भारत में नारीवाद का इतिहास - History of Feminism in India
भारत में नारीवाद का इतिहास - History of Feminism in India
समाज में स्त्रियों को दोहरी दृष्टि से देखने के कारण विद्वानों नारीवादियों और कुछ आलोचकों का ध्यान इस ओर आकृष्ट हुआ, जिसके कारण समाज में महिला की दयनीय व निम्न स्थिति में सुधार करने के उद्देश्य से कुछ प्रयास किए गए। इस इकाई के माध्यम से उन्हीं प्रयासों को प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।
भारत में नारीवाद का इतिहास
मध्यकालीन युग में महिलाओं की स्थिति में काफ़ी गिरावट आईभीर उन्हें अनेक यातनाओं और निषेधों से गुजरना पड़ा। इस परिस्थिति ने 19वीं शताब्दी की शुरुआत से ही कुछ समाज सुधारकों को अपनी ओर आकर्षित किया। महिलाओं की स्थिति में सुधार की पहल पुरुष समाज सुधारकों द्वारा की गई। भारत में नारीवाद के इतिहास को मुख्य रूप से निम्नलिखित लहरों में वर्गीकृत किया जा सकता है
1. पहली नारीवादी लहर (1850-1915)
2. दूसरी नारीवादी लहर (1915-1947)
3. तीसरी नारीवादी लहर (1947 से लेकर आज तक)
पहली नारीवादी लहर
भारत में पहली नारीवादी लहर समाज में विद्यमान अंधविश्वासों पौराणिक परंपराओं सती प्रथा, बाल विवाह, देवदासी प्रथा जैसी कुरीतियों को समाप्त करने के उद्देश्य पर केंद्रित थी। इस लहर में शिक्षित नेताओं, विचारकों और समाजसेवियों द्वारा महिलाओं की तत्कालीन स्थिति में सुधार करने का प्रयास किया गया। उनके द्वारा कई प्रकार के कानून का नियोजन किया गया कुछ पारित क़ानूनों का संशोधन किया गया और समाज में चेतना जागृत करने का काम किया गया। पुरुषों द्वारा कई सुधारवादी आंदोलन चलाये गए और महिलाओं की स्थिति में सुधार हेतु अन्य समूहों को भी संगठित किया गया। पुरुष समाज सुधारकों में प्रमुख हैं राजाराम मोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, दयानंद सरस्वती डॉ. धोंडो केशव में कवें स्वामी विवेकानंद सैयद अहमद खान, बदरुद्दीन तैयब जी आदि। इस सुधार के लिए अनेक संगठन यथा- आर्य समाज, ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज, रामकृष्ण मिशन आदि ने भी उल्लेखनीय प्रयास किए। इन सुधारों की ओर समाज के सभी वर्गों और समूहों का ध्यान खींचने के लिए कई पत्रपत्रिकाओं में निबंधों, संपादकीय आदि का लेखन शुरू किया गया कई कुरीतियों और अंधविश्वासों का खुले तौर पर विरोध किया गया।
1818 में राजाराम मोहन राय ने अपनी पुस्तिका के माध्यम से सती प्रथा और बहुविवाह के विरोध में आवाज बुलंद की। इसके साथ ही उन्होंने महिलाओं की हीन दशा और आर्थिक निर्भरता को समाप्त करने के लिए संपत्ति के अधिकार पर भी आवाज उठाई। 1828 में उन्होंने ब्रह्म समाज की स्थापना की और इस संगठन के माध्यम से उन्होंने सती प्रथा के विरोध में आदोलन किया। उनके प्रयासों के कारण ही 1829 में सती प्रथा निषेध अधिनियम पारित हो पाया। उन्होंने महिलाओं की स्थिति में सुधार करने की दृष्टि से संपत्ति के अधिकार बाल विवाह निषेध, स्त्री शिक्षा आदि पहलुओं की वकालत की। ब्रह्म समाज अंतर्जातीय विवाह को भी मान्यता देता है। इसने महिलाओं के लिए बोधिनी पत्रिका का संपादन किया। इस संगठन के प्रयासों के परिणामस्वरूप ही नागरिक विवाह कानून 1872 पारित किया गया, जिसमें अंतर्जातीय विवाह और तलाक को कानूनी रूप से मान्यता प्रदान की गई। साथ ही विवाह की आयु महिला के लिए 14 वर्ष और पुरुष के लिए 18 वर्ष निर्धारित की गई।
