सामाजिक विधान के समकालीन संदर्भ - Contemporary context of social legislation
सामाजिक विधान के समकालीन संदर्भ - Contemporary context of social legislation
प्रबोधन के बाद विश्व में व्यक्तिवादिता को बढ़ावा मिला। परिणामतः व्यक्ति के हितों को ज्यादा महत्त्व प्राप्त हुआ। आगे राष्ट्र राज्य के उभार ने नई अस्मिताओं के निर्माण का रास्ता खोल दिया। राष्ट्रराज्य के उभार के शुरूआती समय में हम देखते हैं कि इसका स्वरूप कुछ हद तककल्याणकारिता का था। भारत जैसे औपनिवेशिक जाल में फंसे राष्ट्र के निर्माण को देखें तो पता चलता है कि यहाँ शुरुआत समाज सुधार से हुई थी स्वतंत्रता के बाद बंचितों के कल्याण की बात सामने आ सकी। उस समय संविधान निर्माताओं ने इसे बखूबीइसे जगह भी दी है। इस समय में वचितों की सुरक्षा और कल्याण का भार सरकार पर था और इसका निर्वहन करने के लिए स्वतंत्रता के बाद विभिन्न अधिनियमों के आधार पर इसका अनुपालन लगातार किया जा रहा है।
राष्ट्र-राज्य साठ के दशक तक अपनी कल्याणकारिता की भूमिका को निभा रहे थे परंतु उसके बाद नीती निर्माताओं के सोच में आया परिवर्तन समाज में असंतोष और अन्य समस्याओं का स्थायी रूप धारण करना, इन सबके कारण समाज में प्रत्येक समूह समुदाय अपने अधिकार तथा पहचान को लेकर काफ़ी उत्तेजित रहे थे नब्बे के दशक में आते-आते अस्मिताई आंदोलनों ने जोर पकड़ा इसका असर यह हुआ कि समाजिक अधिनियमों को फिर से संशोधित करना पड़ा। उक्त बातों से पता चलता है कि समाज परिवर्तनशील होता है और उसके संदर्भों में लगातार बदलाव शामिल होते हैं। ऐसे में पुराने मानक किसी काम के नहीं होते उसकी जगह नए मानक लेते हैं। सामाजिक अधिनियम या विधान बनने की प्रक्रिया के साथ भी यही हुआ है। बदली हुई समाजिक परिस्थितियों ने सामाजिक अधिनियमों को बदलने पर मजबूर किया है। उदाहरण के लिए हम देखते हैं कि महिलाओं के साथ बढ़ते अत्याचार के आंकड़ों ने बलात्कार संबंधी कानून में परिवर्तन लिए मजबूर किया। ऐसे कई सारे संदर्भ हैं, जिसके कारण सामाजिक विधान में काफी परिवर्तन तथा संशोधन लाएकराए जा रहे हैं। इस इकाई में हम इन्हीं संदर्भों के साथ सामाजिक विधान को समझने की कोशिश करेंगे।
सामाजिक विधान
समाज की प्रत्येक अवस्था में हम देखते हैं कि समाज का एक वर्ग स्वयं को प्रभु बताता है तथा कुछ विशेष अधिकार (जातिय, जन्मजात, वर्ग आदि के आधार पर प्राप्त अधिकारों के आधार पर अन्य को दबाता है तथा उनके प्राकृतिक अधिकारों का हनन करता है। मार्क्स के अनुसार कहें तो वे समाज को दो वर्गों में विभाजित करते हैं. शोषक और शोषिता सामाजिक रूप से निर्मित इस भेदभाव के कारण कुछ तबके स्वयं को दाबित, दलित, पिछड़ा तथा कमजोर मानने लगते हैं।
