समाज कार्य व्यवसाय - Social Work Profession

समाज कार्य व्यवसाय - Social Work Profession

समाज कार्य व्यवसाय - Social Work Profession

समाजकार्य को यदि ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो कहा जा सकता है कि यह एक ऐसी मानवता है जिसे सदैव अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए एक प्रणाली की खोज रही है। इस खोज के कारण समाजकार्य ने अपने आप को अधिक से अधिक वैज्ञानिक रूप दिया यहाँ तक कि यह एक प्रावैधिक व्यवसाय बन चुका है। जब हम यह कहते हैं कि समाजकार्य एक व्यवसाय है, तो आवश्यक हो जाता है कि पहले व्यवसाय शब्द की विशेषता स्पष्ट की जाए। फिर यह देखा जाए कि समाजकार्य व्यवसाय के मानदंडों पर खरा उतरता है या समाज कार्य का व्यावसायिक स्वरूप किसी भी व्यवसाय को हम जीविका की संज्ञा तभी दे सकते हैं जब वह ज्ञान विज्ञान पर आधारित हो तथा व्यवसाय के अन्य सभी गुण उसमें मौजूद हो। इस संदर्भ में समाज कार्य पर गंभीरता से दृष्टिपात करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि समाजकार्य में वे सभी विशेषताएँ व गुण विद्यमान हैं, जिनके आधार पर उसे व्यवसाय के रूप में स्वीकार किया जाता है। समाजकार्य की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित है, जो उसे एक व्यवसाय सिद्ध करती है.







 वैज्ञानिक ज्ञान व क्रमबद्ध सिद्धांत


समाजकार्य के अंतर्गत प्रदान की जानेवाली समस्त सेवाएं व सहायता प्रक्रिया वैज्ञानिक ज्ञान व विशेष कोशल पर आधारित होता है। समाजकार्य के एक निश्चित ज्ञान के आधार पर सेवा कार्य तो किया जाता है, साथ ही समाजकार्य अभ्यास के दौरान प्राप्त अनुभवों की सहायता से इस ज्ञान व कौशल में निरंतर वृद्धि भी की जाती है। समाजकार्य के व्यावसायिक अभ्यास व अनुभवों के परिणाम स्वरूप जो ज्ञान हमारे सामने आता है, वह साहित्य सम्मेलनों विज्ञान गोष्ठिया, सेमिनार आदि द्वारा समस्त व्यावसायिक कार्यकर्ताओं तक पहुंचाकर, उस नवीन ज्ञान को व्यावहारिक रूप में प्रयोग के लिए निर्देशित किया जाता है।





विशिष्ट प्रणालियों, विधियों व प्रविधियाँ


 समाजकार्य की अपनी विशिष्ट प्रणालियाँ, विधियों व प्रविधियाँ होती है, इन्हीं प्रणालियों व प्रविधियों का ज्ञान प्रशिक्षण द्वारा सामाजिक कार्यकर्ताओं को प्रदान किया जाता है। साथ ही इन प्रणालियों व प्रविधियों का व्यावहारिक क्षेत्र में प्रयोग करने की कला भी इनको सिखाई जाती है। 






शैक्षिक व प्रशिक्षण पद्धति


समाजकार्य वृत्ति के शिक्षण व प्रशिक्षण के लिए अनेक उच्च स्तरीय संस्थाएं हैं तथा इसके अनेक कार्यक्रम देश देशांतर में चलते हैं। भारत में समाजकार्य व्यवसायिक प्रशिक्षण संबंधी शिक्षा पश्चिमी देशों की तुलना में काफ़ी देर से शुरू हुई। भारत में 1936 में मुंबई में पहली बार व्यावसायिक शिक्षण टाटा स्कूल ऑफ सोशल साइसेस में शुरू की गई। इसके बाद 1947 में वाराणसी में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में समाज कार्य शिक्षण प्रारंभ हुई। इसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय, लखनऊ विश्वविद्यालय, इंदौर स्कूल ऑफ सोशलवर्क, मद्रास स्कूल ऑफ सोशल वर्क, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, पटना आदि में भी व्यावसायिक प्रशिक्षण आरंभ हुआ है।





व्यावसायिक संगठन व समितियाँ


किसी व्यवसाय के सदस्यों को संगठित होने की आवश्यकता होती है। इसके लिए उनको व्यावसायिक संगठन का सदस्य बनना चाहिए। विभिन्न स्तरों पर समाज कार्य से संबंधित अनेक संगठनों की स्थपना की गई है, जिनमें इंडियन कॉउंसिल ऑफ सोशल वेलफेयर, इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ सोशल वर्क मद्रास, इंडियन एसोसिएशन ऑफ साइक्रियाट्रिक सोशल वर्कर्स राँची इंडियन एसोसिएशन ऑफ सोशल वर्कस इत्यादि जैसी विभिन्न संगठन व समितियाँ कार्य कर रही हैं। 






