जनसंख्या और विकास में संबंध - Relationship Between Population and Development

जनसंख्या और विकास में संबंध - Relationship Between Population and Development

जनसंख्या और विकास में संबंध - Relationship Between Population and Development

जनसंख्या और विकास में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से संबंध सदैव रहता है। यह संबंध अंतसंबंधित होता है


• जनसंख्या में वृद्धि अथवा कमी किस प्रकार से विकास पर प्रभाव डालती है.



जनसंख्या के गठन और उसकी संरचना में सामाजिक आर्थिक विकास कैसे परिवर्तन लाता है? वस्तुतः जनसंख्या और विकास के अंतसंबंधों के लिए निर्धनता का क्षेत्र सबसे विवादित रह है। जहाँ एक और विकसित देशों का मानना है कि तीसरी दुनिया के देशों द्वारा पृथ्वी पर जनसंख्या के अतिरिक्त बोझ को उत्पन्न किया जा रहा है, वहीं तीसरी दुनिया के देशों का मत है कि यह एक काल्पनिक तथ्य है जिसका उनके द्वारा अपनी जनसंख्या और संसाधनों के उपयोग से ध्यम भग करने के उद्देश्य से प्रसार किया जा रहा है। कुछ बुद्धिजीवियों का मत है कि जनसंख्या वृद्धि के कारण बेरोजगारी आती है जिससे उनके आय और संसाधनों पर अतिरिक्त भार पड़ता है और बेरोजगारी के कारण ही देश में निर्धनता फलती-फूलती है। इसके इतर दूसरा मत यह मानता है कि जनसंख्या एक प्रकार से संसाधन है जिसका उपयोग श्रम प्रधान उत्पादन प्रणाली में उत्पादनकारी के रूप में किया जा सकता है और वह देश के विकास में उल्लेखनीय योगदान प्रस्तुत करेगा। यहाँ जनसंख्या और विकास से संबंधित कुछ दृष्टिकोणों पर सूक्ष्म विवरण प्रस्तुत किया जा रहा है।


माल्थस का मत


टी. आर. माल्थस पहले अर्थशास्त्री थे, जिन्होंने जनसंख्या की समस्याओं का वैज्ञानिक ढंग से विश्लेषण प्रस्तुत किया है। इन्होंने 18 वीं शताब्दी में यूरोप के अनेक देशों की जनसंख्या वृद्धि का गहन अध्ययन किया और जनसंख्या के कारण प्रभाव व उसे नियंत्रित करने का उपाय प्रस्तुत करने का प्रयास किया। उन्होंने अपनी कृति "एन एस्से ऑन द प्रिंसिपल्स ऑफ पापुलेशन' (1978) में जनसंख्या सिद्धांत कि ठोस नींव रखी। माल्थस सिद्धांत की प्रमुख तीन मान्यताएं हैं जो निम्न हैं


मानव के अस्तित्व के लिए भोजन आवश्यक है।


• महिला और पुरुष दोनों में काम की इच्छा स्वाभाविक व अनिवार्य है जिसके कारण संतानोत्पत्ति भी अनिवार्य हो जाती है।


कृषि में उत्पादन हास नियम क्रियान्वित होता है।


इस सिद्धांत के प्रमुख अंग निम्न हैं।


• जनसंख्या की शक्ति भूमि की शक्ति की तुलना में अत्यधिक व अनंत है।


• अनियंत्रित इया में वृद्धि ज्यामितीय अनुपात में होती है।


प्रकृति का नियम मनुष्य के लिए खाद्य सामाग्री को अनिवार्य आवश्यकता बना देता है।


• जीवन निर्वाह में परेशानी के कारण सदैव जनसंख्या वृद्धि पर एक प्रभावपूर्ण नियंत्रण बना रहता


