जनजाति की संकल्पना - Concept of Tribe
जनजाति की संकल्पना - Concept of Tribe
2011 के जनगणना के अनुसार भारत में अनुसूचित जनजातियों की कुल जनसंख्या 0.42,81.034 है। उसमें से पुरुष जनसंख्या 5.24.09,823 तथा स्त्रियों की जनसंख्या 5,18.71 211 है। स्त्री 50 अनुपात कुल जनसंख्या में जनजातियों की 8.6 प्रतिशत है। जनजातियों के विकास को देखने के पहले हमें उनके ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को देखना अनिवार्य बन जाता है। जीवाश्मिक प्रमाणों के आधार पर ऐसा माना जाता है कि मानव का उद्भव भारत में लगभग 5 लाख वर्ष पुराना है। दिन-ब-दिन मानव जाति, प्रजातीय, सांस्कृतिक एवं भाषायी दृष्टिकोण से निरंतर बढ़ती हुई सजातीपता की ओरबढ़ने में आता और प्राचीन संस्कृतियाँ समाप्त अथवा मृतप्रायः हो रही है। इस श्रेणी में आदिम जनजातीय, आदिवासी, मूल निवासियों जैसे संभ्रमित कर देने वाले विविध नामों वाला मानवता का एक बड़ा अंश आता है। मानवशास्त्री, समाजशास्त्री, सामाजिक कार्यकर्ता, प्रशासक तथा ऐसे ही दूसरे लोग जो जनजातियों तथा उनकी समस्याओं को सैद्धांतिक स्तर तथा व्यावहारिक आधार पर जानने के लिए जुड़े हैं।
भारत वर्ष में हजारों वर्षों से जंगलों में पहाड़ों में रह रही आदिम जनजातियों ने खुले मैदानों तथा सभ्यता के केंद्रों में बसे लोगों से अधिक संपर्क स्थापित किए बिना ही अपने अस्तित्व को बनाए रखा है। ऐसा माना जाता है कि जनजातीय लोग भारत के मूल निवासी है। विदेशीवों के लगातार आक्रमण तथा अधिक शक्तिशाली पड़ोसी समुदायों के निरंतर दबाव के कारण उन्हें जंगलो पहाड़ों एवं अन्य दुर्गम क्षेत्रों की ओर जाने के लिए बाध्य होना पड़ा। अलग-अलग रहने के कारण इन समुदायों ने अपनी पृथक संस्कृति परंपराएँ भाषा एवं प्रशासनिक ढांचा बना लिया। कुछ जनजातियों ने एक स्थानपर बस कर व्यवस्थित रूप से खेती करना शुरू कर दिया तो कुछ जनजातिया स्थान बदलबदल कर कृषि करते रहे तथा कुछ शिकार एवं भोजन संग्रहण इत्यादि पर निर्भर रहते थे। अंग्रेज उपनिवेशवादी अपनी आधुनिक प्रौद्योगिकी नवीन उपागम तथा निहित स्वार्थों के साथ प्रकट हुए उन्होंने व्यापारियों साहूकारों तथा भूमि पर कब्जा करने वाले परदेसियों के प्रभाव को बढ़ाकर जनजातीय क्षेत्रों की ओर प्रवसन को सुविधाजनक बना दिया। इस कारण जनसंख्या के दबाव तथा जमीदारों द्वारा क्रूर शोषण तथा दमन ने किसानों तथा कारीगरों का आधिपत्य जनजातीय क्षेत्र में बढ़ गया।
जनवातीय क्षेत्रों में बनवातीय व्यवस्था के भंग हो जाने की स्थिति ने जनजातियों में अठारहवीं शताब्दी के अंत में पहाड़ी लोगों का विद्रा मुद्रा विद्रोह (1789. 1901), संथाली विद्रोह (1855-56) भात विद्रोह (1879-80) बस्तर विद्राह (1910-11) तथा गोड विद्रोह (1940) सामने आते हैं। 