समकालीन सामाजिक समस्या और सामाजिक विधान - Contemporary Social Problem and Social Legislation
समकालीन सामाजिक समस्या और सामाजिक विधान - Contemporary Social Problem and Social Legislation
वर्तमान समाज को कई विद्वान उत्तराआधुनिक समाज के रूप में व्याख्यायित करते हैं। इसके बावजूद औद्योगिक क्षेत्र में हम देखते हैं कि उत्तर औद्योगिकता के द्वार पर समाज खड़ा है। पुराने मानक ढहते नजर आ रहे हैं। ऐसे में समस्याएं भी नएनए रूपों में सामने आ रही हैं। एक समय था जब सती प्रथा को एक सामाजिक समस्या के रूप में मानकर लोगों ने सती प्रथा का विरोध किया। फलस्वरूप 1929 में इसके निषेध के लिए अधिनियम पारित हुआ। किंतु आज सती प्रथा जैसी समस्या नहीं रही है, किंतु महिलाओं की समस्याओं ने नया रूप धारण कर लिया है जिसके कारण उन पुराने अधिनियमों में संशोधन की मांग की जा रही है।
बलात्कार के संदर्भ में हम देखते हैं कि इस समस्या के संबंध में 974 से पहले का आंकड़ा एनसीआरबी द्वारा उपलब्ध नहीं होता है। इसका यह मतलब नहीं कि इससे पहले बलात्कार नहीं होते होगे अरूर होते होंगे, परंतु उसके प्रतिरोध में कार्यवाही नहीं होती होगी या उस समय के लोग ज्यादा सजग नहीं होंगे। बाद में हम देखते हैं कि बलात्कार के अपराधों पर रोक लगाने के संदर्भ में एक अधिनियम पारित होता है। हम आगे 'निर्भया मामले' में देखते हैं कि यह अधिनयम कितना आधा-अधूरा है। इसकी कमी को पूरा करने के लिए 2013 में संशोधन करवाने की मांग को समझते हुए उसमें काफी हद तक परिवर्तन भी किए गए है। महिला आन्दोलनों की तीव्रता का ही असर है कि 2005 में घरेलू हिंसा अधिनियम 2013 तथा कार्यस्थल पर महिला यौन उत्पीदन: विशाखा दिशा-निर्देश तथा अधियम 2013 आदि महिलाओं के सुरक्षा हेतु पारित किए गए।
सन 2000 के उपरांत भारत में विभिन्न मुद्दों पर हुए आंदोलनों पर खुलकर बहस हुई। इसी कारण सामाजिक नए-नए सामाजिक अधिनियमों को पारित किया गया। वर्ष 2005 में सबसे महत्वपूर्ण अधिनियम सूचना का अधिकार पारित किया गया। इसी साल परेलू हिंसा अधिगम भी पारित किया गया। सन 2006 में आदिवासियों के वन अधिकारों को प्रदान करने वाला वन अधिनियम पारित हुआ सन 2013 में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम पारित किया गया। इसी साल भ्रष्टाचार के रोकथाम के लिए चार लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम 2013 लागू इन सबके बावजूद सरोगेसी मानवाधिकार, पर्यावरण अस्मिता आदि मुद्दे केंद्र में बने हुए हैं। सूचना के अधिकार के बाद, खाद्य का अधिकार तथा अब स्वास्थ्य का की मांग भी अधिनियमों में कानून बनाने से बेहतर है कि उसे अधिकार के रूप में घोषित किया जाए, क्योंकि अब यह विचार तेज हो रहें हैं कि ये सब अपने अधिकार है।
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