संविधान के पाँचवी और छठी अनुसूचियाँ - Fifth and Sixth Schedules of the Constitution

संविधान के पाँचवी और छठी अनुसूचियाँ - Fifth and Sixth Schedules of the Constitution

संविधान के दसवें भाग में अनुच्छेद 244 और 244 (क) के अंतर्गत अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन से संबंधित व्यवस्थाएं हैं। संविधान में अनुसूचित क्षेत्रों और जनजाति क्षेत्रों का एक विशिष्ट अर्थबोध है। अनुसूचित क्षेत्रों का शासन पाँचवी अनुसूची के अनुसार होता है। जनजाति क्षेत्रों का शासन छठी अनुसूची के आधार पर होता है।


आंध्र प्रदेशबिहार, गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, हिमाचल प्रदेश एवं राजस्थान आदि राज्यों में अनुसूचित क्षेत्र घोषित किया गए (2013 में भारत के 9 राज्यों में अनुसूचित क्षेत्र आंध्र प्रदेश झारखंड छत्तीसगढ़, गुजरात, मध्य प्रदेश महाराष्ट्र, ओडिशा, हिमाचल प्रदेश एवं राजस्थान पाचवी अनुसूची के अनुसार अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन की योजना में केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों में उत्तरदायित्व का विभाजन किया गया है। राज्य सरकार को ऐसे कानूनों की बचपरा की जिम्मेदारी दी गई है, जो कि जनजातीय क्षेत्रों के लिए उपयुक्त नहीं है।

ये जनजातियों को सूखार महाजनों के शोषण से बचाने एवं जनजातीय भूमि के संरक्षण के लिए आवश्यक नियमों को बनाने के लिए भी जिमेदार हैं। वे अपनी सीमा के अंदर रहने वाली जनजातियों के कल्याण के लिए बोजनाएं भी कार्यान्वित करते हैं। केंद्रीय सरकार अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन के लिए दिशा निर्देश तैयार करती है। यह प्रशासन के स्तर में सुधार लाने एवं जनजातीय समुदायों का जीवन स्तर उठाने के लिए आवश्यक राशि भी उपलब्ध करता है। संप सरकार को अनुसूचित जनजातियों के कल्याण से संबंधित मुद्दों पर राज्य सरकारों को आवश्यक निर्देश देने का भी अधिकार है।


असम, नेपालय, मिजोरम और त्रिपूरा आदि राज्यों में अनुसूचित क्षेत्र है। यहां के राज्यपालों को पांचवी अनुसूची के अनुसार केंद्र अथवा राज्य कानूनों में संशोधन कर उन्हें जनजातीय क्षेत्रों में लागू करने योग्य बनाने का अधिकार दिया गया है। राज्यपाल जनजातीय समुदायों की देखभाल और संरक्षण के लिए आवश्यक अधिनियमों का निर्माण भी कर सकते हैं। पांचवी अनुसूची के अनुच्छेद के अनुसार राज्यपाल को अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन के संबंध में राष्ट्रपति को एक वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होती है। पांचवी अनुसूची के अनुच्छेद के अनुसार जिन राज्यों में परिषद बनाई गई है अनुसूचित क्षेत्र है अथवा जहा जनजातीय जनसंख्या का व्यापक कद्राकरण है। जनवाताव परामर्श समितिया वहा इनका कार्य संबंधित राज्यों को अनुसूचित जातियों के कल्याण एवं संरक्षण से संबंधित विषय पर सलाह देना है। समिति के कम-से-कम ६ सदस्य अनुसूचित जनजाति के प्रतिनिधि होते हैं जो कि राज्य की विधानसभा के सदस्य होते हैं अथवा जनजातीय समुदायों के अन्य प्रतिनिधियों में से लिए जाते हैं। नागालैंड, असम और मणिपूर के जनजाति क्षेत्रों व पर्वतीय क्षेत्रों से संबंधित विशेष उपबंध


अनुच्छेद 371-क (नागालैंड)- इस अनुच्छेद के अनुसार ऐसा कोई भी अधिनियम जो


(क) नागाओ का धार्मिक या सामाजिक प्रधाओं,


(ख) उनकी परंपरागत विधि और प्रक्रिया


(ग) उनकी परंपरागत विधि के अनुसार विनिश्चित होने वाले दीवानी एवं फौजदारी के न्यायप्रशासन और


(घ) भूमि एवं उसके संपत्ति स्रोतों के स्वामित्व एवं अंतरण से संबंधित है नागालैंड राज्य पर तब तक लागू नहीं होगा जब तक नागालैंड की विधानसभा विशेष संकल्प द्वारा वैसा विनिश्चित नहीं कर देती।


अनुच्छेद 371-ख (असम)- राष्ट्रपति के आदेश द्वारा असम राज्य की विधानसभा की एक समिति के गठन और कृत्यों के लिए उपलब्ध कर सकेगा। यह समिति जैसा कि छठी अनुसूची में बताया गया है


जनजाति क्षेत्रों से निर्वाचित वहा कि विधानसभा के सदस्यों से तथा उसी विधानसभा के उतने अन्य सदस्यों से मिलकर बनेगी, जीतने राष्ट्रपति के आदेश में विनिर्दिष्ट किए गए है। इस समिति की व्यवस्था का उद्देश्य राज्य के स्तर पर जनजाति समुदाय के हितों का संरक्षण और उसकी देखरेख करना होता है।


अनुच्छेद 371-ग (मणिपूर) इस अनुच्छेद के अंतर्गत राष्ट्रपति के आदेश से एक समिति का गठन और कृत्यों के संयोजन की व्यवस्था है। राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों से निर्वाचित विधानसभा के सदस्य इस समिति के सदस्य होते हैं। राज्यपाल को प्रतिवर्ष या जब कभी राष्ट्रपति वैसी अपेक्षा करें राष्ट्रपति को मणिपूर राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों के प्रशासन के बारे में प्रतिवेदन देना होता है। संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार उक्त क्षेत्रों के बारे में राज्य को निर्देश देने तक है।