महिला सशक्तिकरण - Women Empowerment
महिला सशक्तिकरण - Women Empowerment
प्रारंभ में महिलाओं के साथ भेभावपूर्ण व्यवहार करके उन्हें उनकी स्वाभाविक प्रस्थिति से वंचित रखा गया, उनकी प्रतिभा और कौशल को पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक राजनैतिक जीवन में सदैव सही हतोत्साहित किया गया है। परंतु अब समयपरिवर्तित हो रहा है, अब परिस्थितियाँ वैसी नहीं रही जैसी की पहले हुआ करती थीं। महिलाओं ने अपने विरुद्ध हो रहे असमतापूर्ण व्यवहारों के प्रतिभावाज बुलंद किया है। विगत कुछ वर्षों में महिलाओं के प्रति लोगों के नए में परिवर्तन हुए हैं और साथ ही साथ सरकार द्वारा भी इसके अभिमुखन में परिवर्तन किए गए हैं। इस प्रकार पुरुषों के साथ सम्ता की तलाश, महिलाओं के लिए एक सार्वभौमिक घटना के रूप में उभरकर अस्तित्व में आई हैं। उनके द्वारा समतामूलक (स्त्री-पुरुष समाज की स्थापना के लिए नियोजित क्रांति ने एक नई संकल्पना का सूत्रपात किया महिला सशक्तिकरण यह महिला का सशक्तिकरण है जो कि महिलाओं को समाज और परिवार की सभी व्यक्तिगत सीमाओं कोलापकर निर्णय लेने में सहायता करता है।
भारतीय संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, यह पुरुषों के ही समान, समाज के सभी क्षेत्रों में महिलाओं को समानता प्रदान करने के लिए कानूनी बिंदु है। पंडित जवाहरलाल नेहरू का मानना है कि लोगों के विकास के लिए यह आवश्यक है। कि महिलाओं का संपूर्ण विकास हो।
महिला सशक्तिकरण का अर्थ है- हीनता की संरचना, आधिपत्य की संरचना, कानून, संपत्ति अधिकारों और अन्य सभी संस्थाएं, जो कि पुरुषों के प्रभुत्व को स्थापित करने अथवा उसे संवर्धित करने में सहायक हैं, उन्हें आमूलचूल परिवर्तित किया जाए। इस नई नीति के अंतर्गतसशक्तिकरण की प्रक्रिया में महिलाओं में संगठन के निर्माण और चेतना जागृत करने का प्रयास किया गया, जिसे और संवर्धित करने के लिए सरकार द्वारा सामाजिक व आर्थिक सेवाएं मुहैया कराई जाएंगी महिलाओं के समूह को संगठित करना जहाँ वे अपनी परिस्थितियों के बारे में विचार-विमर्श कर सके और संगठित होकर पुरुषों की सत्ता को चुनौती दे सकें और स्वयं के विकास हेतु मार्ग प्रशस्त कर सकें यही सरकार का सशक्तिकरण को लेकर मुख्य प्रयोजन से इस प्रयोजन की सफलता हेतु सरकार द्वारा अनेक कार्यक्रम (यथा महिला विकास कार्यक्रम (1984), चेतना जागरण कार्यक्रम (1986), महिला सामाख्या (1989) आदि) चलाए गए इन कार्यक्रमों में प्रमुख रूप से निम्न बातों को शामिल किया गया लिंग आधारित संबंधों के दमनात्मक स्वरूप को उजागर करना।
इस प्रकार के संबंधों को चुनौती देना।
महिलाओं की हिस्सेदारी से सामाजिक संबंधाम महिलाओं के पक्ष बदलाव लाना। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में कई सरकारी व गैर सरकारी संगठनों द्वारा महिला सशक्तिकरण में अनेक उल्लेखनीय प्रयत्न किए गए। कालांतर में महिला सशक्तिकरण के प्रयासों में गति आई और 2001 को 'महिला सशक्तिकरण वर्ष के रूप में घोषित किया गया। पहली बार राष्ट्रीय महिला उत्थान नीति का निर्माण किया गया, ताकि महिलाओं के उत्थान और समुचित विकास के लिए आधारभूतव्यवस्थाओं का निर्धारण किया जा सके। इस नीति के प्रमुख बिंदु निम्न हैं
• महिलाओं की स्वस्थ्य शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा में हिस्सेदारी की व्यवस्था करना।
● महिलाओं के लिए ऐसे वातावरण को निर्मित करना कि वे स्वयं सामाजिक और आर्थिक नीतियाँ नियोजित कर सकें।
समाज में समान भागीदारी हेतु महिलाओं को प्रेरित करना।
मानवाधिकार के इस्तेमाल में उन्हें कौशलपूर्ण व दक्षबनाना।
भेदभाव उन्मूलन हेतु सामाजिक प्रक्रिया का विकास करना।
बालिकाओं और महिलाओं के प्रतिभनेक निषेधों के रूप में निहित असमानता की भावना को समाप्त करना।
यदि समकालीन संदर्भ में देखा जाए तो महिला सशक्तिकरण भारत ही नहीं, अपितु पूरे विश्व के लिए एक अवलंत मुद्दा का विषय बना हुआ है। अन्य देशों में इसे क्रियान्वित करना अपेक्षाकृत सरल है। भारत में इसके विरोधाभास अनेक व विविध है। संभवतः सरकार समाज सुधारकों व महिला संगठनों द्वारा इस क्षेत्र में सराहनीय प्रयास अवश्य किए गए हैं। भारत में घूँघट प्रणाली सती प्रथा, बाल विवाह कन्या भ्रूण हत्या, स्थायी विधवापन आदि कुरीतियों सरकार द्वारा तो हटाने हेतु प्रशासनीय कार्य किए गए हैं। इसके अतिरिक्त संपति के अधिकार हेतु