एम.जी. रानाडे और भंडारकर द्वारा 1867 में प्रार्थना समाज की स्थापना की गई और यह संगठन श्री शिक्षा पर विशेष जोर देता था। इंडियन नेशनल सोशल कान्फ्रेंस की स्थापना 1887 में होती है और इसने भी महिलाओं की स्थिति में सुधार हेतु महत्वपूर्ण अस किए) ईश्वरचंद्र विद्यासागर के प्रयासों के फलस्वरूप 1856 में विधवा पुनर्विवाह अधिनियम लागू हुआ। उन्होंने व्यक्तिगत रूप से विधवा पुनर्विवाह बहुपत्नी विवाह का विरोध और स्त्री शिक्षा पर जोर दिया। जब उन्होंने पहली बार एक विधवा का पुनर्विवाह कराया था तब उन्होंने इसके समर्थन में आवेदन पत्र पर 21,000 लोगों के हस्ताक्षर करवाए थे। दयानंद सरस्वती द्वारा 1875 में आर्य समाज की स्थापना की गई, जो बाल विवाह, पर्दा प्रथा, जाति प्रथा, सती प्रथा के विरोध से संबंधित संगठन था। केशव कर्वे द्वारा1916 में पुणे में पहला महिला विश्वविद्यालय स्थापित किया गया। 1917-18 के दौरान उनके द्वारा कर्वे प्राथमिक स्कूल शिक्षक और बालिकाओं के लिए ट्रेनिंग कॉलेज की स्थापना भी कीगई। स्वामी विवेकानंद द्वारा 1897 में रामकृष्ण मिशन और रामकृष्ण मठ की स्थापना की गई। उनका मानना था कि भारत में मूल रूप से दो बुराईयाँ पाई जाती है
भारतीय समाज में महिलाओं का पराधीन होना
• हिंदू समाज में असमानता और जाति व्यवस्था
उनका मानना था कि समग्र विकास के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि उसमें महिलाओं की भागीदारी को सुनिश्चित किया जाए। सैयद अहमद खान जो पहले मुस्लिम समाज सुधारक माने जाते हैंने की शिक्षा को महत्वपूर्ण माना है। बदरुद्दीन तैबन जी ने पर्दा प्रथा को समाप्त करने के प्रयास की सराहना की। 1910 के दशक के अंत में और 1920 के दशक की शुरुआत में नारीवादी आंदोलनों में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी को साफ तौर पर परिलक्षित किया जा सकता है।1920 के दशक के अंत तक श्रमिक आंदोलनों में भी महिलाएं शामिल होने लगी। लहौर के एक सम्मेलन में महिला श्रमिकों ने कई मांगें रखी यथा- जिन कारखानों में महिला कामगारों की संख्या अधिक है वहाँ पालनागृह, नर्सरी, प्रसूतिगृह आदि की व्यवस्था होनी चाहिए (इस माँग को बाद में मंजूरी दे दी गई। अन्य रोजगारों में भी यथा शिक्षिका, नर्स, सफाई करने वाली, खाद्य पदार्थ व हस्तकला उद्योग, भोजन पकाने वाली आदि में भी स्त्रियों की भूमिका को महत्व दिया जाने लगा। दूसरी नारीवादी लहर हालांकि पहली नारीवादी लहर ने महिलाओं को उनकी समस्याओं और उनके प्रति भेदभावपूर्ण व्यवहार के प्रति चेतना अवश्य पैदा की, तथापि महिलाओं को जागृत करने और स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी की दृष्टि से यह लहर काफ़ी महत्वपूर्ण थी। इस लहर ने एक ओर जहाँ महिलाओं के जीवन को क्रांतिपूर्ण तरीके से बदल दिया, वहीं दूसरी ओर कई महिला संगठनों की स्थापना भी की गई जिनमें से प्रमुख निम्न उल्लेखित हैं।
