विकास की संकल्पना और अर्थ - Concept and meaning of development
विकास की संकल्पना और अर्थ - Concept and meaning of development
वस्तुतः विकास शब्द जितना आकर्षक प्रतीत होता है, यह उतना ही जटिल भी होता है। विकास स्वयं में विभिन्न संरचना और आयामों के गतिशील पक्ष को समेटे हुए है। इस अवधारणा का काल भी कुछ खास पुराना नहीं है। पश्चिमी यूरोप में औद्योगिक क्राति और ज्ञानोदय (रेनेसा) के बाद क्रियाशील हुआ सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन विकासशील देशों में प्रगति के स्तर को मापने के लिए विकास और आधुनिकीकरण का मानक बन गया। यह एशिया अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के अविकसित देशों की पश्चिम के विकसित देशों के साथ तुलना का प्रतिनिधित्व करता है। विकास की अवधारणा का सूत्रपात पश्चिमी पूँजीवाद के अभ्युदय के साथ ही आरंभ हुआ है और विकास की धारणाओं को मानने वाले विद्वानों द्वारा समाज को तीन भागों में वर्गीकृत किया गया है.
• विकसित समाज यह वह समाज होता है जो अपने नागरिकों को उनके जीवन की सभी आवश्यकताओं को सरलतासे उपलब्ध करा देता है। यह समाज विकास के अंतिम चरण में होता है। यथा फ्रांस, जापान, अमेरिका इत्यादि।
● विकासशील समाज- यह वह समाज होता है जहाँ विकास वह अपनी दिशा में अग्रसर हो रहा होता है। यथा- भारत, चीन, पाकिस्तान इत्यादि।
• अविकसित समाज यह वह समाज होता है जहाँ विकास की संभावनाएँ नहीं होती है अथवा वह समाज विकास की दिशा में अत्यंत पिछड़ा होता है। यथा दक्षिणी-उत्तरी ध्रुव सहारा का विकास एक सामाजिक प्रक्रिया है, जिसका प्रत्यक्ष संबंध आर्थिक पक्ष से होता है। इस संबंध में विद्वानों का मानना है कि समाज के विभिन्न प्रकार के उद्देश्य होते हैं, जो उसकी संरचना व प्रकार्यों में ऊर्ध्वाधर परिवर्तन और स्थायित्व से संबंधित होते हैं उन उद्देश्यों को प्राप्त तभी किया जा सकता है जब समाज में विकास का आयाम आर्थिक होगा। अर्थात सामाजिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए आर्थिक विकास ही एकमात्र उपाय है। विकास की प्रक्रिया से वे तत्व उभरकर सामने लाए जाते हैं जिसकी समाज को आवश्यकता है। इसमें समाज को परिवर्तित तो किया ही जाता है और इसके साथ ही साथ यह परिवर्तन किसी निश्चित दिशा को इंगित करता है। हालांकि इस दिशा को पूर्व ही निश्चित नहीं किया जाता है तथापि यह एक ही दिशा से संबंधित होता है।
विकास एक अवधारणात्मक पद है। द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात समूचे विश्व में विकास एक महत्वपूर्ण शब्द के रूप में उभरा है तथा समकालीन आर्थिक जगत में विकास एक नए विमर्श के रूप में अवस्थित है। विकास शब्द की उत्पत्ति 1745-55 ई. में माना जाता है। विकास शब्द अंग्रेजी के Development का हिंदी रूपांतरण है और यह शब्द फ्रेंच भाषा के Developer' से लिया गया है। इसका आशय लपेटने अथवा बाँधने के विपरीत अर्थ से लगाया जाता है। 18वीं शताब्दी में पुनः इस शब्द में विस्तार हुआ इसमें विकास (Developing) का आशय मानवीय मन के अवयवों के संदर्भ में लगाया जाने लगा। 18वीं शताब्दी के मध्य में इसे जीव विज्ञान में Evolution के समीपवर्ती का शब्द माना जाने लगा। 19वीं शताब्दी में इसका प्रयोग राष्ट्रों के विकास के संदर्भ में किया जाने लगा। 1878 में इसका इस्तेमाल कारखानों (Industry) के संदर्भ में होने लगा।
1945 ई. के पश्चात इस शब्द में कई अन्य पक्ष जुड़ गए और एक नए शब्द Underdevelopment' की अभिव्यक्ति हुई, जिसका अभिप्राय प्राकृतिक संसाधनों का उचित प्रयोग न होना से लगाया गया। बाद में इसका प्रयोग विकास की स्थिति को प्रदर्शित करने के लिए किया जाने लगा। विकास शब्द अपनी जटिलता की ओर अग्रसर हो रहा था। विभिन्न अर्थशास्त्री यह मानने लगे कि विकासशील एक थोपी गई अवधारणा हो सकती है, जबकि जिस पर वह थोपी जा रही है वह अपने अनुसार उस समय में विकसित होते हैं। आधुनिक विकास की अवधारणा में विकासशील राष्ट्रों को अनुदान दिए जाने की प्रक्रिया में उनकी अस्मिता का खारिजपन निहित है और उन्हें पूरे विश्व के बाजार पर निर्भर करता है।
पानसियान के अनुसार "विकास संकुचित अर्थ में परिवर्तन है यह वृद्धि से संबंधित है जो पहले से ही। किसी वस्तु में छिपे तौर पर उपलब्ध है।"
बोटोमोर का मानना है कि विगत कुछ समय से मोटे तौर पर दो रूपों में विकास की संकल्पना का इस्तेमाल किया जा रहा है, पहला, इसका उपयोग औद्योगिक समाज और ग्रामीण समाज, कृषि समाजों व आर्थिक रूप से पिछड़े एवं निर्धन समाजों में विभेद करने के लिए किया जा रहा है और दूसरा आधुनिकीकरण अथवा औद्योगीकरण की प्रक्रिया को विश्लेषित करने में किया जा रहा है।
हाँबहाउस द्वारा अपनी प्रसिद्ध कृति सोशल डेवलपमेंट में विकास के मुख्य रूप से चार आयामों का वर्णन किया गया है.
1. मात्रा में बढ़ोतरी
2. कार्यक्षमता में बढ़ोतरी
3. आपसी सहयोग
4. मानव की स्वतंत्रता
प्रो० इरमा एडेल्सेन के अनुसार, "आर्थिक विकास एक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा एक ऐसी आय व्यवस्था, जिसमें प्रति व्यक्ति आय वृद्धि की दर नीची या ऋणात्मक हो ऐसी अर्थव्यवस्था में बदल जाती है, जिसमें प्रति व्यक्ति आय में ऊँची दर से वृद्धि होना एक स्थायी और दीर्घकालीन विशेषता बन जाती.
रोस्टोव के अनुसार, "आर्थिक विकास एक ओर पूंजी व कार्यशील शक्ति में वृद्धि की दरों के बीच और दूसरी ओर जनसंख्या वृद्धि की दर के बीच ऐसा संबंध हैजिससे प्रति व्यक्ति उत्पाद में वृद्धि होती है" संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रतिवेदन के अनुसार विकास मानव की केवल भौतिक आवश्यकताओं से ही नहीं, बल्कि उसके जीवन की सामाजिक दशाओं की उन्नति से संबंधित होना चाहिए। अतः विकास में सामाजिक, सांस्कृतिक संस्थागत तथा आर्थिक परिवर्तन भी शामिल है"
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