प्रगति के प्रकार - Types of Growth

प्रगति के प्रकार - Types of Progress

प्रगति के प्रकार - Types of Progress

लेस्ली स्क्लेयर का कथन है, प्रगति स्थायी अथवा अस्थायी वह दशा है जहाँ सामाजिक क्रिया कमोबेश रूप में मानवीय समस्याओं के निवारण में समर्थ है। किसी पूर्व की दशा अथवा परिस्थिति से असंतोष के कारण ही समाज में परिवर्तन लाया जाता है और यह परिवर्तन वांछित दिशा की ओर नियोजित किए जाने से संबंधित है। समाज में व्याप्त असंतोष अथवा समस्याओं के निपटारे के लिए समाज में प्रगति के बीज को प्रत्यारोपित किया जाता है। प्रगति को मूल रूप से दो भागों में वर्गीकृत किया। जा सकता है.

• नवीनीकृत प्रगति इसमें समाज के लिए नवीन तत्वों को सम्मिलित किया जाता है जो प्रगति के लिए उत्तरदाई है। साधारणतः विकसित देशों में प्रगति इन्हीं तत्वों से होता है। इस प्रकार की प्रगति से आशय समाज में उन नवीन प्रक्रियाओं, विचारों व वस्तुओं के प्रतिस्थापन से है जिसका समाज पर प्रभाव बड़ी मात्रा पर पड़ता हो। सामान्यतः इसकी जानकारी समाज को पहले से नहीं रहती है। इसी कारण कतिपय विद्वानों द्वारा इसे खोज अन्वेषण व ईजाद आदि नामों से भी संबोधित किया गया है। वर्तमान समय में कुछ परंपरागत देशों द्वारा भी इस ओर कदम बढ़ाने का प्रयास किया जाने लगा है।

• व्यवहारगत प्रगति प्रगति का यह स्वरूप सामान्यतः परंपरागत और स्थिर देशों में पाया जाता है। इसमें उन तत्वों को शामिल किया जाता है जिनके बारे में लोगों को जानकारी पहले से ही होती है और जिसका मानव समाज पर प्रभावकारी प्रभाव पड़ रहा हो व्यवहारगत प्रगति उस प्रगति के स्वरूप को कहते हैं जो वर्तमान प्रक्रियाओं वस्तुओं व विचारों के कारण नियोजित होता है। कई बार ऐसा भी होता है कि नवीनीकृत प्रगति से जिन उद्देश्यों की प्राप्ति नहीं हो पाती है उन उद्देश्यों की प्राप्ति इस प्रगति के माध्यम से हो जाती है।

इसके अतिरिक्त वह प्रगति जो सामाजिक व्यवस्था में सुधार करती है सुधारात्मक प्रगति के नाम से में जानी जाती है और सामाजिक व्यवस्था में मूलभूत परिवर्तन लाने के पश्चात जो प्रगति प्राप्त होता है उसे क्रांतिकारी प्रगति की संज्ञा दी जाती है।