भारतीय संविधान तथा मानव अधिकार - Indian Constitution and Human Rights
भारतीय संविधान तथा मानव अधिकार - Indian Constitution and Human Rights
मानवाधिकार पर सार्वभौम घोषणा का प्रारूप तैयार करने में भारत ने सक्रिय भागीदारी की। संयुक्त राष्ट्र के लिए घोषणा पत्र का मसौदा तैयार करने में भारतीय प्रतिनिधि मंडल ने विशेष रूप से लैंगिक समानता को दर्शाने की जरूरत को उजागर करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। भारत छह प्रमुख मानव अधिकार प्रतिज्ञापत्र और बच्चों के अधिकारों पर करार के वैकल्पित प्रोटोकॉल का हस्ताक्षरकर्ता है। भारतीय संविधान के लागू होने के बाद सार्वभौम घोषणा के अधिकांश अधिकारों को इसके दो भागों मौलिक अधिकार और राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में शामिल किया गया है, जो मानव अधिकारों के सार्वभौम घोषणा के लगभग क्षेत्रों को अपने में समेटे हुए हैं।
अधिकारों के पहले सेट में अनुच्छेद 2 से 21 तक घोषणा और इसके अंतर्गत संविधान के अनुच्छेद 2 से से 35 तक में मौलिक अधिकारों को शामिल किया गया है। इसमें समानता का अधिकार स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार, धार्मिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक स्वतंत्रता का अधिकार कुछ विधियों की व्यावृति और सांविधानिक उपचारों का अधिकार शामिल है।
अधिकारों के दूसरे सेट में अनुच्छेद 22 से 28 तक घोषणा और संविधान के अनुच्छेद 36 से 51 तक राज्य के नीति निर्देशक तत्वों को शामिल किया गया है। इसमें सामाजिक सुरक्षा का अधिकार कार्य का अधिकार, रोजगार चुनने का स्वतंत्र अधिकार बेरोजगारी खिलाफ काम सुरक्षा और कार्य के लिए सुविधाजनक परिस्थितियां समान कार्य के लिए समान वेतन मानवीय गरिमा का सम्मान, आराम और छुट्टी का अधिकार, समुदाय के सांस्कृतिक जीवन में निर्वाध हिस्सेदारी का अधिकार मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार, लोगों के कल्याण को बढ़ावा देना समान न्याय और मुफ्त कानूनी सहायता और राज्य द्वारा पालन गए जाने वाले नीति के सिद्धांतों को शामिल किया गया है। हालांकि मानव अधिकारों के लिए सम्मान भारतीय लोकाचार में सामाजिक दर्शन के एक भाग के रूप में लंबे समय से एक अस्तित्व में है।
मानव अधिकार रक्षा अधिनियम, 1993 भारत ने मानव अधिकार रक्षा अधिनियम, 1993 को बनाकर संघ तथा राज्य स्तर पर मानवाधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करने के लिए आयोगों की स्थापना आवश्यक कर दिया। इस अधिनियम की वजह से संघ स्तर पर राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग तथा राज्यों के स्तर पर राज्य मानव अधिकार आयोगों की स्थापना करना कानूनी रूप से आवश्यक हो गया। यह आयोग मानव अधिकारों तथा उससे संबंधित विषयों को सुलझाने के लिए जिम्मेदार हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तथा राज्य मानवाधिकार आयोग अब नागरिकों के रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन गया है साथ ही देश के शासन में भी इसका असर बढ़ता हुआ महसूस किया जा सकता है। अधिकारों में बारे में नागरिकों में अभिरुचि तथा जानकारी लगातार बढ़ रही है। भारत विश्व में मानवाधिकारों की रक्षा का पक्षधर है तथा इसके लिए कार्यरत संप का समर्थक भी है।
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