केंद्र व राज्य सरकार द्वारा बाल कल्याण कार्य - Child Welfare Work by Central and State Government

केंद्र व राज्य सरकार द्वारा बाल कल्याण कार्य - Child Welfare Work by Central and State Government

स्वयंसेवी संगठनों द्वारा किए गए प्रयत्न केंद्र व राज्य सरकार द्वारा किए गए प्रयत्न स्वतंत्र भारत में बाल कल्याण के कई प्रयास किए गए जिनमें पंचवर्षीय योजनाएँ और कई कार्यक्रम शामिल हैं। बालक (6 वर्ष की आयु से कम) भारत की जनसंख्या का लगभग 16 प्रतिशत हैं (1991 की जनगणना के अनुसार)। इस दृष्टि से भी बाल कल्याण के लिए सरकार के कुछ दायित्व बनते हैं और इनके निर्वहन हेतु कुछ प्रावधान किए जाते हैं। केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा किए गए प्रमुख प्रयत्न संक्षेपों प्रस्तुत किए जा रहे हैं - 


1. बालकों के लिए राष्ट्रीय नीति- 

बालकों के लिए सरकार द्वारा 1974 में राष्ट्रीय नीति का नियोजन किया गया, जिसका प्रयोजन बालकों के सामाजिक, शारीरिक व मानसिक विकास के लिए जन्म से पूर्व और जन्म के पश्चात तथा वृद्धि के दौरान आवश्यक सुविधाएं मुहैया कराना है। इस उद्देश्य की प्राप्ति हेतु तत्कालीन प्रधानमंत्री के नेतृत्व में एक राष्ट्रीय बाल परिषद का गठन किया गया और इसके बाद कई राज्यों में भी इस प्रकार की परिषदों का गठन किया गया। इसके अलावा बाल कल्याण की दृष्टि से कई कार्यक्रमों को भी कार्यान्वित किया गया। इनमें से 2 अक्टूबर, 1975 को लागू किए गए 'समन्वित बाल विकास कार्यक्रम का उल्लेख विशेष रूप से किया जाता है।


2. संवैधानिक प्रावधान -

बालकों के हित के लिए संवैधानिक रूप से सरकार द्वारा कई प्रावधान किए गए हैं। सरकार द्वारा बाल श्रम बलाम पर प्रतिबंध लगाया गया है। संविधान द्वारा बाल शोषण व संरक्षण से संबंधित सुरक्षा प्रदान की गई है।14 वर्ष तक की आयु के बालकों को निःशुल्क व अनिवार्य शिक्षा प्रदान किए जाने का प्रावधान भी किया गया है। 


3. सामान्य व विशिष्ट श्रेणी के बालकों का कल्याण 

सरकार द्वारा सामान्य व विशिष्ट श्रेणी दोनों से संबंधित कल्याणकारी प्रावधान किए गए हैं।1953 में केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड का गठन किया गया और इसे 1969 को स्वायत्त अस्तित्व दे दिया गया। सरकार द्वारा समाज कल्याण मंत्रालय के तहत पोषण एवं बाल विकास ब्यूरो को स्थापित किया गया, जिसका मूल उद्देश्य बाल कल्याण से संबंधित नीतियों को नियोजित करना और बाल कल्याण कार्यक्रमों को समन्वित रूप से कार्यान्वित करना है। दिव्यांगों से संबंधित नीतियों और कार्यक्रमों के बारे में सुझाव देने के लिए राष्ट्रीय विकलांग कल्याण परिषद का निर्माण किया गया। इसके अलावा निजी व सार्वजनिक अंशदान प्राप्ति हेतु राष्ट्रीय विकलांग कल्याण निधि का गठन किया गया। नेत्रहीनों के लिए समेकित सेवाएँ प्रदान करने के उद्देश्य से देहरादून में एक राष्ट्रीय संस्थान की स्थापना की गई। इसके अंतर्गत नेत्रहीन बालको की शिक्षा के संवर्धन की दृष्टि से विद्यालयों की स्थापना की गई है। मुंबई में अली यावर जंग राष्ट्रीय संस्थान का गठन किया गया, जो श्रणव दोष से पीड़ितों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर समेकित सेवाएँ उपलब्ध कराने के उद्देश्य से संबंधित है। केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड द्वारा अन्य बालकों के लिए स्थापित अनाथालयो। शिशु-सदनों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। इसके अलावा स्वयं सेवी संगठनों को भी इसके द्वारा वित्तीय सहायता उपलब्ध की जाती है।