शहरी सामाजिक संरचना - Urban Social Structure

शहरी सामाजिक संरचना - Urban Social Structure

शहरी सामाजिक संरचना - Urban Social Structure

शहर और शहरी दोनों ही शब्दों का प्रयोग सामान्यतः एक ही अर्थ में किया जाता है, परंतु 7वीं शताब्दी के मध्य और उसके बाद से शहर को एक प्रकार का स्थान माना जाने लगा और शहरी को एक जीवन जीने की शैली के रूप में माना जाने लगा। जनसंख्या एक ऐसा आधार है जो गाँव को कस्बे से पृथक करता है, कस्बे को शहर में पृथक करता है शहर को महानगर से पृथक करता है। विद्वानों द्वारा शहरी सामाजिक संरचना की व्याख्या जनसंख्या के आकार और घनत्व के आधार पर की गई है। यथा भारत में अनेक जनगणनाओं के अनुसार शहर की स्थायी जनसंख्या कमसे कम 5,000 होनी चाहिए। इसके अलावा पारिस्थितिकीय दृष्टि से भी शहरों को परिभाषित किया जाता है। इसके अनुसार शहरी क्षेत्र का अध्ययन करने वाले विद्वानों ने शहरी क्रिया-कलाप एवं आवास व्यवस्था राजनैतिक संस्था, बाजार, व्यवसाय केंद्र आदि का स्थानिक वितरण और शहरी क्षेत्र के विस्तार की प्रक्रियाओं और स्वरूपों पर ध्यान आकृष्ट किया।

गार्डन चाइल्ड और मैक्स वेबर का मानना है कि शहर का मुख्य लक्षण बाजार की उपस्थिति और उसमें विशिष्ट वर्ग के व्यवसायियों की मौजूदगी है। अन्य धार्मिक आर्थिक, राजनीतिक, प्रौद्योगिकीय संस्थाएं जटिल प्रशासनिक संरचनाएँ आदि भी शहरों में विद्यमान रहती है। शहरी लोगों द्वारा आवश्यकताओं और हितों को साधने के लिए अपेक्षाकृत जटिल संगठनात्मक व्यवस्था में स्वयं को संगठित कर लेते हैं यथा न्यायालय, अस्पताल संगठन सुपर बाजार आदि। किसी भी समुदाय में शहरी जीवन शैली के अंश का संज्ञान तीन तत्वों पर निर्भर करता है.


जनसंख्या का आकार


जनसंख्या का घनत्व


जनसंख्या की विषमता


शहरीकरण को परिवर्तन की प्रमुख इकाई के रूप में विश्लेषित किया जाता है। इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप भारत में आर्थिक विकास और राजनीतिक बदलाव हुए और साथ ही कई नवीन मूल्यों व अभिवृत्तियों का उभार हुआ। यह ग्रामीण और शहरी जीवन के मध्य तारतम्यता बनाए रखने वाले तत्वों को प्रदर्शित करता है।