हितकारी अर्थव्यवस्था - Profitable Economy

हितकारी अर्थव्यवस्था - Profitable Economy

हितकारी अर्थव्यवस्था अर्थशास्त्र की एक शाखा के रूप में स्थापित है, जो किसी आर्थिक प्रणाली में संसाधनों के वितरण और कल्याण के मापन को दर्शाती है। यह अर्थव्यवस्था के भीतर दक्षता के आवंटन और उससे संबद्ध आय वितरण के निर्धारण के लिए सूक्ष्म आर्थिक तकनीकों का उपयोग करती है। व्यक्ति समूह समुदाय अथवा समाज की मौलिक इकाई के रूप में होता है अतः हितकारी अर्थशास्त्र सामाजिक विश्लेषण व्यक्तियों के आर्थिक क्रियाकलापों के संदर्भ में करती है। आर्थिक विश्लेषण की दो श्रेणियाँ होती है; पहली, सकारात्मक तथा दूसरी मानकीया सकारात्मक विश्लेषण हमेशा इस दिशा में कार्य करता है। कि क्या उम्मीद है अथवा क्या की जा सकती है? जबकि नकारात्मक विश्लेषण इस बात पर जोर देते हैं। कि क्या उचित है अथवा क्या बांछनीय है हितकारी अर्थव्यवस्था बाद वाली श्रेणी में आती है और परिणामों की बांछनीयता को मापने और सामाजिक व्यवस्था प्राप्त करने की विधियों अथवा तकनीकों की जाँच करती है। यह एक अनुपयुक्त विज्ञान के रूप में है जो सकारात्मक अर्थव्यवस्था से स्थायी सैद्धांतिक संबंधों को एक अंत के संदर्भ में एकत्रित करता है जो समाज का आर्थिक कल्याण है (रोटेनबर्ग, 1961) । यह जन नीति के लिए मार्गदर्शन का कार्य करता है।


हितकारी अर्थव्यवस्था के दो पक्ष होते हैं, पहला, आर्थिक क्षमता और दूसरा आय वितरणा आर्थिक क्षमता काफी सकारात्मक होती है और हमेशा इस दिशा में कार्य करती है कि संसाधनों की वृद्धि कैसे की जाए? आय वितरण ज्यादा मानकीय होता है और हमेशा इस दिशा में कार्य करता है कि संसाधनों का वितरण कैसे किया जाए। चूंकि अर्थव्यवस्था को व्यक्तियों द्वारा अपने लाभों अथवा हितों को बढ़ाने का विज्ञान माना जाता है, अतः हितकारी अर्थव्यवस्था हमेशा समस्या से सरोकार रखती है। अर्थव्यवस्था कब यह कह सकती है कि समाज किसी परिवर्तन के परिणाम स्वरूप बेहतर हुआ है अथवा वैकल्पिक रूप से हम कब कह सकते हैं कि सामाजिक लाभ में वृद्धि हुई है अथवा वह बढ़ा हुआ है (रोपर्ड 1956) 0


पारंपरिक हितकारी अर्थव्यवस्था गति मैत्री किसी भी क्रिया की विवेचना समग्र उपयोगिता में उसके योगदान के संदर्भ में करनी चाहिए जिसका अर्थ है उससे प्राप्त होने वाली संतुष्टिएवं खुशी किसी भी नीति के लिए श्रेष्ठ मानक अधिकतम व्यक्तियों को अधिकतम खुशी प्रदान करता है। अतः सामाजिक इष्टतम अथवा अधिकतम सामाजिक कल्याण को संसाधनों के ऐसे आवंटन के रूप में परिभाषित किया जाता है जिसमें व्यक्तिगत हितों का योग अधिकतम होता है। उपयोगितावादी अभिगम के साथ मुख्य समस्या उसका यह मानना था कि उपयोगिताओं को वास्तविक रूप में मापा जा सकता है। बिल्फ्रेडो परेटो ने इस अवधारणा का विरोध किया, क्योंकि उनका मानना था कि उपयोगिता महज विभिन्न उपभोग पूलों के बीच व्यक्तिगत प्राथमिकताओं का साधारण प्रदर्शन है। तत्पश्चात परेटो ने इष्टतम समाज कल्याण को मापने की तकनीक प्रस्तुत की जिसे अब परेटो अनुकूलता के रूप में जाना जाता है। 



