अनुसूचित जनजाति की संवैधानिक संरक्षण उपबंध - Constitutional Protection Provisions of Scheduled Tribes

अनुसूचित जनजाति की संवैधानिक संरक्षण उपबंध - Constitutional Protection Provisions of Scheduled Tribes

अनुच्छेद 14(4): सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक हितों को प्रोत्साहन यद्यपि अनुच्छेद 15 द्वारा धर्म, मूलवंश जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर किसी प्रकार के भेदभाव का निषेध किया गया है, फिर भी इसी अनुच्छेद के खंड4 में एक छूट की व्यवस्था है, जिसके अनुसार राज्य को अनुसूचित जातियों और जनजातियों एवं सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े नागरिकों की उन्नति एवं प्रगति के लिए कोई भी उपबंध बनाने का अधिकार दिया गया है। यह उपबंध अनुच्छेद 46 में परिकल्पित इस नीति के अनुरूप है कि राज्य को पूरी जिम्मेदारी के साथ कमजोर वर्गों के शैक्षिक एवं आर्थिक हितों को प्रोत्साहित करना एवं सामाजिक अन्याय से उनकी रक्षा करना चाहिए।


अनुच्छेद 16(4): पढ़ों और नौकरियों में आरक्षण और अनुच्छेद 19(5) के अंतर्गत राज्य अनुसूचित जनजाति के लोगों के हितों की रक्षार्थ विशेष प्रतिबंध लगा सकती है। चूंकि इस समाज के साथ सभी प्रकार की धोखेबाजी करना और इसका शोषण करना आसान है इसलिए ऐसी व्यवस्थाएं भी की गई हैं जिनके अंतर्गत ये लोग कुछ विशेष परिस्थितियों को छोड़कर, अपनी निजी संपत्ति किसी को हस्तांतरित नहीं कर सकते।


अनुच्छेद 23: मानव के दुर्व्यवहार और बलात श्रम का प्रतिषेध आदि। इसके द्वारा मानव का दु बेगार और अन्य प्रकार के बलात श्रम प्रतिषिद्ध किए गए हैं। यह बहुत महत्वपूर्ण उपबंध है क्योंकि अनुसूचित जनजातियों का शोषण करना बड़ा आसान है और उनके लोगों को बंधुआ बनाया जा सकता है। वास्तव में देश के जनजातियों के सदस्यों का एक बड़ा हिस्सा बंधुआ होने के कारण बहुत ही शोषण से पीड़ित एवं दुखद जावन बिता रहा है। जैसे हम देखते है कि आंध्र प्रदेशम गोया बहटी प्रथा से कोया होरा, कॉडारेड्डी कुमार जनजाति और भारत के अन्य जगह पर काटिया, हाली, बेट, सगड़ी, जीवा नामक प्रथा से विभिन्न जनजातियां प्रभावित है।


अनुच्छेद 29 सांस्कृतिक एवं शैक्षिक अधिकार 29(2) अनुच्छेद 15 की धारा 4 से नियंत्रित है। प्रथम संशोधन अधिनियम 1951 द्वारा संविधान में सम्मिलित इसने अनुच्छेद 15 और 29 को अनुच्छेद 16(4), 46 और 340 के अनुकूल बना दिया है। इस प्रकार राज्य द्वारा सरकारी शैक्षिक संस्थानों में पिछड़े वर्ग के लिए पदों का आरक्षण संविधान सम्मत हो गया है। अनुच्छेद 29 के अनुसार भारतीय नागरिकों के किसी भी ऐसे अनुभाग को जिसकी अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति है उसे बनाए रखने का अधिकार है। यह अनुच्छेद अनुसूचित जनजातियों को अपनी भाषाओं और संस्कृतियों को बनाए रखने के लिए संरक्षण प्रदान करता है। राज्य द्वारा कोई कानून बनाकर उन पर कोई संकृति या भाषा लादी नहीं जा सकती है।


अनुच्छेद 46: अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति एवं अन्य कम्मोर वर्गों के शैक्षिक एवं आर्थिक हितों को प्रोत्साहित करना, अनुच्छेद 244: अनुसूचित क्षेत्रों एवं जनजाति क्षेत्रों का प्रशासन अनुच्छेद 275: कुछ राज्यों को केंद्र द्वारा अनुदान, अनुच्छेद 330: लोकसभा में (हाउस ऑफ दि पीपल) अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए सीटों का आरक्षणअनुच्छेद 332: अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए राज्यों के विधान सभाओं में सीटों का आरक्षणअनुच्छेद 335: अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जाति के नौकरी एवं पदों के लिए दावे 


अनुच्छेद 338: अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए विशेष अधिकार इत्यादि अनुच्छेद 339: अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन एवं अनुसूचित जनजातियों के कल्याण पर केंद्र का नियंत्रण


अनुच्छेद 164 बिहार, उड़ीसा और मध्य प्रदेश के राज्यों में जनजातियों के कल्याण के भारसाधक मंत्री की नियुक्ति। इन राज्यों में जनजाति के लोगों की खासी आबादी है और जनजाति के कल्याण के लिए विशेष रूप से एक मंत्रों की व्यवस्था जनजाति के हितों की सुरक्षा के लिए संविधान निर्माताओं की चिंता की साक्षी है।


अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए एक विशेष अधिकारी की व्यवस्था है जिसे राष्ट्रपति नियुक्त करता है। इस विशेष अधिकारी का कर्तव्य है कि वह अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए संविधान के अधीन उपबन्धित रक्षा के उपायों से संबंधित सभी विषयों का अन्वेषण करे। वह रक्षा के उन उपायों के कार्यकरण के संबंध में ऐसे अंतराल पर जो राष्ट्रपति निर्दिष्ट करें राष्ट्रपति को प्रतिवेदन दे राष्ट्रपति ऐसे सभी प्रतिवेदनों को संसद के प्रत्येक सदन में रखवाएगा। यह विशेष अधिकारी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयुक्त कहलाता है। 65 वें संशोधन के बाद इसके जगह पर अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों का राष्ट्रीय आयोग गठित हो चुकालेकिन

2004 में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए अलमअलग आयोग बनाए गए है। अनुच्छेद 339(1): राष्ट्रपति राज्यों के अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन और अनुसूचित जनजातियों के कल्याण के बारे में प्रतिबेदन देने के लिए एक आयोग की नियुक्ति आदेश द्वारा किसी भी समय कर सकेगा और इसे संविधान के प्रारंभ से दस वर्ष की समाती पर करेगा। स्व श्री यू. एन. डेबर के अध्यक्षता में 28 अप्रैल 1960 में अनुर क्षेत्र एवं अनुसूचित जनजाति आयोग नियुक्त किया गया था इस आयोग ने अपना प्रतिवेदन 1961 में प्रस्तुत किया था। 2003 में इसी प्रकार का एक दूसरा आयोग श्री डी एस. भूरिया की अध्यक्षता में गठित किया गया है।


अनुसूचित जनजातियों के आर्थिक विकास के उद्देश्य से भारतीय संविधान में की गई व्यवस्थाएं मुख्यतः अनुच्छेद 275: के अंतर्गत संविधान उपबंधों की पूर्ति के लिए राज्यों को संप से अनुदान मिलने की व्यवस्था है। अनुच्छेद 339(2) की स्थापना है कि संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार किसी ऐसे निर्देश देने तक होगा जो उस राज्य की अनुसूचित जनजातियों के कल्याण के लिए निर्देश में आवश्यक बताई गई स्कीमों के बनाने और उनके निष्पादन के बारे में है।