इन मूल बिंदुओं के आलोक में यह परिलक्षित होता है कि जनसंख्या, 2,4,8,16,32,64 के क्रम में बढ़ती है, जबकि खाद्य सामाग्री 1,2,3,4,5,6,7,8 के क्रम में बढ़ती है। माल्थस का मानना था कि प्रत्येक 25 वर्षों के पश्चात जनसंख्या पूर्व की दोगुनी हो जाती है। इस प्रकार यह पता चलता है कि जनसंख्या वृद्धि कि उच्च दर के कारण निर्धनता और दुख परिणाम के रूप में प्राप्त होते हैं माल्बस ने इसके निवारण के लिए दो प्रकार के निरोध बताए हैं- सकारात्मक और नकारात्मक निरोधा सकारात्मक निरोध में प्राकृतिक प्रकोप (अकाल, महामारी, बाद, भूकंप आदि) से जनसंख्या कम हो जाती है। नकारात्मक निरोध एक प्रकार का उपाय है, जिसे माल्थस ने प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार जनसंख्या नियंत्रण के लिए निर्धन व्यक्तियों द्वारा प्रजनन को बलपूर्वक रोकना देर से विवाह करना, दुराचार को रोकना आदि उपाय हो सकते हैं। वे निर्धनों के लिए खैरात आदि के सख्त विरोधी थे।


मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य


मार्क्स और एजेल्स का मत माल्थस के सिद्धांत का समालोचनात्मक माना जा सकता है। इस परिप्रेक्ष्य जनसंख्या वृद्धि का प्रमुख कारण निर्धनता को माना जाता है, जनसंख्या और निर्धनता दोनों उत्पादन की पूँजीवादी व्यवस्था का परिणाम है। जब उत्पादन की प्रणाली में परिवर्तन होता ही तो इससे जनसंख्या वृद्धि में भी परिवर्तन आता है। मार्क्स का मानना है कि ग्रामीण इंग्लैंड और अति जनसंख्या में अंतर का कारण श्रमिकों के श्रम का वस्तु की तरह उपयोग करना था। इस तरह धीरे-धीरे वे श्रमिक, भूमिहीन श्रमिक बन गए जो किराए पर श्रम को बेचने हेतु विवश हो गए। दूसरी ओर विनिर्माण उद्यमों के विकास से छोटे कारखानों के स्थान पर बड़े कारखानों के लिए आधारशिला तैयार की, जिनमें कुछ काम मशीनों से होने के कारण धीरे-धीरे श्रमिक कम होते चले गए। मार्क्स का मानना है कि मजदूरी की माँग के असफल होने के कारण निर्धनता आती है न कि मजदूरों की आपूर्ति में वृद्धि के कारण यहाँ मज़दूर वर्ग अधिक से अधिक श्रमिक जमा करने के लिए प्रजनन करेगा।


नवमाल्थसवादी दृष्टिकोण


19 वीं और 20 वीं शताब्दी में माल्थस द्वारा प्रेरित विद्वानों द्वारा नवमाल्थसवादी विचारधारा को प्रस्तुत किया गया। यह कुछ मामलों में माल्थस के सिद्धांत से पृथक था। यह शब्द डॉ सेम्यूल वेन हॉटन द्वारा बनाया गया था। नवमाल्थसवादी दृष्टिकोण तीसरी दुनिया के देशों के लिए जनसंख्या नियंत्रण नीतियों व कार्यक्रमों को प्राथमिकता देता है। यह दृष्टिकोण आवश्यक रूप से उच्च जन्म दर वाले देशों को अपनी निर्धनता और अविकास के लिए जिम्मेदार मानते हैं। नव माल्थसवादियों द्वारा जन्म नियंत्रण के कृत्रिम साधनों के प्रयोग के बारे में निम्नांकित तर्क दिए हैं।


i. उपलब्ध संसाधनों के अनुरूप ही जनसंख्या का आकार होना चाहिए जिससे कि लोगों का जीवन-यापन उचित तरीके से हो सके। इसलिए जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित रखना आवश्यक हो जाता है।


 ii. लोगों के स्वस्थ और रोगमुक्त होने के लिए यह आत्यंत आवश्यक है कि जनसंख्या की वृद्धि दर नियंत्रित रखा जाय।


 iii. विवाह का उद्देश्य मात्र संतानोत्पत्ति ही नहीं होता है वरन इसे सामाजिक दायित्वों व कर्तव्यों से परिभाषित संबंधों के रूप में भी माना जाना चाहिए।


सामान्यता जन्म नियंत्रण को अनैतिक माना जाता है परंतु यह सही नहीं है। जन्म नियंत्रण किसी देश समाज अथवा परिवार के सामाजिक आर्थिक आयामों पर ही प्रभाव नहीं डालता है, अपितु यह अंतरराष्ट्रीय पक्षों को भी प्रभावित करता है।