सेक्स (लिंग) और जेंडर - Sex and Gender

सेक्स (लिंग) और जेंडर - Sex and Gender

सेक्स (लिंग) और जेंडर - Sex and Gender

विकास में संपूर्ण मानव जाति की भूमिका महत्वपूर्ण रही है चाहे वह पुरुष हो अथवा स्त्री जनसंख्या के आकार का हस्तक्षेप प्रत्यक्ष रूप से विकास पर देखा जा सकता है और इस आकार में महिला व पुरुष दोनों सम्मिलित होते हैं। नारीवादी चिंतन और विद्वानों का सबसे बड़ा योगदान है सेक्स और जेंडर में अंतर स्पष्ट करना। हालांकि इन दोनों शब्दों को एक ही मान लिया जाता है, परंतु इन दोनों शब्दों में पर्याप्त अंतर होता है सेक्स जैविक पक्ष को इंगित करता है, जो स्त्री और पुरुष में विद्यमान जैविक विभेद को प्रस्तुत करता है। वहीं जेंडर शब्द सामाजिक पक्ष का प्रतिनिधित्व करता है, जो स्त्री और पुरुष के मध्य सामाजिक भेदभाव को प्रदर्शित करता है। जेंडर शब्द इस बात को पुष्ट करता है कि जैविक भेद से इतर जितने भी विभेद दिखते हैं, वे प्राकृतिक नहीं हैं, अपितु उन्हें समाज द्वारा बनाया गया है। इस संबंध में एक और मत सामने आता है कि यदि इसे समाज द्वारा रचा गया है तो इसे समाप्त भी अवश्य किया जा सकता है। समाज द्वारा ऐसा करने के लिए पूरी प्रक्रिया चलाई जाती है।

अर्थात सामाजीकरण की प्रक्रिया के अंतर्गत जन्म से ही बालक व बालिका को अलग-अलग तरीके से अनुशासित किया जाता है अलग तरीके से पालन-पोषण किया जाता है, अलग सीख दी जाती है, वहाँ तक कि उनके निषेधों में भी पर्याप्त अंतर देखने को मिलता है। इस प्रक्रिया की हम सभी समाजों में महसूस सकते हैं। लड़कों में पुरुषत्व और महिलाओं में खीत्व के तत्वों को समावेशित किया जाता है और उन्हें उसी के अनुरूप व्यवहार करने की पर्याप्त शिक्षा दी जाती है लड़कियों को शर्मीली, दयालु, कोमल, सेवाभाव रखने वाली साधारण व घरेलू समझा जाता है तथा लड़कों को क्रोधी, मजबूत, ताकतवर सख्त चीर समझा जाता है और समाज द्वारा इसी के अनुरूप उन्हें ढाला जाता है। जैविक बनावट और संस्कृति के अंतर्संबंधों को समेटते हुए जेंडर के विमर्श पर विश्लेषित किया जाय तो प्राप्त निष्कर्ष यह है कि महिलाओं की शारीरिक बनावट भी सामाजिक बंधनों और सौंदर्य के मापदंडों द्वारा नियत की गई है। अर्थात् महिलाओं का शारीरिक स्वरूप जितना प्रकृति से निर्धारित हुआ है उतना ही संस्कृति से भी।


सामाजिक आधार पर यदि इसे विश्लेषित किया जाए तो स्पष्ट तौर पर स्त्री की भूमिका शोषित की रही और पुरुष की शोषक की। आरंभिक नारीवादियों के लेखन में इसका उल्लेख मिलता है वथा माट फूलर द्वारा लिखित कृति वुमन इन द नाइटोथ सेंचुरी (1845) में, हैरिस्ट टेलर मिल की कृति 'इन फ्रेनचीसमेन्ट ऑफ वुमेन" (1851) में जॉन स्टुअर्ट मिल की पुस्तक 'ए सब्जेक्शन ऑफ वुमन" (1865) में और फ्रेडरिक ऐगल्स द्वारा लिखित प्रसिद्ध पुस्तक परिवार निजी संपति और राज्य की उत्पति (1884) आदि पुस्तकों में मिलता ही आगे चलकर पर इस विषय पर बहुत लेखन कार्य हुए। जिनमें से प्रमुख सिमोन द बुवा की कृति 'द सेकंड सेक्स (1949), बेड्डी फ्रीडेन द्वारा लिखित "ढ फेमिनिन मिस्टिक" (1963), एस. एफ. स्टोन की कृति "डायलेक्टिक ऑफ सेक्स (1968) और जूलियट मिशेल की वुमेन स्टेट" (1971) आदि प्रमुख हैं।


जेंडर एक समय में एक विशेष आयाम पर महिला अथवा पुरुष से संबंधित आर्थिक सामाजिक व सांस्कृतिक विशिष्टताओं और अवसरों को प्रदर्शित करता है। कई देशों में यह माना जाता है कि लिंग द्वारा ही संस्कृति का निर्धारण होता है क्योंकि नियम और कानूनों का नियोजन महिला और पुरुष को संदर्भित करके किया जाता है। महिलाओं के लिए घरेलू काम और पुरुषों के लिए बाहरी काम जेंडर व्यक्ति की सामाजिक अस्मिता से जुड़ा हुआ है परंतु सेक्स मनुष्य के शरीर मात्र से संबंधित होता है। जेंडर एक मानसिक संरचना है जबकि सेक्स एक जैविक अथवा शारीरिक संरचना है।

जेंडर का जुड़ाव सामाजिक पक्ष से है परंतु सेक्स शरीर के रूप और आकार का प्रतिनिधित्व करता है। जेंडर मनोवैज्ञानिक है और इसकी अभिव्यक्ति सामाजिक है, परंतु सेक्स संरचनात्मक प्रारूप को धारण किए हुए है। मासपेट मीड के अनुसार, "अनेक संस्कृतियों में नारीत्व और पुरुषत्व को विभिन्न ढंग से समझा जाता रहा है। जैसे जन्म से ही महिलाओं और पुरुषों के मध्य कुछ विशेष तरीके से विभेद करने का प्रयास आरंभ कर दिया जाता है और इस अंतर को जीवन भर बनाए रखा जाता है।"