1935 के भारत सरकार अधिनियम के अनुसार जिन-जिन स्थानों पर जनजातियाँ बसी उनमें से अधिकतर को बर्जित अथवा आंशिक रूप में वर्जित क्षेत्र घोषित कर दिया गया। ब्रिटिश उपनिवेशवादियों की विदाई तथा स्वतंत्र भारत के उदय के साथ देश के जनजातीय नागरिकों को उचित न्याय व व्यवहार देने का वादा किया गया। इस प्रकार इनको कुछ मामलों में प्रगति में भागीदारी का विशेष अवसर भी प्राप्त हुआ। जनजाति की उन्नति हमारे संविधान निर्माताओं के विश्वास का प्रतीक था। क्या हम इस स्वप्न को प्राप्त कर सकें? इस प्रश्न के उत्तर को प्राप्त करने के लिए जनजातियों के सामाजिक आर्थिक स्थिति की समीक्षा करने से पहले जनजाति एवं अनुसूचित जनजाति की संकल्पना से अवगत होना होगा।
नदीम हसनैन ने अपनी पुस्तक 'जनजातीय भारत में इम्पीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया में जनजाति को परिभाषा करते हुए कहते हैं कि जनजाति, समान नाम धारण करने वाले परिवारों का एक संकलन है।
जिनका मानबोली हॉ, एक ही भूखंड पर अधिकार का दावा करते हो अपना दखल रखते हो, ओ साधारणतया अंतर्विवाही न हो यद्यपि मूल रूप में चाहे वैसे रह रहे हो। आक्सफोर्ड शब्दकोश में जनजाति को इस तरह परिभाषित किया गया है जनजाति विकास के आदिम अथवा बर्बर आचरण में लोगों का एक समूह है जो एक मुखिया की सत्ता स्वीकारत होत साधारणतया अपना एक समान पूर्वज हो।"
डी. एन. मजूमदार (1944) ने Races and Cultures in India में जनजाति के संबंधित विचार रखा है कि "जनजाति क्षेत्रीय संबंध युक्त तथा अंतर्विवाही सामाजिक समूह है जिसके कार्यों में कोई विशेषज्ञता नहीं होती, जो जनजातीय अधिकारियों द्वारा शासित, वंशानुक्रम अथवा अन्य बोली में से जुड़े हुए अन्य जनजातियों अथवा जातियों से सामाजिक दूरी को मान्यता के वाले अपने प्रति किसी प्रकार की सामाजिक असमानताओं को नहीं जोड़ते (जैसा कि जाति संरचना में होता है जो जनजातीय परंपराओं में विश्वास रखते हैं तथा प्रथाओं का पालन करते हैं विदेशी स्रोतों के विचारों के प्राकृतिकीकरण में अनुदारता तथा सबसे अधिक सजातीयता और क्षेत्रीय अखंडता में विश्वास करते हैं।" नदीम हसनैन ने अपनी पुस्तक जनजातीय भारत में एल. एम. लेविस के परिभाषा का उल्लेख किया
है- आदर्श रूप में जातीय समाज आकार में छोटे अपने सामाजिक विधिक तथा राजनीतिक संबंधों की स्थानिक एवं कालिक परास (Temporal range) में प्रतिबंधित होते हैं तथा नैतिकता धर्म तथा तदनुरूप आयामों की विश्व दृष्टि रक्षा की दृष्टि से भी जनजातीय भाषाएं अलिखित होती हैं, अस्तु संचार की सीमा काल और दोनों ही दृष्टियों से अवश्यम्भावी रूप से संकीर्ण है। इसके बावजूद जनजातीय समाज आलेखों में मिलता प्रदर्शित करते हैं तथा अपने में एक ऐसी अभिसकुचन एवं आत्मनिर्भरता रखते हैं जिसका आधुनिक समाज में अभाव है।"
