वन अधिकार कानून 2006 - Forest Rights Act 2006
वन अधिकार कानून 2006 - Forest Rights Act 2006
इस अधिनियम के पारित होने से पहले हम देखते हैं कि एक सदी से अधिक समय से भारत के वनों की शासन व्यवस्था उन भारतीय वन कानूनों के प्रावधानों के अनुसार की जाती रही है जो अंग्रेजों द्वारा पारित किए गए थे। 1927 का कानून भारत का केंद्रीय वन कानून बना रहा। इन कानूनों का पर्यावरण संरक्षण से कोई लेना-देना नहीं था। इसके बजाय ब्रिटिश शासकों ने इमारती लकड़ी का इस्तेमाल एवं प्रबंधन अपने हाथ में लेना चाहा जिसके लिए जरूरी था कि सरकार बनों पर अपना अधिकार जमाए और पारंपरिक सामुदायिक वन प्रबंधन की प्रणालियों को दबा दे, जो देश के अधिकतर हिस्सों में लागू थीं।
संसद ने 18 दिसंबर, 2006 को सर्वसम्मति से अनुसूचित जाति एवं अन्य पारंपंक वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) कानून, 2006 पारित किया। 31 दिसंबर 2007 को इसे लागू करने की अधिसूचना जारी होने के एक साल बाद इसे अधिसूचित किया गया।
कानून की विषय-वस्तु
यह कानून तीन मामलों में एक बुनियादी ढांचा प्रस्तुत करता है जो निम्नलिखित हैं:
पात्रता
इस कानून के तहत पात्रता के दो चरण है। प्रथमतः किसी भी दावेदार को यह साबित करना है कि वह
'मुख्यतः वनों का बाशिदा' है और जीविकोपार्जन के लिए वनों तथा वन-भूमि पर निर्भर है (अपने
वास्तविक जीविकोपार्जन के लिए)। द्वितीयत दावेदारों को यह साबित भी करना है कि उपर्युक्त स्थिति पिछले 75 साल से बनी हुई है और इस मामले में वे अन्य पारंपरिक वनवासी हैं पारा 2(ओ), अथवा वे अनुसूचित जाति के हैं और उस इलाके में रह रहे हैं जहाँ से अनुसूचित धारा 2(सी) और 4(1) हैं और वे बनवासी अनुसूचित जनजाति के हैं।
अधिकार
तीन बुनियादी अधिकारों को मान्यता दी गई है।
1. विभिन्न प्रकार की जमीन, जिसकी निर्धारण की आधार तिथि 13 दिसंबर, 2005 है (अर्थात उस तिथि से पूर्व से उस पर उसका कब्जा है और वह उसे जोत रहा है और यदि कोई दूसरा दस्तावेज उपलब्ध न हो तो प्रति परिवार 4 हेक्टेयर की भू-हदबन्दी लागू होगी।
2. पारंपरिक रूप से लघु वनोत्पाद जल निकायों, चरागाहों आदि का उपयोग कर रहा हो।
3. वनों एवं वन्य जीवों की रक्षा एवं संरक्षणा यह वह अति अधिकार है, जो इस कानून का अति क्रांतिकारी पक्ष है। यह उन हजारों ग्रामीण समुदायों के लिए महत्वपूर्ण है जो वन माफियाओं उद्योगों तथा जमीन पर कब्जा करने वालों के खतरों से अपने चनों तथा वन्य जीवों की रक्षा में लगे हुए हैं। इनमें से अधिकतर वन विभाग की साँठगाँठ से इस काम को अंजाम देते हैं। पहली बार यहवास्तविक रूप से भावी जनतांत्रिक वन प्रबंधन का द्वार खोलता है और इसकी संभावना पैदा करता है।
प्रक्रिया
कानून की धारा 6 में तीन चरण वाला इस प्रक्रिया की व्यवस्था है, जिसके अनुसार यह तय किया जाएगा कि किस अधिकार मिले प्रथम ग्राम सभा (पूरी ग्राम सभा ग्राम पंचायत नहीं सिफारिश करेगी कि कितने अरसे से कौन उस जमीन को जोत रहा है. किस तरह का बनोत्पाद वह लेता रहा है, आदि। यह जाँच ग्राम सभा की बनाधिकार समिति करेगी, जिसके निष्कर्ष को ग्राम सभा पूरी तरह स्वीकार करेगी। ग्राम सभा की सिफारिश भी छानबीन के दो चरणों से गुजरेगी तहसिल और जिला स्तरों पर जिला स्तरीय समिति का फैसला अंतिम होगा (धारा 6 (6) देखें)। इन समितियों में छह सदस्य होंगे- तीन सरकारी अधिकारी और तीन निर्वाचित सदस्या दोनों तहसिल और जिला स्तरों पर कोई भी व्यक्ति, जो यह समझता है कि दावा गलत है. इन समितियों के सामने अपील दायर कर सकता है और यदि उसका दावा साबित हो जाता है, तो दूसरों को अधिकार से वंचित कर दिया जाएगा (धारा 6 (2) और 6 (4) देख। अतिम, इस कानून के तहत स्वीकृत जमीन न बेची जा सकेगी और न उसका अधिकार दूसरे को हस्तांतरित किया जा सकेगा।
