सतत विकास - Sustainable Development
सतत विकास - Sustainable Development
आर्थिक संवृद्धि की एक सीमा है और यह बात तब स्पष्ट हुई जब पर्यावरणीय अपकर्ष असंतुलन इसके फलस्वरूप परिलक्षित होने लगा। इटली के पूँजीपतियों नौकरशाहों व व्यापारिक सलाहकारों द्वारा गठित 'क्लब ऑफ रोम' ने 1970 में संवृद्धि की सीमाएं एक नामक रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट के परिणामस्वरूप ही हरित क्रांति का अस्तित्व सामने उभर कर आया। लोगों का ध्यान पर्यावरणीय समस्याओं और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के घातक परिणामों की ओर आकृष्ट हुआ। इस रिपोर्टक माध्यम से चेताया गया था कि प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण प्रदूषण खाद्यान्न उत्पादन, जनसंख्या वृद्धि और औद्योगीकरण की वर्तमान दर टिकाऊ और दीर्घकालिक नहीं है। गिडेंस द्वारा लिखित पुस्तक सोशिओलॉजी' में 'क्लब ऑफ रोम की रिपोर्ट में प्रस्तुत आलोचना का उल्लेख किया गया है।
यह मांग व आपूर्ति उपलब्ध संसाधनों के बीच संतुलन बनाने वाली बाजार शक्तियों की भूमिका तथा तकनीकी विकास से संबंधित वातावरणीय चुनौतियों का सामना करने की मानवीय क्षमता की उपेक्षा करती है।
सतत विकास की अवधारणा का सूत्रपात 1987 में ब्रटलैंड रिपोर्ट आवर कॉमन फ्यूचर के प्रकाशन से हुआ है। इस आयोग के अध्यक्ष ब्रटलैंड थे। इस रिपोर्ट के अनुसार प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं और इसके संचयन अथवा बचाव के लिए यह आवश्यक है कि भावी पीढ़ी को इन्हें ध्यान में रखते हुए अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करनी चाहिए। इसमें सतत विकास को परिभाषित करते हुए कहा गया है सतत विकास का अभिप्राय वर्तमान में लोगों की आवश्यकताओं व आकांक्षाओं को इस प्रकार से पूरा करना है। कि अगली पीढ़ी को अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने की सामर्थ्य पर कोई आंच न आए इस रिपोर्ट ने सरकार, गैर-सरकारी संगठनों और पर्यावरणवादियों का ध्यान इस ओर खींचा। तब से लेकर आज तक संयुक्त राष्ट्र सतत विकास से संबंधित सम्मेलन करता रहा है।
सतत विकास की अवधारणा का उद्देश्य भौतिक पर्यावरणीय, मानवीय आदि संपत्ति को समय के साथ-साथ बनाए रखते हुए आर्थिक लाभ को प्राप्त करना और गरीब व हाशिए के समूहों की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था करना है। यह एक गतिमान अवधारणा है, जिसके अंतर्गत कई आयाम है तथा इसके स्पष्टीकरण नाना प्रकार से किए गए हैं।
• रिपिटो- "सतत विकास से आशय विकास की बृहत नीति से है ताकि सभी निधियाँ प्राकृतिक संसाधन, मानवीय संसाधन और वित्तीय व भौतिक संसाधन अधिक समय तक धन और एश्वर्य को संवर्धित करते हुए मानव कल्याण में योगदान दे सकें।
• विनपेनी सतत विकास का अभिप्राय पैतृक संपत्ति जिसमें पर्यावरण से प्राप्त संसाधन भी शामिल हैं, उसे दीर्घकालिक अवधि के लिए संरक्षित रखने से हैं।"
