मानव अधिकारों की सीमाएँ - human rights limits
मानव अधिकारों की सीमाएँ - human rights limits
प्रकृति के अलावा मनुष्यों द्वारा बनाए गए विधि सम्मत कानून का भी यह कर्तव्य है कि वह मानवाधिकारों की रक्षा करें। हमारे मानव समाज में मानवाधिकारों के प्रति सचेतता आम लोगों में विशेष रूप से दिखाई नहीं पड़ती है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हमारे देश में आए दिन पटित होने वाली महिलाओं के शारीरिक और मानसिक शोषण और प्रताड़ना की घटनाएँ प्रतिदिन होने वाली हजारों भ्रूण हत्याएँ भारतीय संस्कृति की गरिमा तार तार करती हैं। भ्रूण हत्या, घरेलू हिंसा शारीरिक प्रताड़ना और मानसिक उत्पीड़न आदि अत्याचारों से पीड़ित महिलाओं के विषय में मानवाधिकारों की आवश्यकता को रेखांकित करते ही हमारा समाज प्रायः मौन हो जाता है। मानव अधिकारों पर बातचीत की गंभीर सीमाएँ हैं, क्योंकि पहली पीढ़ी के नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अत्यधिक ध्यान दिया गया है। मानव अधिकारों पर किसी भी परिचर्चा में देश के मानव अधिकारों का रिकॉर्ड ही उसके सभी तीन पीढ़ियों के मानव अधिकारों के प्रदर्शन को प्रदर्शित करने वाले समग्र सामाजिक आर्थिक विकास की बजाय पहले आता है। पहली पीढ़ी के अधिकार न्यायपूर्ण समाज के लिए आवश्यक है लेकिन ये स्वयं सामाजिक समानता अथवा सामाजिक न्याय निर्मित नहीं कर सकते हैं। यदि ऐसे लक्ष्यों को प्राप्त करना हो तो कम से कम दूसरी पीढ़ी के अधिकारों पर भी विचार करना चाहिए और तीसरी पीढ़ी के अधिकारों को भी सामाजिक न्याय की पूर्ण शर्तों के रूप में समावेशित किया जाना चाहिए।
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