सिद्धांत का विशेष महत्व है। समाज कार्य में सेवार्थी जैसा है उसे उस रूप में, अपनी शक्तियों तथा सीमाओं के साथ संभावनाओं तथा दुर्बलताओं सकारात्मक तथा नकारात्मक भावनाओं के साथ स्वीकार करने के लिए मार्गदर्शित करती है। समाज कार्य में स्वीकृति को जीवन की गुणवत्ता पेशेवर अभिवृत्ति केंद्रीय गत्यात्मकता तथा एक सिद्धांत से संबद्ध किया जाता है। समाज कार्य में स्वीकृति शब्द को स्पष्ट करने का प्रयास कुछ विद्वानों ने किया है।
वे निम्न प्रकार से हैं.
रेनोल्ड, वेदथा सी के अनुसार जब हम सेवार्थी को जैसा है, वैसा समझ लेते हैं तथा मानव साथी के रूप में उनका सम्मान करते हैं तो हम सेवार्थी को स्वीकृति प्रदान करते हैं। कार्यकर्ता सेवार्थी को जैसा है, वैसा ही समझने का प्रयास करता है। वहीं प्रत्यक्षीकृत करना चाहता है तथा उन्हीं गुणों को समझना चाहता है। इसी आधार पर वह सेवार्थों के साथ संबंध स्थापित करता है। इससे तात्पर्य है कि सेवार्थी में वास्तविकता का जितना विघटन हो, सेवार्थों का प्रत्यक्षीकरण भिन्न हो तथा मूल्यों में कितना भी अंतर क्यों न हो, हम उसे वैसा ही स्वीकार करते है, जैसा वह अपने को प्रदर्शित करता है। इससे यह तात्पर्य नहीं कि. सेवार्थी में सुधार या परिवर्तन की आशा नहीं जाती है, बल्कि इसका तात्पर्य यह होता है कि सहायता की कला स्वीकृति तत्व पर आधारित है और वहाँ से प्रारंभ की जाए तो विशेष लाभकारी सिद्ध होगी। समाज कार्य का दृढ विश्वास है कि सेवार्थी के स्तर से ही कार्य प्रारंभ होना चाहिए जिससे सफलता प्रत्येक स्तर पर मिलती है। इस अर्थ में स्वीकृति व्यावसाविक मनोवृत्ति का एक सिद्धांत है। स्वीकृति के निम्न लिखित अंग है
1. सम्मान करना (Respecting )
2. प्रेम करना (Loving)
3. चिकित्सात्मक समझ (Therapeutic Understanding)
4. प्रत्यक्षीकरण (Perception)
5. सहायता (Helping)
6. प्राप्त करना (Receiving)
स्वीकृत क्रिया तीन प्रकार की होती है
1. प्रत्यक्षीकरण
2. उपचारात्मक
3. समक्ष
सेवार्थी की स्वीकृति का तात्पर्य निम्नलिखित बातों से हैं।
1. मानव के रूप में उसकी एकता, क्षमता, योग्यता में विश्वास
2. व्यक्ति के रूप में जैसा है वैसा तथा सीमाओं सहित स्त
3. मनोवृत्ति तथा व्यवहार असहयोगपूर्ण होने पर भी उसको स्वीकार करना।
4. उसकी वास्तविक क्षमताओं को स्वीकार करना।
5. सेवार्थी के रूप में उसे मनाना तथा अपनी भावनाओं एवंचियों पर नियंत्रण लगाना।
सकारात्मक तथा नकारात्मक भावनाओं की स्वीकृति।
स्वीकृति सिद्धांत की सीमाएँ
'मानव व्यवहार की सीमित जानकारी।
वैयक्तिक कार्य का सेवार्थी की स्थिति के बारे में निर्णायक हो जाना।
स्वीकृति तथा मंजूरी के बीच भ्रम
सेवार्थी के लिए सम्मान में कमी
अनिर्णायक मनोवृत्ति का सिद्धांत
समाज कार्य की यह दृढ धारणा है कि व्यक्ति में आत्म-निश्चय की अंतर्भूत क्षमता होती है। इसी प्रत्यय के आधार पर समाज कार्यकर्ता सेवार्थी को अपना मार्ग स्वयं निश्चित करने के लिए प्रोत्साहित करता है। सेवार्थों को अपनी रुचि के अनुसार वैयक्तिक समाज कार्य प्रक्रिया में भाग लेने की पूरी स्वतंत्रता होती है। उसके अधिकारों तथा आवश्यकताओं को महत्व दिया जाता है। कार्यकर्ता सेवार्थी की आत्म निदर्शक क्षमता को तीन करता है तथा संस्था में उपलब्ध साधनों का ज्ञान कराता है। वैयक्तिक समाज कार्यसंबंध का यह विशिष्ट गुण है। कार्यकर्ता इसकी मनोवृत्ति को अपनाता है। इस मनोवृत्ति के आधार वैयक्तिक सेवा कार्य का दर्शन है कि व्यक्ति का समस्या उत्पन्न करने में कोई दोष नहीं है या वह अपराधी नहीं है, बल्कि परिस्थितियों इसके लिए उत्तरदायी हैं। यह व्यक्ति की मनोवृत्ति स्तर तथा क्रिया प्रतिक्रिया के कार्यों को महत्व देता है।
