भारत में सामाजिक कार्य और मानव अधिकारों का आधारी ढाँचा - Social Work and Human Rights Infrastructure in India
भारत में सामाजिक कार्य और मानव अधिकारों का आधारी ढाँचा - Social Work and Human Rights Infrastructure in India
भारतीय संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों में मानव अधिकार अंतर्भूत है। ये अधिकार भारतीय न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय है भारतीय न्यायालयों द्वारा मानवाधिकारों की सक्रिय रूप से रक्षा करने की बात भी स्वीकार की गयी है। इस प्रकार अनेकों न्यायिक दृशन्त भी जीवन की स्वतंत्रता समता गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार आदि मौलिक अधिकारों एवं मानव अधिकारों के प्रतिबिंबित उदाहरण है। वास्तव में मानवीय जीवन और अधिकारों की रक्षा किसी देश के मानवाधिकार कानूनों के लिए गौरवान्वित करने वाली बात है। मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा पत्र के परिप्रेक्ष्य में भारत सरकार ने मई 1993 में मानवाधिकार आयोग का गठन कर इस दिशा में सार्थक भूमिका निभायी है। भारत के संविधान की प्रस्तावना से स्पष्ट होता है कि भारत के सभी नागरिकों को गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 विधि के समक्ष समता का अधिकार देता है, तो अनु० 15 भेदभाव पर रोक लगाता है, अनु0 16 (1) लोक सेवा में अवसर की समानता तथा अनुच्छेद 22 संरक्षण का अधिकार देता है।
महिलाओं को विशेषसंरक्षण प्रदान करने हेतु संविधान के अनुच्छेद 15(3), 42, 34, 39 तथा संविधान के 73 वें एवं 75 में संशोधन द्वारा महिलाओं को पंचायत चुनाव में 33 प्रतिशत आरक्षण दिया गया वही सार्वभौमिक घोषणा पत्र के अनुच्छेद 25 की उपधारा 2 में अभिवर्णित है कि राज्य कल्याण की वृद्धि के लिए महिलाओं को विशेष संरक्षण प्रदान करेगा। वास्तकों भारत में मानवाधिकार की जड़े हमारी सामाजिक व्यवस्था, आर्थिक बनावट एवं सांस्कृतिकपरपराओं में निहित है। इसके बाद भी समय-समय पर मानव अधिकारों को और मजबूती देने के उद्देश्य से सूचना का अधिकार कानून, 2005 में लागू किया गया। जिसके अंतर्गत सामाजिक कार्यकर्ता भी सूचना का अधिकार कानून का मानव अधिकारों के दुर्व्यवहार और उल्लंघन को नियंत्रित करने के लिए करता है। समाज कार्य मानव समाज और मानव संबंधों के सैद्धांतिक पक्ष का अध्ययन करता है साथ ही इस संबंधों में आने वाले अंतरों एवं सामाजिक परिवर्तन के कारणों की खोज क्षेत्रीय स्तर पर करने के साथ साथ व्यक्ति के मनोसामाजिक पक्ष का भी अध्ययन करता है। समाज कार्य करने वाले कर्ता का आचरण विद्वान की तरह न होकर समस्याओं में हस्तक्षेप के जरिएव्यक्तियों, परिवारों, छोटे समूहों या समुदायों के साथ संबंध स्थापित करने की तरफ उन्मुख होता है।
मानव अधिकारों को समझा, जिसमें हमने जाना कि मानव अधिकार से तात्पर्य उन सभी अधिकारों से है जो व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता, समानता एवं प्रतिष्ठा से जुड़े हुए हैं। यह अधिकार भारतीय संविधान के भाग-तीन में मूलभूत अधिकारों के नाम से वर्णित किए गए हैं और न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय है। मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा 10 दिसंबर, 1948 में किया गया। मानवाधिकार पर सार्वभौम घोषणा का प्रारूप तैयार करने में भारत ने भी सक्रिय भागीदारी की। संयुक्त राष्ट्र के लिए घोषणा पत्र का मसौदा तैयार करने में भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने विशेष रूप से लैंगिक समानता को दर्शाने की जरूरत को उजागर करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। सभी देशों में मानव अधिकार लागू है। भारत में मानव अधिकारों की रक्षा के लिए जितना मानव अधिकार कार्यकर्ता सक्रिय है उतना ही समाज कार्य कार्यकर्ता भी सक्रिय है। सामाजिक कार्यकर्ता का उत्तरदायित्व होता है कि वह अपने सेवार्थी के मूलभूत अधिकारों से भी अवगत कराएं, ताकि सेवार्थी स्वयं अपनी समस्याओं से निपट सकें।
वार्तालाप में शामिल हों