• आदिदेशिया सतत विकास व विकास है, जिसके अंतर्गत सभी खासकर बड़ी मात्रा में गरीबों का सेवायोजन, खाद्य ऊर्जा, पानी और आवास जैसी मौलिक आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके तथा कृषि शक्ति निर्माण एवं सेवाओं में वृद्धि की जा सके ताकि इन आवश्यकताओं की आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके। इस अर्थ में सतत विकास के सिद्धांत और निर्णय लेने दोनों में पर्यावरण और अर्थशास्त्र को अंतसंबंधित किया जा सके।'
• 1998 के इकोनोमिक सर्वे ऑफ इंडिया के अनुसार सतत विकास अंतपिंढीगत समता पर ध्यान देते हुए, पर्यावरणीय जिम्मेदारी की भावना के साथ विकास को ऊर्ध्वाधर गति देने का प्रयत्न है। ह्यूमन डेवेलपमेंट रिपोर्ट (1994) सतत विकास का सार है कि प्रत्येक व्यक्ति की वर्तमान समय में तथा भविष्य में विकास संबंधी अवसरों तक पहुँच हो'
● विश्व पर्यावरण और विकास आयोग सतत विकास परिवर्तन की ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें संसाधनों का दोहन, निवेश की दिशा प्रौद्योगिकी का विकास तथा संस्थागत परिवर्तनों की दिशा के मध्य सामंजस्य हो जिससे मानवीय आवश्यकताओं और अपेक्षाओं के पूर्ति की वर्तमान और भावी क्षमताएं संबंधिंत हाँ।"
• डाली और गुडलैंड पुनः उत्पादन करने वाली और आत्मसात करने वाली क्षमताओं के अलावा खनिज पदार्थ व ऊर्जा की सम्पूर्ण व्यवस्था में संवृद्धि के बिना विकास ही सतत विकास है।"
गुडलैंड और लेडाक के अनुसार सतत विकास है
1. प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग कुछ इस तरह से किया जाना चाहिए ताकि भावी पीढ़ी तक वे उपलब्ध रह सके तथा उनके उपयोग में कमी न आए।
ii. खनिज संसाधनों का उपयोग कुछ इस तरह से किया जाना चाहिए ताकि भावी पीढ़ी तक ये अनुपलब्ध न हो जाएँ।
Iii नवीकरण न होने वाले ऊर्जा संसाधनों का क्षरण कम मात्रा में किया जाना चाहिए ताकि भावी पीढ़ी तक इनके उपयोग को संरक्षित किया जा सके।
सतत विकास से संबंधित उपर्युक्त सभी परिभाषाओं से यह स्पष्ट होता है कि वह संसाधनों के उचित उपयोग और वास्तविक आवश्यकताओं की आपूर्ति से संबंधित विकास की संकल्पना है। विश्व के सभी वंचित लोगों की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा किया जाए और सभी को बेहतर जीवन व्यतीत करने का अवसर प्रदान किया जाए। यदि विश्व में गरीबी और असमानता विद्यमान रहेगी तो पारिस्थितिकीय और अन्य प्रकार के खतरे जीवंत बने रहेंगे। सतत विकास की संकल्पना में मनोवृत्ति जिस प्रकार के विचार का सूजन करेगी, वे होंगे
1. पृथ्वी पर संसाधन सीमित मात्रा में उपलब्ध हैं।
2. जीवन की गरिमा मात्र भौतिक संपत्ति पर ही आश्रित नहीं है।
3. संसाधनों के दोबारा उपयोग और उचित उपयोग से संसाधनों के समाप्ति के संकट से निपटा जा सकता है।
4. अनुपयोगी हो चुकी वस्तुओं को पुनः उपयोगीनाकर उपयोग में लाना चाहिए।
5. मनुष्य प्रकृति का अंग है अतः हमें उसके नियमों का पालन करना चाहिए।
6. प्रकृति के साथ सहजीवी संबंध स्थापित करना चाहिए।
7. व्यक्तिगत स्तर पर जागरूक होकर पर्यावरणीय समस्याओं का सामना करना चाहिए और उनके समाधान की तलाश करनी चाहिए।
8. परियोजनाओं और कार्यक्रमों की लागत में वस्तुओं ऊर्जा और श्रम के अलावा उसमें स्वास्थ्य और पर्यावरण को होने वाली क्षति की लागत को भी शामिल किया जाना चाहिए।
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