सरकारिया आयोग - 1988 - Sarkaria Commission - 1988
सरकारिया आयोग - 1988 - Sarkaria Commission - 1988
केंद्र-राज्य संबंध से सरोकार रखने वाले सरकरिया आयोग (1988) ने भी स्थानीय एजेंसी को वित्त और कार्य की दृष्टि से मजबूत करने की और पंचायतों के चुनाव नियमित रूप से होने की सिफारिश की थी। 1988 के अंत में पी के बुंगन की अध्यक्षता में संसद की सलाहकार समिति की एक उपसमिति ने भी पंचायत राज व्यवस्था को संवैधानिक मान्यता देकर माबूत करने की सिफारिश की थी। उसी प्रकार 1989 में बी. एन. गाडगिल समिति ने तीन स्तरीय पंचायती व्यवस्था जिसमें निर्वाचित सदस्यों के लिए 5 वर्ष की नियमित अवधि और अनुसूचित जातियों जनजातियों और महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान हो यह सिफ़ारिश संविधान (73 वां संशोधन) अधिनियम 1992
विभिन्न समितियों और आयोगों की सिफारिशों के आधार पर पंचायत राज को संवैधानिक दर्जा देने के लिए संशोधन के दौर की शुरुआत 64 वें संशोधन विधेयक 1989 के साथ हुई, जिसे प्रत्येक राज्य में गांव माध्यमिक और जिला स्तरों पर पंचायतों के गठन के लिए संसद में प्रस्तुत किया गया था। इसमें राज्य की विधायिका कानूनी रूप से पंचायतों को ऐसे अधिकार और शक्तियां देगी जिनकी आवश्यकता उन्हें स्वायत्त शासन की संस्थाओं के रूप में काम करने के योग्य होने के लिए पड़ सकती है। इसे आगो 3 वां संशोधन के रूप में 22 दिसंबर 1992 में लोक सभा और 23 दिसंबर 1992 को राज्य सभा में पारित किया गया। 20 अप्रैल 1993 को भारत के राष्ट्रपति ने इसे अपनी स्वीकृति दे दी। इस संविधान संशोधन को संविधान (73 संशोधन) अधिनियम 1992 के नाम से जाना जाता हैं। इस अधिनियम के साथ पंचायत भारतीय संविधान का हिस्सा बन गया। इस अधिनियम के प्रभावी हो जाने से कोई भी व्यक्ति पंचायतों को दिए गए अधिकारों जिम्मेदारियों और धन को उनसे छीन नहीं पाएगा। यह सब पंचायत के सत्ता हस्तांतरण के विवरण में शामिल है।
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