अनुसूचित जनजाति की संवैधानिक स्थिति - Constitutional Status of Scheduled Tribes

अनुसूचित जनजाति की संवैधानिक स्थिति - Constitutional Status of Scheduled Tribes

जनजाति को अनुसूचित जाति के रूप में पहचान करने में आने वाली कठिनाइयों के बावजूद देश के नीति निर्माता, योजना बनाने वाले और प्रशासक जनजताय समुदायों की सामाजिक, शैक्षिक एवं आर्थिक पिछड़ेपन की दशा से पूरी तरह परिचित थे लेकिन सुरक्षात्मक एवं सुधारात्मक कदम उठाने से पूर्व ऐसे जनजतीय समुदायों की एक सूची बनाना जरूरी था, जिन्हें अपनी उन्नति एवं विकास के लिए देखभाल एवं संरक्षण की आवश्यकता है। इस तरह की पहिली सूची आदिम जनजातियों के नाम से 1931 में जारी की गई। बाद में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 के अंतर्गत भारत के लिए पिछड़ी जनजातियों की एक सूची निकली गई। संविधान के अनुसूचित जनजातियाँ) आदेश 1950 के अंतर्गत अनुसूचित जनजातियों की सूची वास्तव में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 में पिछड़ी जनजातियों को सम्मिलित करके बनाई गई।


जनजातियों की पहचान करते समय अनुसूचित जनजाति पिछड़े वर्ग के रूप में उल्लिखित होने योग्य जातियों के बारे में आयोग ने अपनी प्रश्नावली की प्रस्तावना में कहा है- समान्यतया सानुसूचित जनजातियों को इस तथ्य से भी पहचाना जा सकता है कि यह पर्वतों पर अकेले रहते हैं और अगर मैदानों में भी रहते हैं तो वहां भी अलग-अलग एवं कृत अस्तित्व के साथ जीते हैं। वह सामान्य जन के साथ पूरी तरह घुले मिले नहीं होते। अनुसूचित जनजातियाँ किसी भी धर्म की हो सकती हैं। वह अपने जीवन के तौर-तरीकों के कारण अनुसूचित जनजातियों की सूची में स्थान पाती है। इसी तरह अनुसूचित जनजातियों एवं अनुसूचित जनजातियों की सूची में संशोधन के लिए बनी परामर्श समिति नेमी जिसे लोकूर कमेटी के नाम से जाना जाता है, आदिम विशेषताए, विशिष्ट संस्कृति भौगोलिक अलगाव, समाज से संपर्क स्थापित करने में झिझक एवं पिछडेपन को अनुसूचित जनजाति के लिए पात्रता का मुख्य मानदंड माना है।


स्वतंत्र भारत का संविधान स्वीकृत हो जाने के बाद उनकविकास और कल्याण का दायित्व राष्ट्रपति एवं राज्यपाल के माध्यम से लोकप्रिय सरकार को सौंपा गया। निर्देशक तत्वों का अनुगमन करने के लिए अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के कल्याणार्थ विशेष अनुच्छेदों की व्यवस्था की गई है। इनमें से ज्यादातर दोनों वर्गों के लिए एक समान है। किंतु ऐसे भी है जो इन दोनों में से किसी एक पर लागू होते हैं। निम्नलिखित विषय-वस्तु के आधार पर इन सवैधानिक उपबंधों को दो समूहों में विभाजित किया जा सकता है.


1) संरक्षण संबंधी उपबंध 


2) विकास संबंधी उपबंध