विकास के मूल तत्व - Basic Elements of Development

विकास के मूल तत्व - Basic Elements of Development

असमानता और निर्धनता का उन्मूलन


सामाजिक कल्याण शिक्षा स्वास्थ्य आवास आदि में वृद्धि


प्रदेश अथवा देश में लोगों के विभिन्न समूहों में विकास के लाभों का समान वितरण


व्यक्तियों के भौतिक कल्याण में वृद्धि


• प्रौद्योगिकी में उन्नति और बेहतर जीवन स्तर की श्रेष्ठ सुविधाओं हेतु अर्थव्यवस्था में सामग्री और सेवाओं की मात्रात्मक उत्पादन क्षमता वृद्धि संस्थागत ढांचा बनाना जिसमें सभी स्तरों पर निर्णय लेने में सबकी सहभागिता विकास के लिए समान अवसर और असमानताओं को हटाने की अनुमति हो।


बहुत समय से यह माना जाता था कि विकास मुख्य रूप से आर्थिक संवृद्धि पर आश्रित है तथा यदि आर्थिक वृद्धि होगी तो विकास स्वाभाविक रूप से होगा। विकास की इस अवधारणा की आलोचना हुई है कि यह वृद्धि से प्राप्त लाभों के वितरण वृद्धि कैसे हुई और किस मूल्य पर प्राप्त हुई इसकी अनदेखी करता है।

किसी देश में उत्पादन में वृद्धि का अर्थ स्वतः यह नहीं हैकि जो कुछ भी वहाँ उत्पादन हुआ है उसका अधिक अच्छा या सही ढंग से वितरण होना आवश्यक है। उदाहरण के लिए आजादी के बाद से यद्यपि खाद्यानों का उत्पादन लगभग चार गुने से अधिक बढ़ गया है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक भारतीय को खाने के लिए पर्याप्त भोजन उपलब्ध है। इस संदर्भ में खाद्यानों का वितरण महत्वपूर्ण है, वितरणात्मक न्याय की महत्ता बढ़ जाती है।


अर्थिक वृद्धि और विकास की अवधारणाओं के मध्य अंतर का समझना आवश्यक है। किसी आर्थिक व्यवस्था में सकल उत्पाद, उपयोगी समान और सेवाओं के मूल्य में वृद्धि को आर्थिक वृद्धि कहते हैं।


किसी अर्थव्यवस्था में सभी उत्पादन और कार्य सेवाओं का संपूर्ण योगGross Domestic Product (सकल घरेलू उत्पाद) के नाम से जाना जाता है। इसलिए वृद्धि किसी अर्थव्यवस्था में उत्पादन क्षमता का स्थायी विस्तार है, जो उसके सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि को स्थायित्व प्रदान करता है। दूसरी तरफ विकास का अर्थ भौतिक कल्याण से है, जिसमें विशेष रूप से, जो निर्धन है, गरीबी, अशिक्षा और खराब स्वास्थ की दशा से प्रभावित हैं, उनकी भौतिक दशाओं में स्थायी सुधार लाने से है। इस प्रकार विकास एक गुणात्मक संकल्पना है जो किसी देश या अर्थव्यवस्था में सामान्य जीवन स्तर में गुणात्मक सुधार से संबंधित है।