आय वितरण पर निगाह डाली और पाया कि विषमता की स्थिति एक पैटर्न के रूप में तकरीबन ऐसी ही है। इसलिए उन्होंने इसे नियम की संज्ञा दी। परेटो का मानना था कि विषमता इसी तरह जारी रहेगी, क्योंकि मालदार लोग अपने राजनीतिक रुतबे का फायदा उठा कर वितरण के इस पैटर्न को बदलने ही


नहीं देंगे। परेटो के इस नियम से बहुत विवाद पैदा हुआ क्योंकि इसके साथ कई सामाजिक-राजनीतिक मुद्दे जुड़े हुए थे जिन पर विचार करने से अर्थशास्त्री आम तौर पर कतराते रहते थे, लेकिन परेटो की इस खोज को आर्थिक विज्ञान में होने वाली एक महत्त्वपूर्ण प्रगति का दर्जा भी मिला परेटो से पहले किसी अर्थशाखी ने दुनिया के बहुत से देशों की आमदनियों के आकड़ों का विश्लेषण नहीं किया था। ओर्डिनल उपयोगिता को कार्डिनल उपयोगिता पर प्राथमिकता दे कर परेटो ने अर्थशास्त्रियों से आग्रह किया कि वे उपभोक्ता से बहुत ज्यादा अपेक्षाएँ न करें। कार्डिनल उपयोगिता के मुताबिक उपभोक्ता से न केवल यह उम्मीद की जाती थी कि वह एक वस्तु के ऊपर दूसरी को प्राथमिकता देना जानता होगा बल्कि यह भी जानता होगा कि उस प्राथमिकता की मात्रा क्या होगी, जबकि ओर्डिनल उपयोगिता के सिद्धांत के अनुसार उपभोक्ता से केवल प्राथमिकता देने की आशा ही की जानी चाहिए थी। व्यवहार में कार्डिनल और ओर्डिनल उपयोगिता के बीच अंतर इस तरह समझा जा सकता है अगर एक उपभोक्ता अनन्नास से ऊपर आम को प्राथमिकता देता है, तो उससे यह जानने की अपेक्षा करना गलत होगा कि वह आम को अनन्नास से दो सौ फीसदी उपयोगी मानता है या डेढ़ सौ फीसदी उपभोक्ता का खरीद व्यवहार ऐसी कोई सूचना नहीं देता। परेटो के इस आग्रह का परिणाम यह हुआ कि विभिन्न लोगों द्वारा ग्रहण की जाने वाली उपयोगिता को नापना जरूरी नहीं रह गया। जेरेमी बेंथम और जेम्स स्टुअर्ट मिल द्वारा विकसित उपयोगितावाद का दर्शन में इस उलझन से ग्रस्त था। परेटो के सूत्रीकरण का नतीजा यह हुआ कि उपयोगिता नापने का पैमाना बनाने की कोशिशें ही रुक गई।

इसी तरह अंतर्वैयक्तिक संबंधों में भी उपयोगिता की तुलनाएँ करने का रवैया छोड़ दिया गया। यही काफ़ी समझा जाने लगा कि अगर दो व्यक्ति दो चीज़ों का विनिमय कर रहे हैं, तो वे जो दे रहे हैं उसके मुकाबले उनके लिए प्राप्त की जाने वाली चीज़ की उपयोगिता अधिक है। अगर ऐसा न होता तो वे यह विनिमयन करते ही क्यों परेटो का तीसरा योगदान अनुकूलतम परिस्थिति के सिद्धांत के रूप में सामने आया। आर्थिक मामलों की अनुकूलतम स्थिति की खोज करते समय परेटो इस नतीजे पर पहुंचे कि कुछ आर्थिक परिणाम किसी भी तरीके से बेहतर नहीं किए जा सकते। अगर किसी एक व्यक्ति की स्थिति को बेहतर किया जाना है तो उसके लिए। किसी दूसरे व्यक्ति की स्थिति को कमतर करना होगा। यानि कुल मिला कर स्थिति में कोई सुधार नहीं होगा। परेटो का कहना था कि दो व्यक्ति तभी कोई लेन-देन करते हैं जब दोनों को फायदे की उम्मीद हो। अगर लाभ किसी एक को ही होगा तो विनिमय होगा ही नहीं। ऐसी स्थिति के बावजूद अगर दबाव डाल कर वस्तुओं का पुनर्वितरण करने की कोशिश की जाएगी तो कुल मिला कर स्थिति में या आर्थिक प्रदर्शन में कोई सुधार नहीं होगा। इसलिए बाजार में मुक्त विनिमय की स्थिति ही अनुकूलतम कही जा सकती है।