बाल विकास - Child Development

बाल विकास - Child Development

भारत के संविधान में इस बात का उल्लेख किया गया है कि सरकार देश के सभी नागरिकों को समान रूप से महत्व देगी। बालक भी इस परिधि से बाहर नहीं है और उनके प्रति सरकार की कुछ जिम्मेदारियाँ हैं जिनका वहन करना सरकार द्वारा आवश्यक है। प्रत्येक राष्ट्र में बालकों से संबंधित अनेक समस्याएँ विद्यमान रहती है, यथा पौष्टिक आहार, स्वास्थ्य, शिक्षा, समुचित देखरेख प्रशिक्षण आदि। इन समस्याओं के उन्मूलन हेतु कुछ प्रयत्नशील कार्य किए जाते दिन कार्यों के संज्ञा दी जाती है। इससे संबंधित विस्तृत चर्चा इस इकाई में प्रस्तुत की गई है।

सामान्य तौर पर बच्चे के जन्म से लेकर किशोरावस्था के अंत तक होने वाले जैविक व मनोवैज्ञानिक विकास व परिवर्तन को बाल विकास कहा जाता है। इसमें बालक अधिक निर्भरता से अधिक स्वायत्तता की ओर अग्रसरित होते हैं। बाल विकास से संबंधित विद्वानों द्वारा अलगअलग सिद्धांत प्रस्तुत किए हैं और उससे संबंधित चरणों का उल्लेख भी किया गया है यथा पियाजे का नैतिक विकास सिद्धांत बाल्बी का लगाव का सिद्धांत एरिक्सन के मनोसामाजिक चरण, वाटसन का व्यवहार संबंधी सिद्धांत आदि। मूल रूप से आयु संबंधी विकास अवधियों और अंतरालों को निम्नप्रकार से प्रदर्शित किया जा सकता है


• नवजात (0 से माह)


• शिशु (1 माह से वर्ष) • नन्हा बच्चा (1 वर्ष से 3 वर्ष)


• प्रीस्कूली बच्चा (3 वर्ष से 6 वर्ष)


• स्कूली बच्चा (6 वर्ष से 13 वर्ष)


किशोर किशोरी (13 वर्ष से 20 वर्ष)


बालक का विकास समाज के लिए आवश्यक होता है, क्योंकि यह वह शक्ति होती है, जो समाज को आगे की दिशा में बढ़ाने में सहायता करती है। विकास के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि बालक के सामाजिक, शैक्षणिक, भावात्मक व संज्ञानात्मक विकास को महत्व दिया जाए।