जिला स्तर पर प्रशासनिक व्यवस्था - ग्राम विकास - Administrative Setup at District Level - Rural Development

जिला स्तर पर प्रशासनिक व्यवस्था - ग्राम विकास - Administrative Setup at District Level - Rural Development

भारत में जिला प्रशासन की बुनियादी इकाई है और उसका प्रमुख जिला कलेक्टर होता है। जिला स्तर पर राजस्व और विकास के काम एक ही पदाधिकारी को दिए गए है। जब सामुदायिक विकास कार्यक्रम शुरु किया गया था, तब जिला कलेक्टर को जिले में सामुदायिक विकास प्रशासन का प्रमुख बनाया गया था। कलेक्टर ही जिले की योजनाओं का समन्वय करता और जिला योजना समिति की अध्यक्षता भी करता था। इस समिति में सरकारी और गैर सरकारी सदस्य होते थे, जिनकी सहायता एक जिला योजना अधिकारी करता था। बाद में, चौथी पंचवर्षीय योजना 1969-74 के दौरान जिला स्तर पर महत्वपूर्ण बदलाव किए गए।

उस समय 1969 में छोटे किसानों को ऋण सहायता और तकनीकी मार्गदर्शन देने के उद्देश्य से भारतीय रिजर्व बैंक ने अखिल भारतीय ग्रामीण ऋण समीक्षा समिति की नियुक्ति की जिसकी सिफारिश पर लघु किसान विकास एजेंसियों (S.F.D.A.) और सीमांत किसान एवं खेतिहर मजदूर विकास एजेंसियों (M.F.A.L.) का गठन किया गया। सभी विभागों के कार्यकलापों में समन्वय स्थापित करने के उद्देश्य से प्रत्येक जिले में जिला कलेक्टर की अध्यक्षता में एक समन्वय समिति बनाई गई।


सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम 1860 के अंतर्गत पंजीकृत जिला स्तर पर एक स्वात्तिशासी एजेंसी की स्थापना की गई, जिसका काम लघु किसान विकास एजेंसियों सीमांत किसान एवं खेतिहरमज़दू र विकास एजेंसियों (S.F.D.A./M.F.A.L.) को लागू करना था। प्रत्येक एजेंसी में एक छोटे अधिशासी स्टाफ बाला एक शासी निकाय होता था। इसे एक राज्य स्तरीय समन्वय एवं समीक्षा समिति का सहयोग प्राप्त था। शासी निकाय में एक अध्यक्ष होता था जो सामान्यत: जिला कलक्टर होता था। उसके अतिरिक्त इस निकाय में कृषि पशुपालन सहकारिता और कार्यक्रम से जुड़े अन्य किसी भी राज्य स्तरीय विभाग के प्रतिनिधि, अग्रणी बैंक का एक प्रतिनिधि, संबंधित केंद्रीय सहकारिता बैंक का अध्यक्ष, संबंधित जिला परिषद का एक प्रतिनिधि और कुछ गैर सरकारी व्यक्ति होते थे।

प्रत्येक एजेंसी को केवल एक केंद्रक स्टाफ रखने की अनुमति थी, जिसमें कृषि पशुपालन और सहकारिता विभाग से लिए गए तीन सहायक परियोजना अधिकारी और परियोजना अधिकारी होते थे। लघु किसान विकास एजेंसियों के अपने कोई फील्ड कर्मचारी नहीं थे और इस एजेंसी की अन्य संबंधित विकास विभागों सहकारिता और वाणिज्यिक बैंकों जैसी वित्तीय संस्थाओं के कर्मचारियों की सेवाएं लेकर अपना काम करना होता था।


चौधी और पांचवी पंचवर्षीय योजनाओं केदौरान देश में लघु किसान विकास एजेंसियों के अलावा अन्य विशेष कार्यक्रम भी लागू किए गए। इनमें से सूखाप्रवण क्षेत्र कार्यक्रम और मरुस्थल विकास कार्यक्रम को 1970 के दशक में शुरू किया गया। राज्य और अथवा केंद्र सरकार ने जिला स्तर पर विशेष परियोजना एजेंसियों का भी गठन किया है।