भारतीय गांवों की सामाजिक संरचना - Social Structure of Indian Villages

भारतीय गांवों की सामाजिक संरचना - Social Structure of Indian Villages

अनेक विद्वानों द्वारा भारतीय गाँवों की सामाजिक संरचना का अध्ययन किया गया है जिनमें से प्रमुख श्रीनिवास, दुबे रेडफील्ड, मजूमदार, मैकिम मैरिएट, मिल्टन सिंगर, बी. आर. चौहान, विलियम बाईजर, आस्कर लेविस, आंद्रे बेते आदि हैं। भारत में अनेक जातियाँ और जनजातियों रहती हैं और कई गाँवों में तो जातियाँ और जनजातियाँ एकसाथ निवास करती हैं। इसके कारण गाँव की संरचना पहले की तुलना में जटिल हो गई है, क्योंकि जातियों में जनजातियों के कई तत्व विलीन हो गए हैं और ऐसा ही कुछ जनजातियों के साथ भी हुआ है। कई गाँव प्रादेशिक विशिष्टताओं के कारण जटिल हो गए हैं, तो कुछ गाँव जनसंख्या अधिकता अथवा न्यूनता नगर से दूरी गाँव की भौतिक बसावट के कारण भी जटिल हो गए हैं। उत्तर भारत के गाँव मध्य और दक्षिण भारत के गाँव से अनेक अर्थों में पृथक अस्तित्व रखते हैं और उनकी सामाजिक संरचना में भी कई विभेद देखे जा सकते हैं। भारतीय गावों की सामाजिक संरचना के बारे में समझ विकसित करने के लिए गाँव के आंतरिक संबंधों समूहों गाँव को समुदायों में समुदाय के रूप में समझना होगा और गाँव की सामाजिक संरचना की स्थाई इकाइयों के बारे में ज्ञान अर्जित करना होगा। दुबे और अन्य विद्वानों ने भारतीय गावों की सामाजिक संरचना को समझने के लिए दो दृष्टिकोण प्रस्तुत किए हैं. - 


● भारतीय ग्राम एक विशेष पूर्ण इकाई के रूप में।


● भारतीय ग्राम बड़े समुदाय में संबंधित एक छोटी संबंधित इकाई के रूप में


भारतीय गाँव की सामाजिक संरचना के प्रमुख अंगों कोयहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है


 1. जाति जाति का निर्धारण जन्म से होता है और प्रत्येक जाति का एक पृथक व्यवसाय होता है। इस जाति आधारित व्यवसाय से संबंधित कुछ कर्तव्य होते हैं जो अन्य जातियों से अंतसंबंधित होते हैं। व्यक्ति अपनी ही जाति में वैवाहिक संबंध स्थापित कर सकता है, खान-पान आदि के नियम और निषेध आदि का निर्धारण जाति व्यवस्था द्वारा ही किया जाता है। गाँव में सामाजिक संस्तरण का निर्धारण भी जाति द्वारा ही किया जाता है। सभी जातियाँ आर्थिक संबंधो दायित्वों और कर्तव्यों से आपस में बंधी हुई होती है इसे जजमानी प्रथा की संज्ञा दी जाती है। प्रत्येक जाति की अपनी एक जाति पंचायत होती है जो उनके व्यवहारों को नियंत्रित करती है और जातीय नियमों की अवहेलना पर दंडात्मक कारवाई करती है। जातीय एकता एक गाँव तक ही सीमित नहीं रही है, अपितु यह दूसरे गाँव से भी संबंधित रहती है


2. ग्राम पंचायत गाँव में ग्राम पंचायत की सत्ता और शक्ति समुदाय की सामाजिक संरचना को संगठित करने का काम करती है। ग्राम पंचायतों पर जाति वर्ग, वंश आदि का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इनके काम में सहयोग करने का काम जाति पंचायतों द्वारा किया जाता है। ग्राम पंचायतों के स्थान पर वर्तमान में पंचायती राज व्यवस्था आधारित पंचायतों की व्यवस्था की गई है, जो कि अधिक प्रजातांत्रिक है। 


3. परिवार, विवाह और नातेदारी गाँव की सबसे सूक्ष्मतम इकाई व्यक्ति होता है और उससे ऊपर परिवार, नातेदारी, वंश, उपजाति, वर्ण आदि इकाइया होती है। ग्रामीण परिवारों की संरचना प्रायः विस्तृत और संयुक्त प्रकार की होती है। ये परिवार मुख्यतः पितृसत्तात्मक व पुरुष प्रधान होते हैं और इनका प्रमुख व्यवसाय कृषि होता है। परिवार में मुखिया की सत्ता ही सर्वशक्तिमान होती है।


