वृद्धों की संवैधानिक सुरक्षा - constitutional protection of the elderly

वृद्धों की संवैधानिक सुरक्षा - constitutional protection of the elderly

भारत के संविधान में वृद्धजनों के कल्याण का प्रावधान से राज्य के नीति निर्देशित तत्त्व (अनुच्छेद 41) के अनुसार राज्य अपनी आर्थिक क्षमता एवं विकास को ध्यान में रखते हुए वृद्धजनों हेतु सरकारी सहायता का अधिकार सुनिश्चित करेंगे। इसके अतिरिक्त अन्य प्रावधान भी है, जो राज्य को निर्देशित करते है कि वह अपने नागरिकों के जीवन में गुणात्मक सुधार लाएं हमारे संविधान में समानता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है। इसके प्रावधान वृद्धों के लिए भी प्रभावी है और सामाजिक सुरक्षा का दायित्व भाटिया (1983) ने वृद्धावस्था को तीन दृष्टिकोणों से परिभाषित किया है। इस कारण हम इस परिभाषा को छाता परिभाषा (Umbrela Defination) के रूप में देख सकते हैं। इसके अनुसार वृद्धावस्था को तीन आयामों से परिभाषित किया जा सकता है जैविक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक-सांस्कृतिक


• जैविक वृद्धावस्था से तात्पर्य है बालों में सफेदी दातों की हानि और दृष्टी की स्पष्टता का हास 


• मनोवैज्ञानिक रूप से वृद्धावस्था के संदर्भ में तंत्रिका तंत्र का अध्ययन किया जाता है। इसमें मानसिक क्षमताओं में गिरावट उनके प्रति दूसरों के दृष्टिकोण और व्यवहारशामिल हैं।


• सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टिकोण परिवार समुदाय और समाज के सदस्य के रूप में व्यक्ति में परिवर्तन और बदलती परिस्थितियों को दर्शाता है। इन परिवर्तनों को माता-पिता की भूमिका, काम से सेवानिवृत्ति कम आय, रोग, विकलांगता और उनकी जरूरतें शामिल हैं। वृद्धावस्था स्वयं में एक समस्याग्रस्तता की अवस्था है इसे दूसरा बचपन भी कहा जाता है। ऐसे में इनके सामने विभिन्न तरह की समस्याएं आती है जिसका निवारण करने में वे अक्षम पाए जाते हैं उन समयाओं के निवारण तथा उचित जीवन-यापन हेतु भारतीय संविधान उनके लिए विभिन्न प्रावधान के अंतर्गत सुरक्षा मुहैया कराता है।


वृद्धों की संवैधानिक सुरक्षा


भारत के संविधान में वृद्धजनों के कल्याण का प्रावधान है राज्य के नीति निर्देशित तत्त्व (अनुच्छेद 41) के अनुसार राज्य अपनी आर्थिक क्षमता एवं विकास को ध्यान में रखते हुए वृद्धजना हेतु सरकारी सहायता का अधिकार सुनिश्चित करेंगे इसके अतिरिक्त अन्य प्रावधान भी है, जो राज्य को निर्देशित करते है कि वह अपने नागरिकों के जीवन में गुणात्मक सुधार लाएं हमारे संविधान में समानता का अधिकार के प्र एक मौलिक अधिकार है। इसके प्रावधान वृद्धों के लिए भी प्रभावी है और सामाजिक सुरक्षा का दायित्व राज्य एवं केंद्र सरकारों पर समाप्त रूप से है।


पहचान पत्र जारी करना, यातायात में छुट यातायात में आरक्षण, यातायात गाड़ियों में सुलभ प्रवेश और निर्गमन के लिए आवश्यक परिवर्तन आदि। के सीआरपीसी की धारा 125 के अनुसार सक्षम न्यायाधीश माता-पिता के भरण पोषण प्रावधान के अंतर्गत संतान को उनके माता-पिता की देखभाल की आज्ञा दे सकते हैं। हिंदू उत्तराधिकार और भरण-पोषण अधिनियम के अनुसार, वरिष्ठ माता-पिता अपनी संतान से वैसे ही रख-रखाव की मांग कर सकते हैं जैसे कि एक पत्नी अपने पति से रखती है।


बहुत पहले आवास में रह रहें है बुजुर्ग माता-पिता को उनके आवास से बिना विहित विधिक प्रक्रिया के नहीं हटाया जा सकता। इसके लिए सीआरपीसी, भरण-पोषण अधिनियम एवं घरेलु हिंसा अधिनियम में प्रावधान किए गए हैं।