परिवार में जेंडर संबंध - Gender Relations in The Family
परिवार में जेंडर संबंध - Gender Relations in The Family
परिवार को समाज व व्यक्ति के लिए सृजनात्मकता की पहली सीढ़ी का दर्जा दिया जाता है। परिवार के निर्माण को हम मूल रूप से दो रूपों में वर्गीकृत कर सकते हैं पहला वह जो रक्त संबंधों पर आधारित होता है और दूसरा वह जो विवाह के संबंध पर आधारित होता हैसाथ सी. नुसयोम ने अपनी पुस्तक "सेक्स एंड सोशल जस्टिस" में कहा है, "विवाह स्त्री-पुरुष के मध्य का वह संबंध है जिसका एक पक्ष उन दोनों को यौन संबंध से प्राप्त होने वाला वैयक्तिक आनंद है तो दूसरा पक्ष है प्रजनन की प्रक्रिया और पारिवारिक संस्था से संबंधित अन्य सामाजिक जिम्मेदारियों का वा लेकिन विवाह ऐसी संस्था है जो अन्य संस्थाओं से प्रभावित हो सकती है और प्रभावित कर भी सकती है। अतः विवाह संस्था को यौन संबंधों तक ही सीमित न करके उसे न्याय, धर्म, नैतिकता, राजनीति, मानवाधिकार, अर्थशास्त्र आदि विषयों से अंतसंबंधित करते हुए मानवतावादी दृष्टि देने की आवश्यकता है।"
भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति सदैवउतार-चढ़ाव से गुजरती रही है। उनकी स्थिति में वैदिक युग से लेकर आधुनिक काल तक विविध परिवर्तन नियोजित हुए हैं तथा उसी के अनुरूप उनके अधिकारों में भी परिवर्तन होते रहे हैं। वैदिक युग में महिलाओं की स्थिति बेहतर थी, परिवार तथा समाज में उन्हें प्रतिष्ठा प्राप्त थी, शिक्षा का अधिकार प्राप्त था, संपत्ति में समान अधिकार प्राप्त थे। वैदिक एवं उत्तर वैदिक काल में महिलाओं को गरिमामय स्थान प्राप्तवा और उसे देवी सहधर्मिणी, सहचरी अद्धांगिनी का दर्जा दिया जाता था। किंतु || वीं शताब्दी से 19 वीं शताब्दी के मध्य भारत में महिलाओं की स्थितिबद से बदतर होती गई। यह महिलाओं के सम्मान अस्मिता, विकास और सशक्तिकरण का अंधकार युग था। मुगल शासन, सामंती व्यवस्था केंद्रीय सत्ता का नाश, विदेशी आक्रमण और शासकों की विलासितापूर्ण प्रवृत्ति ने महिलाओं को उपभोगमात्र की वस्तु में परिणित कर दिया था और इसके फलस्वरूप बाल विवाह, पर्दा प्रथा, अशिक्षा आदि जैसी विभिन्न सामाजिक कुरीतियों का जन्म हुआ, जिसने महिलाओं की स्थिति को अत्यंत निम्न बना दिया तथा उनके निजी व सामाजिक जीवन को प्रदूषित कर दिया। मध्यकाल में विदेशियों के आगमन ने भी स्त्रियों की स्थिति में अवनति लाने का काम किया। महिलाएँ एक चहारदीवारी में सिमटती चली गई और एक असहाय अबला, रमणी और भोग्या बनकर ही रह गई। इन सामाजिक समस्याओं के प्रत्युत्तर स्वरूप कई समाज सुधार आंदोलन चलाए गए और बाद में सरकार द्वारा भी विभिन्न अधिनियमों को नियोजित करके इसके निवारण हेतु उल्लेखनीय कदम उठाए गए।
इन कुरीतियों ने महिलाओं के जीवन को घर और बाहर दोनों ओर दूभर कर दिया। परिवार ने उनसे उनके सभी अधिकार छीन लिए और उन्हें पारिवारिक श्रमिक के तौर पर पनाह दी। समय परिवर्तित हुआ और समाज व परिवार में उनकी स्थिति में बदलाव हुए परंतु ये बदलाव संतोषजनक नहीं माने जा सकते। विवाह जैसी संस्था का इस्तेमाल महिलाओं पर तानाशाही के लिए नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि महिलाओं से जुड़े कई कानूनों और प्रावधानों को निर्मित किया जा चुका है तथापि उनकी पारिवारिक व सामाजिक स्थिति में कुछ खास परिवर्तन नहीं हुए हैं। इसके पीछे स्पष्ट कारण यह है कि महिलाएं स्वयं से संबंधित उन नियमों से अनभिज्ञ हैं। इनके सही ढंग से क्रियान्वयन के लिए आवश्यक है कि शिक्षा और सामाजिक-राजनीतिक स्तर से ही इसकी शुरुआत की जाए। जब सामाजिक स्तर पर परिवर्तन होंगे तब परिवार व विवाह जैसी संस्थाओं में भी परिवर्तन संभव है। आज भी महिलाओं की सुरक्षा और अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न लगा हुआ है।
परंपरागत भारतीय समाज में सदैव से ही महिलाओं की स्थिति पुरुषों के अधीन रही है। महिलाओं की दयनीय स्थिति के कारण अशिक्षा आर्थिक निर्भरता, धार्मिक सभ्यता, रूढ़िवादिता, रीति-रिवाज आदि को कारण माना जा सकता है। चूँकि भारत विभिन्न वर्गोएँ जतियों, धर्मों, समूहों समुदायों से संबंधित देश है जिसमें विभिन्न प्रकार के लोग निवासरत हैं। ऐसे में महिलाओं के लिए विवाह के पश्चात इन सभी मानकों के आचरण व्यवहार और अनुपालना में विभेद परिलक्षित किया जा सकता है।
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