'निर्णय' का तात्पर्य व्यक्ति को किसी कार्य के लिए उत्तरदायी या उसकी अज्ञानता को निश्चित करने से होता है। यह एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा सेवाब को आरोपित करना तथा उसे उसके जीवन की समस्याएँ उत्पन्न करने के लिए जिमेदार ठहराना होता है। जैसे एक महिला तनाव व हताशा के लक्षण दर्शाती अपनी बेटी के लिए सहायता मांगने के लिए एक बाल मार्गदर्शक क्लिनिक से संपर्क करती है। इस मामले में निर्णायक होने का अर्थ माँ पर बेटी की स्थिति के लिए आरोप लगाना होगा। वैयक्तिक सेवा कार्य में भी निर्णय का यह अर्थ लिया जाता है। अर्थात सेवार्थी पर दोषरोपण मौखिक या अन्य किसी प्रकार से करना, जिससे वह अपनी समस्या के लिए स्वयं सहायता कर सके। सेवार्थी की सहायता करने में यद्यपि उसकी असफलताओं तथा कमियों को जानना आवश्यक होता है। सेवार्थी की सहायता करने, समुदाय के स्त्रोतों का उपयोग करने, आंतरिक क्षमताओं में समस्या समाधान के लिए वृद्धि करने उचित समायोजन प्राप्त करने, व्यक्तित्व का विकास वृद्धि करने के लिए वैयक्तिक कार्यकर्ता को सेवार्थी तथा उसकी समस्या दोनों समझना होता है। सहायता को प्रभावपूर्ण बनाने के लिए आवश्यक होता है कि वैयक्तिक कार्यकर्ता सेवार्थी की समस्या के कारणों को जाने इस प्रक्रिया में वैयक्तिक कार्यकर्ता सेवाध पर न तो दोषारोषण करता है न ही उसे अपराधी बताता है और न ही उसे समस्या उत्पन्न करने का कारक निश्चित करना है।
सेवार्थी आत्मनिश्चय का सिद्धांत
समाज कार्य के व्यवसाय का एक सबसे ठोस विश्वास यह है कि व्यक्ति में आत्म निश्चिय की अंतर्निहित क्षमता होती है। कार्यकर्ता द्वारा सेवा समूह समुदाय की स्वतंत्रता का जानबूझकर उल्लंघन करने को गैर पेशेवर समझा जाता है, क्योंकि यह सदस्यों के प्राकृतिक अधिकार का हनन करता है और समाज कार्य प्रक्रिया उपचार को बाधित करता है।
प्रत्येक मानव की तरह सेवार्थी को भी अपनी क्षमता का विकास करने का अधिकार होता है। उसका अपने उद्देश्यों को पूरा करने का उत्तरदायित्व के साथ अधिकार जुड़ा होता है अत: सेवार्थी समूह समुदाय को अपना मार्ग चुनने तथा उद्देश्य प्राप्त करने के साधन निश्चित करने का अधिकार भी होता है। सेवार्थी समूहसमुदाय यद्यपि परेशान, हताश तथा हतोत्साही होता है, परंतु वह अपनी स्वतंत्रता तथा अधिकार नहीं खोना चाहता है। वह संस्था में सहायता तथा सहयोग के लिए आता है। वह कार्यकर्ता को सहायता प्रदान करने वाला तथा समस्या समाधान करने की विधि बनाने वाला मानता है। कार्यकर्ता से आशा करता है कि समस्या समाधान के साधन तथा स्रोत बताए उसकी क्षमता में ज्ञान प्रदान करके सहायता करे। सामाजिक उत्तरदायित्व सांवेगिक समायोजन तथा व्यक्तित्व विकास तभी होता है, जब व्यक्ति को अपना निर्णय लेने तथा विकल्प चुनने की स्वतंत्रता होती है।
वैयक्तिक कार्यकर्ता इस तथ्य को पूरी तरह से समझता है तथा सेवार्थी अपना निर्णय लेने की स्वतंत्रता देता है। • गोपनीयता का सिद्धांत समाज कार्य मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं में विभिन्नतरीके उपयोग में लाए जाते हैं। जीवन के बहुत से पहलू ऐसे होते हैं, जिनमें व्यक्ति बहुत ही गोपनीयता रखता है। गोपनीयता सिद्धांत को दो रूपों में देखा जा सकता है.