गाँव में विवाह को दो परिवारों को जोड़ने वाली संस्था के रूप में दर्जा दिया जाता है। विवाह एक अनिवार्य संस्था है यह अंतर्जातीय होता है सगोत्र विवाहों पर प्रतिबंध होता है उच्च जातियों में विधवा पुनर्विवाह निषेध है जबकि निम्न जातियों में इसका प्रचलन आम है। परिवार और विवाह के विस्तार से नातेदारी समूह का जन्म होता है। यह वह समूह है जो रक्त और विवाह संबंधित संबंधों पर आधारित होता है। यह व्यक्ति को नियंत्रित करने और निर्देशित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और आज भी विभिन्न गावों में ये सामाजिक आर्थिक सुरक्षा के लिए अपने कर्तव्यों का वहन करते हैं।


4. धर्म भारत एक धर्म प्रधान देश है। यहाँ अनेक प्रकार के धर्म, मत और संप्रदाय प्रचलित हैं। गाँव में अनेक देवी-देवताओं की पूजा की जाती है और धार्मिक संस्कारों के मानने से आपसी सहयोग समानता और एकीकरण की भावना का संचार होता है। दीपावली, होली, दशहरा कृष्ण जन्माष्टमी, राम नवमी ईद, मुहर्रम पागल, क्रिसमस आदि विशिष्ट अवसरों व त्यौहारों पर लोग संगठित होते हैं और प्रेम व सौहार्द का विकास होता है।


5. आर्थिक संस्थाएं गाँव की अर्थव्यवस्था जाति आधारित होती है। कृषि, पशुपालन व भूमि पर स्वामित्व के आधार पर व्यक्ति का मूल्यांकन किया जाता है। एक लंबे समय से जजमानी व्यवस्था ही गाँव की अर्थव्यवस्था रही है। बाईजर लेविस, दुबे, सिंह व ईश्वरन आदि विद्वानों द्वारा जजमानी व्यवस्था का अध्ययन किया गया। । एस. सी. दुबे ने अपनी पुस्तक इंडियन विलेज में जजमानी व्यवस्था के प्रमुख चार कार्य बताए हैं


• कृषिगत क्रियाओं से जुड़े व्यवसायों को सेवाएं देना।


• सामाजिक व धार्मिक जीवन से जुड़े कृषि व अन्य व्यावसायिक जातियों को सेवाएं देना।



कुछ व्यावसायिक सेवाएँ जातियों को परंपरागत सेवाओं के बदले मदेना।


• व्यावसायिक सेवाएं नकद भुगतान की उम्मीद से देना।


6. शैक्षणिक संस्थाएं हालांकि गावों में औपचारिक शिक्षण संस्थाएं सीमित होती है तथापि वहाँ


अनौपचारिक तौर पर जाति द्वारा यह काम किया जाता है। व्यक्ति अपनी परंपरागत जातिगत व्यवसाय पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्राप्त करता रहता है। परिवार द्वारा धार्मिक क्रियाओं कृषि, दस्तकारी, त्यौहारों व व्यापार आदि की जानकारी दी जाती है। आधुनिक समय में गाँव में औपचारिक शिक्षण संस्थाओं की व्यवस्था की जा रही है।


7. प्रतिमान, मूल्य और परिवर्तन ग्रामीण सामाजिक संरचना के रूप में प्रतिमान मूल्य, आदर्श आदि की महत्ता को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। सामाजिक मूल्यों और आदशों के आधार पर ही बालक का समाजीकरण किया जाता है और उसे सही एवं गलत में फर्क करना सिखाया जाता है। बालक ही नहीं वरन वयस्क के जीवन में भी सामाजिक मूल्यों और आदर्शों का महत्व बहुत होता है। ये मनुष्य को अनैतिक कार्यों से दूर रहने के लिए प्रेरित करते हैं। परंपरागत ग्रामीण सामाजिक संरचना में कई परिवर्तन भी हुए हैं, यथा सामुदायिक विकास परियोजनाएं समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम, जमींदारी उन्मूलन अधिनियम, पंचवर्षीय योजनाएं पंचायती राज आदि। आज ग्रामीण समाजों में आधुनिकता की छाप को प्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है।