फ्रांस की क्रांति से उपजे समता, बंधुता तथा स्वतंत्रता जैसे मूल्यों ने समाज को नए सिरे से ढांचागत परिवर्तन के लिए मजबूर किया। लोकतंत्र का सूत्रपात यहीं से होता है। राष्ट्रराज्य के उदय के पश्चात उसने समाज के इस शोषणकारी व्यवस्था तथा इस भेदभावपूर्ण रवैये पर नकेल कसने के भरसक प्रयत्न किए राष्ट्र राज्य को इस प्रक्रिया में जिस महत्वपूर्ण साधन का सहयोग मिला वह कानून अधियम या विधान कहलाता है। वंचित समूहों के कल्याण के लिए अधिनियम के साथ राज्य का हस्तक्षेप प्रजातंत्र का अनिवार्य पहलु है। समाज में बढ़ती असमानता को नियंत्रित करने, वंचित समूहों के सुरक्षा तथा कल्याण हेतु राष्ट्रराज्य कानून बनाता है। इन्हें ही सामाजिक विधान कहा जाता है।
होगन एवं इन्नी के शब्दों में कहें तो, सामाजिक विधान के अंतर्गत सरकारी तंत्र या शासन निकाय द्वारा की जाने वाली कार्यवाही शामिल है, जो ऐसे तत्वों को दूरकरती है, जो आपत्तिजनक है और जो इसके बदले कुछ अन्य तत्वों को सामने रखते हैं, जिसके लिए पद्धति के पास कोई प्रावधान नहीं है। अतः सामाजिक विधान, असमानताओं को दूर करने का प्रयास करता है जिससे कुछ गिने-चुने व्यक्तियों के बजाय पूरे समुदाय को फायदा होता है। इसके अंतर्गत समय-समय पर कानूनों को समायोजित किया जाता है. इनमें कुछ और कानून जोड़े जाते हैं और कभीकभी मौजूदा कानूनों में परिवर्तन भी किया जाता है। इसलिए सामाजिक विधान न केवल व्यक्तियों की सामाजिक दशाओं को सुधारता है बल्कि निश्चित समयावधि में समाज की मागअपेक्षाओं और मौजूदा कानूनों के बीच की की भरने में सेतु का भी काम करता है।" सामाजिक विधान का महत्त्व
• सामाजिक विधान और अन्य विधानों में अंतर है क्योंकि सामाजिक विधान का मुख्य
मानवतावादी और समतावादी सिद्धांतों को ध्यान में रख कर सामाजिक न्याय स्थापित करने बालविधी नीतियों को मुख्य रूप से उजागर करता है।
• समाज के गरीब, उत्पीड़ित और सुविधाबंचित वर्गों की सहायता के लिए सामाजिक विधान सुनित किया गया है।
● शोषण को दूर करना सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय दिलाने के लिए सामाजिक अधिनियम का भरसक प्रयास रहता है। सामाजिक विधान के दो बुनियादी कार्य है।
1. सामाजिक संबंध का क्रमबद्ध समजन प्रदान करना चा
2. समाजी इकाई में सभी व्यक्तियों के कल्याण करना और उन्हें सुरक्षा प्रदान करना। सामाजिक विधान का मुख्य उद्देश्य यह है
समाज में समानता स्थापित करना और समाज की आवश्यकताओं की और ध्यान देना तथा सामाजिक व्यवस्था में असंतुलन वा असमानताएं पैदा करने वाले तत्वों की रोकथाम करना।
सामाजिक विधान को समझते हुए हमने यह जाना कि सामाजिक विधान समाज के बंचितों के हितों के लिए क्रियान्वित किए जाते हैं। ऐसे में समकालीन संदर्भ का असर उस पर अनिवार्य रूप से होता है। जैसे कि हमने इकाई की प्रस्तावना में ही की है की भूमिका का असर सामाजिक अधिनियम पर पड़ता है। जैसे ही सामाजिक समस्याओं राजनैतिक विचारधारा आदि सामाजिक विधान के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभातें है। इसे निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर हम समझने की कोशिश करेंगे।
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