• व्यावसायिक आचार संहिता के रूप में
• वैयक्तिक सेवा कार्य संबंध के तत्व के रूप में।
गोपनीयता का अर्थ सेवार्थी की उन गोपनीय सूचनाओं से हैजो वह कार्यकता से बताता . है, उन्हें गोपनीय रखने से है। यह सेवार्थी के मूल अधिकार से संबंधित है साथ ही वैयक्तिक कार्यकर्ता का उत्तरदायित्व है तथा वैयक्तिक सेवा कार्य का मूलाधार है। जब सेवा संस्था में आता है तो यह समझकर आता है कि वैयक्तिक कार्यकर्ता को अनेक गोपनीय बाते बतानी हैं। परंतु यह भी चाहता है कि उसकी बातों को अन्य लोग न जाने, क्योंकि ऐसा होने से उसकी मानहानि होगी तथा वैयक्तिक भावनाओं को ठेस पहुंचती है। इसीलिए पहले वह गोपनीय बातें नहीं बताता है। जब उसे विश्वास हो जाता है तो वह गोपनीय तथ्यों को स्पष्ट करता है। इनकी अभिव्यक्ति के बिना सेवार्थी द्वंद के समाधान में सहायता की आशा नहीं कर सकता। यह सूचना बहुत निजी हो सकती है। सेवार्थी को अनैतिक तथा सामाजिक दृष्टि से अनभिज्ञ व्यवहारों से संभव हो और यदि लोगों को पता चल जाए तो सेवार्थों की सामाजिक छवि धूमिल हो सकती है, इसलिए वैयक्तिक कार्य द्वारा गोपनीयता के सिद्धांत का अभ्यास आवश्यक सामाजिक कार्यकर्ता का नैतिक उत्तरदायित्व
गोपनीय सूचना के तीन श्रेणियाँ बताई है.
1) नैसर्गिक गोपनीयता
2)प्रतिज्ञात्मक गोपनीयता
3) समझौतात्मक गोपनीयता
वैयक्तिक कार्य संबंध में ये तीनों प्रकारकी गोपनीयता शामिल होती है। सदैव एक मान्यता है कि वैयक्तिक कार्यकर्ता सेवार्थी की गोपनीयता को रखने को बाध्य होगा। यद्यपि कार्यकर्ता को संस्था के ढांचे में रहकर कार्य करना होता है। सेवार्थी द्वारा प्रदान की गई सूचना अकेले सेवार्थी के पास नहीं रहती, बल्कि संस्था में रहती है। संस्था में सभी लोग सेवार्थी की गोपनीयता की रक्षा के लिए बाध्य होंगे.
