एशिया व भारत में समाज कार्य शिक्षा - Social Work Education in Asia and India

एशिया व भारत में समाज कार्य शिक्षा - Social Work Education in Asia and India

एशिया व भारत में समाज कार्य शिक्षा - Social Work Education in Asia and India

एशिया प्रशांत क्षेत्र में समाज कार्य शिक्षा प्रशिक्षण तथा संबंधित मानकों से संबंधित अध्ययन में पाया गया कि उपरोक्त मानदण्ड इतने उपयोगी थे कि इनके सहयोग से समाजकार्य की संभावनाओं के बारे में समझने में सफल हुए तथा उनसे ठोस आश्वासन पाने में भी सफल हुए। इनके माध्यम से इस क्षेत्र में समाज कार्य पाठ्यक्रम का विकास तथा विस्तार कर सकते थे। लेकिन इस बात की सर्वसम्मति नहीं हो पाई कि यहां पर समाज कार्य शिक्षा में पाश्चात्य विचार एवं क्रियाकलाप प्रभावकारी है तथा उसके जोखिम को कैसे समाप्त किया जाए। इसके अतिरिक्त संयुक्त विचारधाराओं एवं क्रिया कलापों को लागू करके देखा गया तो पाया गया कि एक अलग किस्म की साम्राज्यवादी विचारधारा अस्तित्व में आने लगी।






भारत में समाजकार्य शिक्षा पर सबसे अधिक प्रभाव अमेरिका का रहा है उदाहरणस्वरूप अब पहली बार मुंबई में सर दोराब जी टाटा ट्रस्ट द्वारा 1936 में स्कूल स्थापित किया गया उस समय क्लीफोर्ड मंसईट इसके संस्थापक निदेशक थे तथा उन्हीं के नाम पर इस स्कूल का नाम टाटा इंस्टीट्यूटऑफ सोशल साइंसेज क्लीफोर्ड मंसईट रखा गया। क्लीफोई मसईट एक अमेरिकन मिशनरी से संबंधित जिनके पास अमेरिका और भारत दोनों के समाजकार्य से संबंधित अनुभव था। सामान्य पाठ्यक्रम जिस पर स्वतंत्रता पूर्व से पहले बल दिया जाता थावह कुछ क्षेत्रों को सम्मिलित करते हुए विकसित हुआ। इसके अंतर्गत मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य से संबंधित विशेषीकृत समाजकार्य महिला एवं बाल कल्याण अपराध शास्त्र एवं प्रशासकीय सुधार सामूहिक कार्य, सामुदायिक संगठन श्रमिक कल्याण व औद्योगिक संबंध इत्यादि क्षेत्र में अमेरिका में स्थापित प्राथमिकताओं, सामाजिक प्रकरणों पर आधारित समस्याओं के समाधान पर बल दिया जाता था तथा सामाजिक आर्थिक विकास की बुनियादी आवश्यकताओं पर कम ध्यान दिया जाता था।








स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में इस पद्धति को अनुपयोगी माना पाया तथा यह देखा गया कि भारत की जरूरतें पश्चिमी विकसित देशों की जरूरतों एवं आवश्यकताओं से भिन्न है। एमएस. गोरे का कहना है कि भारतीय समाजकार्य शिक्षा प्राय अपने आपको दरिद्रता के परिणाम के रूप से दर्शाती है लेकिन दरिद्रता के उत्पन्न होने के मूलभूत कारणों की व्याख्या नहीं की। इसके अतिरिक्त अन्य कारण मौजूद है वह है यहां के सामाजिक कार्यकर्ताओं की पृष्ठभूमि। ये पृष्ठभूमि भी समाजकार्य को प्रभावित करती भारतीय .सामाजिक कार्यकर्ता छोटे शहरों एवं मध्यम वर्गीय परिवार से संबंधित थे ये लोगों की समस्याओं का स्थाई हल ढूंढने में नहीं बल्कि उनकी गरीबी को दूर करने के लिए तात्कालिक दवा के रूप में वस्तुओं रुपयों आदि से सहायता करते थे। सामाजिक कार्यकर्ता शहरी क्षेत्रों में समाजसेवा के कार्य को रोजगार के रूप में देखते हुए कॅरियर बनाने की इच्छा रखते थे अर्थात वे अन्य व्यवसाय की भांति इसे भीरोजगार की तरह मानते थे। अतः हम कह सकते हैं कि एक देशमें अलग-अलग सोच वाले व्यक्ति रहते हैं तथा उनकी सामाजिक आर्थिक पृष्ठभूमि में काफ़ी अंतर होता है। यह अंतर समाजकार्य शैक्षिक मानक के संदेशीकरण हेतु महत्वपूर्ण चुनौती के रूप में मालूम होता हैं।








