आर्थिक विकास एवं सामाजिक अवसर - Economic Development and Social Opportunities

आर्थिक विकास एवं सामाजिक अवसर - Economic Development and Social Opportunities

किसी भी देश क्षेत्र वा व्यक्तियों की आर्थिक समृद्धि के वृद्धि को आर्थिक विकास कहते हैं। नीति निर्माण की दृष्टि से आर्थिक विकास उन सभी प्रयत्नों को कहते हैं, जिनका लक्ष्य किसी जन-समुदाय की आर्थिक स्थिति व जीवन स्तर के सुधार के लिए अपनाये जाते हैं। आइन लिटिल ने विकास अर्थशास्त्र को परिभाषित करते हुए कहा है कि विकास अर्थशास्त्र मोटे तौर पर एडम स्मिथ से जॉन स्टुअर्ट मिल तक के प्रतिष्ठित विचारों सहित प्रति व्यक्ति आय की संवृद्धि से जुड़े समस्त चिंतन का सामाग्रह है। यहाँ विकास निश्चित रूप से आय की वृद्धि पर ही केन्द्रित हो गया है। हाल के वर्षों में आर्थिक विकासशास्त्र भी विकास क्रम के स्वरूप के व्यापकीकरण की ओर अग्रसर हुआ है। आर्थिक विकास के तहत आमतौर पर समझा जाता है, विकास के रूप में अच्छी तरह से अर्थव्यवस्था (जीडीपी, सकल घरेलू उत्पाद या एल.पी.) वास्तविक आय के वृद्धि में व्यक्ति इस आँकड़ा से अलग हो सकता है। विकास और प्रति व्यक्ति आय, यह स्तर और गतिशीलता को दर्शाता है। अक्सर आर्थिक विकास के कारकों को आर्थिक वृद्धि के प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया गया। बाधाओं के रूप में आर्थिक विकास अक्सर, संसाधन और पर्यावरण संबंधी बाधाओं के रूप मैसामाजिक उत्पादन की वृद्धि के साथ जुड़े लागत साथ-ही-साथ की एक विस्तृत श्रृंखलासरकार के अकुशल आर्थिक नीतियों को दर्शाते हैं।


कहने का तात्पर्य यह है कि अंततः हमें विभिन्न नीतियों का मूल्यांकन इसी आधार पर करना होगा कि क्या उनसे जनसामान्य को सुलभ योग्यताओं का संवर्धन हो रहा है अथवा नहीं। यह दृष्टिकोण उस विचार से बिलकुल भिन्न है, जिसमें आर्थिक आय की संवृद्धि को ही महत्वपूर्ण माना जाता है। भारत तथा अन्य अनेक देशों में आजकल नौकरशाही हस्तक्षेप से मुक्त बाजार अवसरों के संवर्धन की नीतियाम दिए जा रहे तर्क मुख्यतः आर्थिक प्रसार अथवा देश में उत्पादन एवं आय को बढ़ाने से ही जुड़े हैं। दूसरी ओर उत्पादन और आय पर ध्यान देने का औचित्य ही इस बात पर आधारित रहता है कि इनकी संवृद्धि से व्यक्ति की वांछित जीवन-यापन की स्वतंत्रता का संवर्धन होता है। आर्कि विकास के विश्लेषण में इन दोनों कारणों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। यही नहीं, उन नीतियों एवं संस्थागत परिवर्तनों पर भी गौर होना चाहिए, जिनसे मानवीय योग्यताएँ बढ़ती है। विकास कार्यक्रम की सफलता का मानदंड केवल उत्पादन एवं आय की वृद्धि नहीं हो सकता इसमें तो लोगों के सहज जीवन-यापन चाहिए। विश्व में किसी भी देश में विकास कार्यक्रम के मूल्यांकन की भाँति है 125/196 चल रहे आर्थिक सुधारों एवं नीतियों के मूल्यांकविश्लेषण पर भी समान रूप


हितकारी अर्थव्यवस्था अर्थशास्त्र की एक शाखा के रूप में स्थापित है जो किसी आर्थिक प्रणाली में संसाधनों के वितरण और कल्याण के मापन को दर्शाती है। हितकारी अर्थव्यवस्था के दो पक्ष होते हैं, पहला, आर्थिक क्षमता और दूसरा आय वितरण आर्थिक क्षमता काफ़ी सकारात्मक होती है और हमेशा इस दिशा में कार्य करती है कि संसाधनों की वृद्धि कैसे की जाए? आय वितरण ज्यादा मानकीय होता है और हमेशा इस दिशा में कार्य करता है कि संसाधनों का वितरण कैसे किया जाए। तत्पश्चात हमने परेटो के अनुकूलता के सिद्धांतों के तहत यह जाना कि एक आवंटन से दूसरे में गति जिससे कमसे कम एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को विपन्न गए बिना संपन्न हो सकता है। इसके बाद हमने यह समझने की कोशिश की कि कोई अर्थव्यवस्था तभी हितकारी हो सकती है जब स्वास्थ्य, शिक्षा और महिलाओं के सशक्तीकरण पर ध्यम दिया जाए। साथ ही आर्थिक विकास में सभी व्यक्तियों को समान अवसर प्रदान किया जाए तो देश में आर्थिक विकास होगा।