• सेवार्थी, समूह अथवा समुदाय की मनोदशा के अनुसार कार्य करने का सिद्धांत समाजिक कार्यकर्ता का दायित्व होता कि वह सेवा समूहसमुदाय की आवश्यकताओं एवं क्षमताओं के अनुसार कार्य को करे जिससे की लक्ष्य को आसानी से प्राप्त किया जा सके। कार्यकर्ता व्यक्ति अथवा समूह के साथ वही से कार्य आरंभ कर देते हैं जिस स्थिति में वे रहते हैं। कार्यकर्ता को जब व्यक्ति समूह आदि की मनोदशा पता नहीं हो तो उन्हीं के कहने का अवसर देता है। और बातों को ध्यान से सुनकर आगे की रणनीतियों को बनाता है।
• संचार का सिद्धांत संचार का सिद्धांत समाज कार्य में अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत के रूप में जाना जाता है। इस सिद्धांत के माध्यम से कार्यकर्ता संबंधित व्यक्ति समूह समुदाय तक अपने तथ्यों को स्पष्ट रूप से पहुंचाता है। संचार प्रेषक का प्राप्तकर्ता को सूचना भेजने की प्रक्रिया है जिसमे जानकारी पहुंचाने के लिए किसी ऐसे माध्यम का प्रयोग किया जाता है, जिससे संप्रेषित सूचना प्रेषक और प्राप्तकर्ता दोनों समझ सके। यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके द्वारा प्राणी विभिन्न माध्यमों के द्वारा सूचना का आदान प्रदान कर सकते हैं। सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा संचार के निम्नसाधनों का प्रयोग कार्य के दौरान कर सकता है। जैसे- बोली, मान और कभी-कभी आवाज का स्वर एवं गैरमौखिक, शारीरिक माध्यम जैसे हावभाव, संकेत भाषा, स्पर्श, नेत्र संपर्क लेखना इस प्रकार से इस सिद्धांत का प्रयोग बड़ी ही सावधानी के साथ करना चाहिए, जिससे कि कार्यकर्ता एवं व्यक्ति समूह / समुदाय के मध्य उचित कार्यवाही की जा सके।
भावनाओं के उद्देश्यपूर्ण प्रकटन का सिद्धांत
मनुष्य एक तार्किक प्राणी है। उसमें ज्ञान का भंडार है तथा कार्य करने की इच्छाव अनिच्छा होती है। इच्छाएँ या भावनाएँ व्यक्ति की प्रकृति व स्वभाव एक अंग है तथा व्यक्ति विकास के लिए इनका स्वस्य विकास होना आवश्यक होता है। सहायता के आधुनिक व्यवसाय में एक सुनिश्चित भावनात्मक जीवन की महत्ता को प्रमुख रूप में मान्यता प्रदान की जाती है। मनोचिकित्सा और मनोविज्ञान दोनों विज्ञानों में व्यक्तित्व की संरचना में भावनाओं की सामान्यस्वस्थ भूमिका का अध्ययन किया गया है। इन विज्ञानों ने सामाजिक कार्य को मानव प्रगति और विकास के बारे में ज्ञान का एक आयाम दिया है। इससे समाज कार्य सहायता प्रक्रिया और अधिक प्रभावी हुई। व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक मूलभूत आवश्यकता को अंतर्गत प्रेम, सुरक्षा प्रस्थिति, भावनाओं का स्पष्टीकरण, उपलब्धि तथा आत्मनिर्भरता के रूप में पहचाना गया है। समूह में कार्य करना, समूह सूचीकृत लेना, समूह के तरीकों को व्यवहार में लाना यह सभी मनोसामाजिक आवश्यकताएँ है। इन आवश्यकताओं का स्त व्यक्ति दर व्यक्ति घटता-बढ़ता रहता है। यदि इन भावनाओं का उद्देश्वर्ण प्रगटन नहीं होता है तो निराशा उत्पन्न होती है। सभी निराशा की स्थिति हानिकारक नहीं होती है, लेकिन निराशा के कारण हानिकारक मनोसुरक्षात्मक उपाय प्रयोग होने लगते है असामान्य व्यावहारिक प्रतिक्रियाएं होने लगती है। यद्यपि यह सत्य है कि इन आवश्यकताओं की सीमा प्रत्येक व्यक्ति में भिन्न भिन्न होती है, परंतु वे सभी मानव मात्र की आवश्यकताएँ है। सामाजिक वैयक्तिक सेवा कार्य के संबंध में आवश्यकता एवं भावनाओं के स्पष्टीकरण पर बल दिया गया है। बीस्टिक का कहना है कि भावनाओं की उद्देश्पूर्ण अभिव्यक्ति का अर्थ सेवार्थी द्वारा नकारात्मक भावों की अभिव्यक्ति की आवश्यकता की पहचान है।
वैयक्तिकरण का सिद्धांत
