प्रगति की संकल्पना और अर्थ - Concept and meaning of Growth
प्रगति की संकल्पना और अर्थ - Concept and meaning of progress
किसी निर्धारित लक्ष्य और आदर्श की ओर उन्मुखी क्रमिक उन्नति जो कि समाज के लिए कल्याणकारी होती है, को प्रगति कहते हैं। यह समाज विशेष के लिए अलग-अलग हो सकती है। यह आवश्यक नहीं कि किसी समाज में हो रही प्रगति दूसरे समाज के लिए भी प्रगति ही हो वह उसके लिए अवनति भी हो सकती है। यह समय के सापेक्ष रहने वाली अवधारणा भी है अर्थात किसी समाज के लिए जो आज प्रगति है, वह कल को उस समाज के लिए अवनति भी हो सकती है। इसके पीछे सीधा तर्क यह है कि जिस प्रकार से हमारे मूल्यों में परिवर्तन होते हैं उसी प्रकार से हमारी सामाजिक व मनोवैज्ञानिक दशा में भी परिवर्तन होता है, इसी कारण समय के अनुसार प्रगति की संकल्पना में भी परिवर्तन होता जाता है। एक उदाहरण की सहायता से इसे सरलता से समझा जा सकता है भारतीय वैदिक सभ्यता में उसी समाज को प्रगतिशील की संज्ञा दी जाती थी, जो धार्मिक कर्मकांडों और परंपराओं में गूढ़ तरीके से संलिप्त पाए जाते थे, परंतु आज की धारणा इससे बिल्कुल पृथक अस्तित्व रखती है आज उस समाज को प्रगतिशील की संज्ञा दी जाती है जो धार्मिक कर्मकाडों से दूर रहे।
वही पश्चिमी समाजों में उस व्यक्ति को प्रगतिशीत माना जाता है जो शराब का सेवन करता हो, नाचघरों में जाता हो और इसी प्रकार के अन्य कृत्यों में संलग्न हो। वहीं इसके विपरीत भारतीय समाज में शराब आदि के सेवन को अत्यंत निकृष्ट श्रेणी में रखा जाता है। इस प्रकार से देखा जा सकता है कि विभिन्न समाजों में और अलग-अलग समय में लोगों की धारणाओं में पर्याप्त अंतर पाया जाता है और इन्हीं के आधार प्रगति की संकल्पना को भी वैधता दी जाती है। इसी प्रकार कुछ समय पहले मोटर वायुयान रेल और अन्य सुख सुविधाओं के साधनों को भोग विलासिता का सूचक माना जाता था और यह भी कहा जाता था कि जो व्यक्ति इन क्रियाकलापों में संलिप्त हो जाता है वह धर्म आदि के उच्च आदशों से विमुख हमें लगता है और यही उसके विनाश का कारण बनता है। इसके विपरीत वर्तमान धारणा कुछ और ही कहता है। वर्तमान सामाजिक मूल्यों के परिवर्तन में विज्ञान और प्रौद्योगिकी का उल्लेखनीय योगदान है। आज उन वस्तुओं को प्रगति के रूप में माना जाता है जो विज्ञान और प्रौद्योगिकी के देन है।
यहाँ कुछ विद्वानों द्वारा की गई प्रगति की परिभाषाओं का उल्लेख किया जा रहा है
1. जिसबर्ग, प्रगति वह विकास अथवा वृद्धि है जिसका निर्धारण मूल्यों द्वारा किया जाता है।
2. हॉवहाउस, प्रगति से अभिप्राय सामाजिक जीवन में उन गुणों की वृद्धि से है जिन्हेंमनुष्य मूल्यों अथवा विचारयुक्त मूल्यों से संबंधित कर सको
3. आगवनं और निमकोफ, "प्रगति का अर्थ श्रेष्ठतर परिवर्तन से है और इसलिए इसमें मूल्य निर्धारण का समावेश होता है।"
4. मैकाइवर और पेज, "प्रगति में सामाजिक परिवर्तन की दिशा का संज्ञान नहीं होता वान किसी अंतिम उद्देश्य की ओर ले जाने वाली दिशा का भी संज्ञान होता है।"
5. लम्ले, प्रगति परिवर्तन है, लेकिन यह परिवर्तन किसी एक बांडित दिशा में होने वाला परिवर्तन है, किसी भी दिशा में होने वाला परिवर्तन नहीं।" निष्कर्ष के रूप में उपर्युक्त परिभाषाओं के आलोक में यह कहा जामकता है कि प्रगति की संकल्पना सामाजिक मूल्यों के सापेक्ष है। दो समाजों में से कौन समाज प्रगति कर रहा है और कौन सा समाज प्रगति नहीं कर रहा है, कौन समाज कितना प्रगति कर रहा है, आदि का निर्धारण उन समाओं के इतिहास एवं समाजों के मनोवैज्ञानिक पहलुओं के अध्ययन के बाद किया जा सकता है।
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