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (1956),
वैवाहिक अधिकार हेतु हिंदू विवाह अधिनियम (1955),
संरक्षण संबंधी अधिकार हेतु हि अवयस्कता और संरक्षण अधिनियम (1956)
तथा अविभावक और आश्रित अधिनियम (1990),
दहेज प्रतिषेध अधिनियम (1961)
इत्यादि प्रकार के अधिनियम सरकार द्वारा पारित किए गए हैं, जो महिलाओं को मुख्यधारा में लाने हेतु कार्यसरित हैं। एक अन्य अधिनियम
घरेलू हिंसा संरक्षण अधिनियम26 अक्टूबर, 2006 को लागू करके महिलाओं का संरक्षण व शारीरिकमानसिक क्षति को दुरुस्त करने हेतु प्रयास अग्रसर है। ग्रामीण महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए सरकार द्वारा अनेक कल्याणकारी कार्यक्रम चलाए गए यथा
समेकित बाल विकास सेवा योजना (1975),
काम के बदले अनाज योजना (1977),
अंत्योदय कार्यक्रम (1978),
समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम (1980),
ग्रामीण कहसेटरों में महिला और बाल विकास कार्यक्रम (1982),
ग्रामीण प्रौद्योगिकी विकास परिषद (1986),
महिलाओं हेतु प्रशिक्षण और रोजगार कार्यक्रम (1987),
कुटीर ज्योति योजना (1988-89),
स्वर्ण जयंती ग्राम रोजगार योजना (1999),
अंत्योदय योजना (2000),
प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना (2000-01),
संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना (2001),
किशोरी शक्ति योजना (2001),
महिला स्वयं सिद्ध योजना (2001),
राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (2005),
भारत निर्माण योजना (2005-06) आदि।
महिला सशक्तिकरण के उच्च स्तरीय लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए बचपन से ही प्रत्येक परिवार को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। महिलाओं को मानसिक, शारीरिक व सामाजिक रूप से मजबूत होने के लिए यह आवश्यक है। इससे बेहतर शिक्षा को बचपन से ही घर पर शुरू किया जा सकता है महिला के उत्थान के लिए और साथ-ही-साथ देश के समग्र विकास के लिए स्वस्थ्य परिवार की जरूरत है। तत्कालीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में शिक्षा के उपयोग के माध्यम से समानता को बढ़ावा देने के लिए 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' अभियान का आरंभ किया है, जिसका मूल उद्देश्य पितृसत्तात्मक मानसिकता के खिलाफ लड़ना और महिलाओं की पारंपरिक भूमिकाओं को प्रतिबंधित करनाबाल विवाह का निषेध, दहेज और कन्या भ्रूण हत्या (2011 में हुए एक अध्ययन के अनुसार, पिछले तीन दशकों में लगभग 12 लाख कन्या भ्रूण हत्याएं हुई है। आदि
कुप्रथाओं को हतोत्साहित करना है। देर से ही सही पर 20वीं सदी में इंटरनेट के बढ़ते उपयोग और उसके विविध उपकरणों का उपयोग करके। महिलाओं द्वारास्वयं को सशक्त बनाने में उत्तरोत्तर कदम उठाए गए हैं। महिलाओं ने सोशल नेटवर्किंग साइट्स जैसे फेसबुक ट्वीटर आदि पर ऑनलाइन सक्रियता भी शुरू कर दी है। महिलाओं द्वारा ऑनलाइन सक्रियता के माध्यम से अभियान के आयोजन व उसे आगे बढ़ाने में मदद मिलती है। वे अपनी राय को आसानी से अभिव्यक्त कर सकती है और इस प्रकार से वे स्वयं को सशक्त करने में सक्षम हैं। उदाहरण के लिए 29 मई 2013 को 100 महिला अधिवक्ताओं द्वारा सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट के माध्यम से ऑनलाइन अभियान चलाया जा चुका है।
परंतु शोध से पता चला है कि इंटरनेट का उपयोग महिलाओं में बढ़ते शोषण का कारण भी बनता जा रहा है। वेबसाइटों पर महिलाओं की व्यक्तिगत जानकारी को उपलब्ध करने से भी उनकी सुरक्षा में हानि हो रही है। यदि 2010 के आंकड़ों को देखा जाए तो 73 प्रतिशत कामकाजी महिलाए ऐसी साइटों के माध्यम से साइबर स्टाकिंग, ऑनलाइन अश्लील साहित्य, उत्पीड़न आदि प्रकार के ऑनलाइन दुर्व्यवहार की शिकार हुई हैं। हाल के अध्ययनों से भी पता चलता है कि कार्यस्थल पर पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज्यादातर दुर्व्यवहार का सामना करती हैं।
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