जे, निम्मागड्डा एवं पी आर बालगोपाल ने सांस्कृतिक बंधनों से मुक्त एवं सफलतापूर्वक स्वीकार किए गए समाजकार्य संबंधी सिद्धांतों का एक उदाहरण दिया है उन्होंने बताया कि भारत में प्रारंभ में नशा मुक्ति हेतु अमेरिकी सिद्धांत को लागू किया गया था। लेकिन कुछ प्रयोगों के बाद यह स्पष्ट हो गया कि एक वातावरण के सफलतापूर्वक लागू सिद्धांत या तकनीकको बिना किसी सुधार के दूसरे वातावरण में सफलतापूर्वक लागू नहीं किया जा सकता। इसका उदाहरण यह है कि पश्चिमी देशों में शराब पीने में संयम बरतने की व्यक्तिगत स्तर की तकनीक सफलतापूर्वक लागू है। लेकिन भारत में संयुक्त परिवाख्यवस्था में यह तकनीक उतनी सफल नहीं हुई। इस आरोपित तकनीक के असफलता के फलस्वरूप भारत में समाजिक कार्यकर्ता इसकी रोकथाम हेतु अपनी जागरूकता का विश्लेषण करने लगे।







समाजकार्य व्यवसाय में संस्कृति निर्माण के इस कार्य ने आगे का मार्ग प्रशस्त किया तथा इसके लिए ग्रुप थेरेपी तकनीक, जो भारतीय परिवेश के हिसाब से अनुकूल है सम्मिलित हुई सामाजिक कार्यकर्ता यह विशेष रूप से जानते हैं कि समूह के नेता की इच्छा ज्यादा प्रभावकारी होगी। यदि समूह का नेता अपने सदस्यों को समझाएगा तो सदस्यों पर इसका गहरा असर पड़ेगा। भारतीयों की इसी मनोशक्तियों को ध्यान में रखकर सामाजिक कार्यकर्ताओं ने प्रत्येक सत्र में नेताओं को समझाने हेतुसामाजिक शिक्षाओं का प्रयोग किया। बाद में ये सामाजिक कार्यकर्ता ज्ञान बाटने वाले गुरू के रूप में दिखाई देने लगे। सामाजिक कार्यकर्ताओं ने परिवारों के साथ व्यक्तिगत संबंध बनाया तथा50 मिनट की सलाह की जगह विभिन्न मुद्दों पर सलाह हेतु अधिक समय देने के लिए तैयार हो गए।







अंत में सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अमेरिका का 2 स्टेप मॉडल के कठोर नियमों का पालन करना छोड़ दिया। उन्होंने अपनी कार्यक्षमता एवं अनुभव के आधार पर एक ऐसी पद्धति को स्वीकार किया जो कि सेवार्थी परिस्थिति के अनुसार अधिक योग्य थी। कठिन परिस्थितियों में स्वयं प्रतिक्रिया देने की इस क्षमता ने सेवार्थों की अच्छी तरह से सेवा करने के लिए एक आधार उपलब्ध कराया तथा भारतीय समाजकार्य के ज्ञान के जुड़कर ज्ञान के आधार को मजबूती प्रदान की।






व्यावसायिक समाज कार्यकर्ताओं को हमेशा जागरूक रहते हुए यह ध्यान देना चाहिए कि किसी देश में लागू सुधारवादी तकनीकी को अगर अपने देश में लागू किया जाएगा तो इसका असर देश के क्रियाकलापों एवं पीढ़ियों पर क्या पड़ेगा? कुछ मुद्दे ऐसे भी होते हैं जिनका प्रभाव देश की सीमा के बाहर भी पड़ता है, जैसे एड्स, अंतरराष्ट्रीय अपराध जैसे आतंकवाद अवैध प्रवासन, आर्थिक व व्यापारिक नीतियां, पर्यावरण के मुद्दे जो प्रत्येक व्यक्ति एवं समाज से संबंधित होते हैं। औपनिवेशिक काल के बाद समाजकार्य की मांग थी कि पाश्चात्य प्रभाव वाले क्षेत्रों में जहां विचारों को दमित कर दिया गया था. उन विचारों को पुनः जागृत करता था। उनके एजेण्डे का केवल यह उद्देश्य नहीं था कि केवल व्यक्तिगत और सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक विविधता एवं सिद्धांतों को ही बढ़ावा दिया जाए बल्कि इसका पुनर्संशोधन में सहयोग उपरोक्त विचारधारा को ध्यान में रखकर किया जाए ताकि यह सकारात्मक रूप से आगे बढ़ सके तथा पहले से स्थापित शासन संबंध अव्यवस्थित हो जाएगा जो कि पहले से प्रभावशाली समाज कार्य विचारधारा से संबंधित था।