सामाजिक मान्यता


किसी भी व्यवसाय का एक गुण यह माना जाता है कि उसे समाज की मान्यता या स्वीकृति प्राप्त होनी चाहिए। यह मान्यता इस आधार पर दी गई हो कि यह व्यवसाय समाज के लिए उपयोगी व हितकारी हो। अर्थात यदि व्यवसाय समाज या समुदाय के लिए हितकारी हो तो उसे व्यवसाय का स्तर दिया जाता है। भारत में समाजकार्य को पाश्चात्य देशों की तुलना में कम मान्यता प्राप्त है फिर भी विभिन्न क्षेत्रों में प्रशिक्षित व योग्य कार्यकर्ताओं की नियुक्तियों की जा रही है जैसे चिकित्सा व मनोचिकित्सा कार्य दल में व औद्योगिक प्रतिष्ठानों में इत्यादि।






आचार संहिता


प्रत्येक व्यावसायिक संगठन अपने व्यवसाय के अभ्यासकर्ताओं के लिए कुछ महत्वपूर्ण नियम व प्रतिबंधों का सृजन करते हैं, जिनका पालन करना लगभग प्रत्येक समाज कार्यकर्ता के लिए अनिवार्य होता है। ये नियम व प्रतिबंध मात्र कार्यकर्ताओं को मनमाना व्याहार करने से ही नहीं रोकते, बल्कि सामाजिक कार्यकर्ताओं के व्यवहार व क्रियाकलाप में एकरूपता लाते है अमेरिका व पाश्चात्य देशों में मान्यता प्राप्त प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं के लिए आचार संहिता निर्मित की ई है। भारत में अमेरिका से ग्रहण की गई आचार संहिता को अपनाया गया है।






आर्थिक सुरक्षा


सामाजिक कार्यकर्ताओं को आर्थिक सुरक्षा भी उपलब्ध है। जो लोग समाजकार्य के किसी भी क्षेत्र में किसी भी पद पर कार्यरत हैं, उनको उनकी योग्यता आदि के आधार पर वेतन दिया जाता है।




लाइसेंसिंग व्यवस्था


यूरोप व अमेरिका में समाज कार्यकर्ताओं को ठीक उसी प्रकार अपने को निबंधित कराना पड़ता है जिस प्रकार एक चिकित्सक या वकील को निबंधन के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति के पास शिक्षण व प्रशिक्षण का मानक प्रमाणपत्र है।






 मानव कल्याण


समाजकार्य का लक्ष्य सुसंगठित समाज की रचना करना व व्यक्ति का समाज में ऐसा समायोजन करना है, जिससे वह अपना व समाज का कल्याण कर सके। इस बात को ध्यान में रखकर ही इसके सिद्धांत व प्रविधियाँ विकसित होती रही है।





उपरोक्त विशेषताओं के होने के बाद भी अनेक वर्षों से यह आम धारणा है कि क्यासमाज कार्य को एक व्यवसाय के रूप में संदर्भित किया जाए। विद्वान लगभग एक शताब्दी से यह विमर्श कर रहे हैं कि क्या समाज कार्य ऊपर वर्णित फ्लेक्जनर की सभी कसौटियों को पूरा करता है? समाजशास्त्री अर्नेस्ट ग्रीनवुड ने 1957 में 'एट्रीब्युट्स ऑफ ए प्रोफेशन' प्रकाशित किया तथा सुझाव दिया कि वृत्तियों को सामाजिक मान्यता की आवश्यकता होती है। ग्रीनवुड ने व्यवसाय की विशेषताओं की निम्नलिखित सूची बताई है.


1. एक क्रमबद्ध ज्ञान


2. सामुदायिक सामाजिक मान्यता


3. प्राधिकार या विश्वसनीयता


4. सदस्यों का नियमन तथा नियंत्रण


5. एक वृत्तिक आचार संहिता तथा मूल्यों मानको तथा प्रतीकों की एड 95/192 ग्रीनवुड ने यह यह दावा किया कि उत्तरी अमेरिका में समाज कार्य इन कसौटिय हुआ दिखा। फिर भी आलोचकों ने यह पूछना जारी रखा कि क्या समाजकार्य कला है या विज्ञान और क्या इसा विचार पर सामाजिक कार्यकर्ताओं मे भतव्य है। उनके पास एक सहभागी संस्कृति है, अन्यों ने यह भी सुझाव दिया कि सामाजिक तथा आर्थिक न्याय हेतु वे वकालत करें क्योंकि सामाजिक मान्यता सहजता से प्राप्त नहीं हो सकती।