विकास के स्तर - Level of Development
विकास के स्तर - Level of Development
विकास एक प्रकार का परिवर्तन है, जिसका सीधा संबंध आर्थिक पहलुओं से है। इस आधार पर समाज को मोटे तौर पर चार भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है.
1. खानाबदोशी अथवा घुमंतु जीवन इस स्तर पर मनुष्य शिकार और खाद्य पदार्थ की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान विचरित करता था। इसे फिरदी शिकारी स्तर भी कहा जाता है। वह आर्थिक जीवन के विकास का पहला स्तर माना जाता है। शिकार करने के कारण मनुष्यों को कई खतरों से भी गुजरना पड़ता था, जिसके कारण वे प्रायः झुंड में रहना पसंद करते थे। इसी कारण सामाजिक जीवन और संपर्क की प्रधानता थी।
2. पशुचारी जीवन शिकारी जीवन बिताने के बाद का अगला स्तर, जिसमें मनुष्य पशुओं को पालना आरंभ कर दिया। घोड़े गाय, भेड़, बकरियाँ आदि को पालने में अधिक मात्रा में रुचि थी। और इसके पीछे स्पष्ट कारण यह था कि ये जानवर दूध मांस खाल आदि के उत्पादन में काम लिए जाते थे। कृषि अस्थायी तौर पर की जाती थी
3. कृषक जीवन इस स्तर पर कृषि स्थायी तौर पर की जाने लगी और अनेक प्रकार की फसलों व उनके लिए उपयुक्त समय के बारे में संज्ञान हो चुका था। कृषि कार्य में संलिप्त व्यक्तियों ने अपने रहने के लिए स्थायी वस्तियों का निर्माण कर लिया। लोगों में वस्तुओं के विनिमय की प्रथा प्रचलित थी। इस काल में सामाजिक संपत्ति का विकास हुआ और इस पर अधिकार संपूर्ण समाज का होता था। धीरे-धीरे कुटीर उद्योगों का विकास होना आरंभ हुआ और कुम्हार लोहार, बढ़ई आदि ने छोटी-मोटी वस्तुओं का निर्माण करना आरंभ कर दिया। इन वस्तुओं से उन्होंने अपने जीवन-यापन के मार्ग को प्रशस्त किया। श्रम विभाजन की व्यवस्था इसी स्तर में अस्तित्व में आई.
4. औद्योगिक जीवन प्रौद्योगिकी और विज्ञान में विकास और मशीनी क्रांति के कारण इस स्तर का जन्म हुआ। इस स्तर को आर्थिक विकास के चरमोत्कर्ष की दशा माना जाता है। यातायात के संसाधनों में बड़े पैमाने पर वृद्धि हुई है और इसके कारण अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में वृद्धि हुई है। भौतिक और विलासितापूर्ण जीवन में बढ़ोत्तरी हुई है। वैयक्तिक संपत्ति के महत्व में वृद्धि हुई है। बड़े पैमाने पर कल-कारखानों का विस्तार हुआ है।
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