मूल्यांकन कानून के पास होने के समय भी इसके लागू करने के लिए हुए आंदोलनों के दौरान इस कानून की अनेक खामियों की ओर सरकार का ध्यान खींचा गया था। इन खामिया में यह बात शामिल है कि मूल रूप से वन में निवास करने के लिए सिर्फ वे ही पात्र होंगे जिनके घर बनों में होंगे। बनवासियों के बीच भी ऐसी स्थिति मुश्किल से होती है। उनमें से अधिक लोगों के स्थायी घर भूराजस्व वाली जमीन में होते हैं, जो वास्तव में वन-भूमि में रहते भी थे उनमें से अधिकतर को पहले ही वहाँ से जबरन हटा दिया गया है अथवा वन विभाग ने उनके घर को छोड़कर अपनी चाहरदीवारी बना ली है, ताकि उनसे प्रत्यक्ष संघर्ष को टाला जा सके।
इसके अलावा 75 साल की आवासीय शर्त लगाने के कारण गैर-आदिवासियों के कुछ अति संवेदनशील समूह इस सुविधा से वंचित हो जाएंगे। इनमें वे लोग भी शामिल हैं जो बन ग्रामों में रहते हैं। अधिकारों की मान्यता की प्रक्रिया में उच्चतर समितियों को मिले व्यापक अधिकारों के कारण भ्रष्टाचार की भारी संभावना बनी हुई है। साथ ही कानून में यह स्पष्ट नहीं किया जा सका है कि इस कानून पर अमल के मकसद से जिस ग्राम सभा का उल्लेख है वह वहाँ के वासियों की होगी अथवा पुनर्वास बस्तियों की जो न तो ग्राम पंचायत है और न राजस्व गाँव, क्योंकि यह अपेक्षाकृत बृहत अस्तित्व वाली बस्ती होगी, • जिनमें अनेक वास्तविक पुनर्वास बस्तियाँ शामिल होंगी।
इन सारे बिंदुओं पर संयुक्त संसदीय समिति ने अपनी ठोस तथा स्पष्ट सिफारिश की परंतु सरकार ने उन्हें खारिज कर दिया ये खामियाँ अब अमल के दौरान उभरकर सामने आ रही हैं जो मार्च 2008 के दौरान मध्य भारत के अनेक राज्यों में देखने को मिली। कानून की इस अस्पष्टता के कारण अनेक लोग अपने अधिकारों से वंचित हो गए और कुछ क्षेत्रों में बनाधिकार समितियों के गठन में गड़बड़ियाँ करना आसान हो गया।
इन खामियों के बावजूद इस कानून का असर भारत के व्यापक बन क्षेत्रों में अच्छा पड़ा है जबकि इस पर अमल अभी शुरू ही हुआ है वन क्षेत्रों में आमूल बदलाव नजर आ रहा है। जन अधिकार समितियों में गोलमाल करने की कोशिशों का ग्रामीण स्तर पर प्रतिरोध किया जा रहा है अपने अधिकारों का दावा किया जा रहा है, बेदखली के खिलाफ संघर्ष किया जा रहा है और सामुदायिक वन संसाधना सीमांकन किया जा रहा है।
इन अधिनियमों के तहत बदलावों के ठोस परिणाम सामने आने में अनेक वर्षों का समय लगेगा, परंतु मौलिक बदलाव सहज है। डेढ़ सौ साल की अवधि के बाद पहली बार वनवासी समुदायों के जीवन जीविकोपार्जन तथा पर की जमीन पर किसी का वर्चस्व खत्म हो गया है। अनुसूचित जनजातियों के लिए पारित अधिनियमों में वह खामी देखी गई है कि उनके क्रियान्वयन में काफ़ी कमियाँ है। दूसरा कारण यह भी है कि उनके लिए पारित किए गए अधिनियमों में उनका प्रतिनिधित्व न के बराबर है।
आदिवासी स्वयं मुख्यधारा से अलग होने के कारण उनमें जाकता तथा आधुनिक समझ की कमी पाई से जाती है ऐसे में मैदानी इलाके के लोग उनके लिए उनके अधिकारों का निर्धारण करने लगते हैं, जो कि गलत है। बावजूद इसके सामाजिक आंदोलनों के माध्यम से वे लगातार अपने अधिकारों को प्राप्त करने की कोशिश कर रहे हैं। हमने जिन अधिनियमों का अध्ययन किया है उनमें भी काफी कमियों को देखा जाता है इस कारण उनकी काफी आलोचना भी हुई है। बावजूद इसके लोकतांत्रिक पहल के अंतर्गत अधिनियम आदिवासियों के अधिकारों के प्राप्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
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