व्यक्ति का वास्तविक अर्थ वैयक्तिकरण से ही स्पष्ट होता है। 1930 में बरजाइना रॉबिन्सन ने वैयक्तिकरण के सिद्धांत को समाज कार्य की मुख्य प्रणाली के लिए महत्वपूर्ण बताया (वैयक्तिक सेवा कार्य | मेरी रिचमण्ड ने भी प्रभावपूर्ण सेवा कार्य के लिए वैयक्तिकरण पर बल दिया। यह सिद्धांत प्रत्येक व्यक्ति की विशिष्ट विशेषताओं को समझने पर बल देता है।
बोहथियस के अनुसार व्यक्ति तार्किक प्रकृति का वैयक्तिक सारतत्व है। मानव प्रकृति जाति में समान होती है, लेकिन प्रत्येक व्यक्ति की वैयक्तिक पहचान होती है। प्रत्येक व्यक्ति अपने वंशानुक्रम पर्यावरण, अंतर्भूत ज्ञानात्मक क्षमताओं, योग्यताओं आदि से भिन्न होता है। प्रत्येक व्यक्ति के अलग-अलग अनुभव तथा अलग-अलग आंतरिक बाह्य उत्तेजक होते हैं, जो उसके संवेग तथा स्मृतियों, विचारों, भावनाओं तथा व्यहार को प्रभावित करते हैं। प्रत्येक व्यक्ति की प्रकृति अपनी शक्तियों को विशिष्ट प्रकार से संगठित करके उन्हें निर्देशित करती है, जिससे वे दूसरे व्यक्ति की प्रवृत्ति से भिन्न हो जाते हैं। यदि यद्यपि शारीरिक रूप से सभी व्यक्ति समान होते हैं। परंतु उनकी शारीरिक, मानसिक, सांवेगिक आदि क्षमताओं में अंतर होता है। जब तक इन विशेषताओं को अलगअलग नहीं समझा जाएगा, तब तक सेवार्थी समस्या का उचित समाधान ढूंढा नहीं जा सकेगा और ना ही उचित समायोजन स्थापित कर सकेगा। इससे यह स्पष्ट होता है कि व्यक्ति व्यक्ति में अंतर होता है। प्रत्येक सेवार्थी समूहसमुदाय भिन्न विशेषताएँ रखता है। अतः उसकी आवश्यकताएँ भी दूसरों से किसी न किसी रूप भिन्न होती है। अतः समाज कार्य सहायता में भी भिन्नता होना अनिवार्य है, जिससे व्यक्ति विशेष की सहायता संभव हो सके और सेवार्थी समूह समुदाय अपनी योग्यताओं और स्रोतों को समस्यासमाधान के लिए उपयोग में ला सके। प्रत्येक व्यक्ति को यह अधिकार है कि उसको एक व्यक्ति के रूप में समझा जाए, न कि मानव प्राणी के रूप में अंतरों को महत्व दिया जाए। इसी मूलाधार पर वैयक्तिकरण का सिद्धांत आधारित
● आवश्यक साधनों का उपयोग
समाज कार्य के माध्यम से जो सहायता सेवार्थी समूहसमुदाय को प्रदान की जाती वह सहायता का माध्यम संबंधित व्यक्ति के वातावरण से ही महत्वपूर्ण होता है कार्यकर्ता का दायित्व होता है कि वह आवश्यक साधनों की खोज करें और उनका उपयोग किस प्रकार से हो सकता है, इसका प्रयास करे, ताकि जो भी आवश्यकता ग्रस्त व्यक्ति है उसकी समस्या का समाधान उचित प्रकार से किया जा सके।
● व्यावसायिक संबंध निर्माण का सिद्धांत
समाज कार्य एक व्यावसायिक सेवा है। अत: यह आवश्यक है कि यह सेवा प्रत्येक व्यक्ति को बिना पूर्वाग्रह या पक्षपात के प्रदान करनी चाहिए। यही व्यावसायिक संबंध निर्माण सिद्धांत का मूलाधार है।
समाज कार्य के मूल्यों और सिद्धांतों का अध्ययन करने के पश्चात, कौस द्वारा दिए गए समाज कार्य के मूल्यों और सिद्धांतों को स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है।
कौस द्वारा समाज कार्य के दस मूल्यों सिद्धांतों की व्याख्या को प्रस्तुत किया गया है, जो कि निम्न प्रकार से हैं:
1. मनुष्य की योग्यता एवं उसकी गिरमा को बनाए रखना।
2. संपूर्ण मानवीय विभव उपलब्धबनाने की मानवीय प्रवृत्ति संबंधी क्षमता को बनाए
रखना।
3. मतभेदों के संदर्भ में सहनशीलता को बनाये रखना।
4. स्वतंत्रता
5. मनुष्य एवं प्रकृति के कारण होने वाले खतरों से अपने अस्तिव की सुरक्षा करना।
6. मौलिक मानवीय आवश्यकताओं की संतुष्टि करना।
7. आत्म निर्देशन देना।
8. अनिर्णयात्मक मनोवृति का विकास करना।
9. रचनात्मक-सामाजिक सहयोग को बनाए रखना।
10. कार्य की महता तथा खाली समय का रचनात्मक उपयोग करना।
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