जनजाति एक मानवशास्त्रीय संकल्पना है। कुछ लेखकों ने इसे जडात्मवादी अथवा आदिवासी कहा है। उपर्युक्त विद्वानों की परिभाषाओं से स यह कह सकते है कि कुछ समान गोत्र वाले समूह गांव अथवा अन्य विशेष समूह समाविष्ट होते हैं। यह समान्यतः एक निश्चित क्षेत्र पर आधिपत्य एक विशिष्ट बोली, एक विशिष्ट एवं समरूप संस्कृति के कारण पहचाने जाते हैं। यह या तो एक एकीकृत राजनीतिक संस्था है अथवा कम-से-कम बाहर वालों की तुलना में इनमें कुछ एकता की भावना होती है। इस तरह जनजाति एक क्षेत्रीय समूह होता है जिसकी अपनी भाषा, धर्म, संस्कृति एवं एकीकृत सामाजिक संगठन होता है।
रवीन्द्र नाथ मुखर्जी (1966) ने विभिन्न विद्वानों के परिभाषाओं के आधार पर अपने किताब भारतीय सामाजिक संस्थायें में जनजाति की कुछ विशेषताएँ बताए हैं, जो निम्नलिखित है
1. एक जनजाति अनेक परिवारों के समूह का एक संकलन होता है
2. प्रत्येक जन की अपनी एक सामान्य भाषा होती है, जिसमें विचारों का आदान-प्रदान और पारस्परिक एकता व सामाजिक संगठन का विकास सरलता से हो सके।
3. इनका एक सामान्य नाम होता है,
4. ये एक निश्चित भू-भाग पर रहती हैं,
5. एक जनजाति प्रायः अंतर्विवाही होते हैं, ये अपनी जनजाति से बाहर विवाह नहीं करते। परंतु आधुनिक युग में यातायात के साधनों की उन्नति के साथ एक जनजाति का पढ़ोसी जनजातियों से संपर्क बढ़ गया है, जिसके फलस्वरूप अनेक जनजातियाँ अपने जनजातीय समूह से बाहर भी शादी करते हैं;
6. एक जनजाति के सदस्यों में पारस्परिक आदान-प्रदान के कुछ सामान्य नियम और निषेध होते हैं। जिनको प्रत्येक सदस्य को मानना पड़ता है, जिसके आधार पर इनके व्यवहार नियमित होते हैं,
7. एक जनजाति की एक सामान्य संस्कृति होती है और बाहर के समूहों के विरुद्ध इसके सदस्यों में एकता की भावना भी होती हैं;
8. प्रत्येक जनजाति का एक राजनैतिक संगठन होता है इसलिए इसकी शासन व्यवस्था भी अपनी होती है। इस शासन व्यवस्था में प्रत्येक जनजाति का अपना जातीय मुखिया होता है। यह पद आनुवांशिक तौर पर चलता है। इस मुखिया को अपने कार्य में सहायता देने के लिए बड़ेबूदा की एक परिषद भी होती है, जिसे मुखिया काम करता है।
आज देश के विभिन्न हिस्सों में रहने वाली जनजातिया सामाजिक आर्थिक विकास के विभिन्न स्तरों पर पहुँच गई हैं। कुछ ही ऐसी बची है जो कि उपरोक्त परिभाषा की अपेक्षाओं को पूर्ण से रूप पूरा करती हैं। उदाहरण के लिए हमारे यहा अंडमान निकोबार द्वीप समूह में रहने वाली आग एवं अंडमानी जनजातियाँ हैं। बिहार की बिरहोर अथवा केरल की कडूनायकन है जो बहुत ही पिछड़ी हुई है और आज भी अपनी जीविका शिकार, मछल्ली पकड़ने एवं कदमूल फल इकट्ठा कर चलाती है। दूसरी ओर मेघालय की खासी या सुशाई जैसी जनजातियों में जो आर्थिक एवं शैक्षिक ढोना ही दृष्टि से पूरी तरह से विकसित हैं जैसे गुजरात की दोडिया राजस्थान की मीणा, पश्चिमी बंगाल की भूमिता इस सांस्कृतिक एवं आर्थिक भिन्नता के बावजूद एक जनजाति का सामाजिक अस्तित्व एक हकीकत है। परिभाषा में बताई गई विशिष्टताओं के कारण जनजातियाँ सामान्य जनसंख्या मे एकदम अलग दिखाई देती हैं।
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