भारतीय महिला संघ ( 1917)
भारतीय महिला राष्ट्रीय परिषद (1925)
अखिल भारतीय महिला सम्मेलन (1927)
कुछ राष्ट्रीय नेताओं के सहयोग से प्रगतिशील महिला आंदोलन ने1929 में शारदा एक्ट (बाल विवाह नियंत्रण अधिनियम) के नियोजन में भूमिका निभाई। 1930 के दशक में विवाह और संपत्ति से संबंधित हिंदू महिलाओं के लिए कुछ कानून पारित किए गए। इसके अलावा कुछ अन्य कानून भी पास किए गए
● मुस्लिम पर्सनल लॉ
विनियोग अधिनियम, 1937
• मुस्लिम विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1939
तत्कालीन समय के कुछ प्रमुख स्थानीय महिला संगठन निम्न वे
• तमिल मधार संगम (1906, मद्रास)
• तमिल महिला संगठन
गुजरात स्त्री मंडल (1908, अहमदाबाद)
• बंग महिला समाज (1909)
● भारत का स्त्री महामंडल (1910)
● नारी समिति (1910)
कुछ प्रमुख स्थानीय संप्रादाय समूह निम्नवत थे।
फ़ारसी महिलाओं के लिए सी जारथोशटी मंडल (1903 बॉम्बे)
• मुस्लिम महिलाओं का सम्मेलन अंजुमन ए ख्वातीन-ए-इस्लाम मंत्री
• युवा महिलाओं के क्रिश्चियन एसोसिएशन 1914,YWCA)
प्रमुख महिला समाज सुधारक है सावित्री ज्योतिबा फुले, ताराबाई शिंदे पंडिता रमाबाई, स्वर्णकुमारी देवी, सिस्टर निवेदिता, सरोजिनी नायडू, एनी बेसेंट, कमला नेहरू, रोकैया सखावत हुसेन, डॉ. मुथु लक्ष्मी रेड्डी दीदी सुब्बुलक्ष्मी अरुणा आसफ अली, कमला देवी, विजय लक्ष्मी पंडित आदि। भीमराव अंबेडकर द्वारा महिलाओं के उत्थान के लिए अथक प्रयास किए गए और उनका मानना था कि किसी भी समाज की उन्नति का मापदंड पुरुष नहीं है स्त्रियाँ होती हैं। उन्होंने 28 जुलाई 1928 को मुंबई विधान परिषद में कारखानों व अन्य स्थानों पर मजदूर महिलाओं को प्रसूति अवकाश सुविधा प्रदान करने के बिल पर सहमति जताई। 1928 में साइमन कमीशन के समक्ष उन्होंने 21 वर्ष के ऊपर के सभी नागरिकों को (चाहे वह खी हो अथवा पुरुष मतदान के अधिकार दिए जाने की वकालत की। उन्होंने संविधान के माध्यम से कई प्रावधानों व कानूनों को पारित किया जो महिलाओं के प्रति समतापूर्ण दृष्टि का प्रतिनिधित्व करते हैं। पिछली इकाई में प्रावधानों व कानूनों पर चर्चा की जा चुकी है अतः यहाँ पुनः चर्चा करना उचित नहीं होगा। महात्मा गांधी द्वारा सती प्रथा बाल विवाह, पर्दा प्रथा, दहेज प्रथा, छुआछूत व विधवाओं के शोषण का पुरजोर विरोध किया गया। उन्होंने सदैव महिला मुक्ति और महिला विकास को महत्व दिया है। गांधी जी ने महिलाओं की भागीदारी से अनेक आंदोलनों को संपन्न कियायथा- नमक आंदोलन अस्पृश्यता •विरोधी आंदोलन तथा किसान एवं श्रमिक आंदोलन महिलाओं की जागृति के संबंध में गांधी जी द्वारा महत्वपूर्ण काम किए गए
•तीसरी नारीवादी लहर
इसके आरंभ को तेलंगाना में हुए महिला संघर्ष से संदर्भित किया जा सकता है। वहाँ 948 में महिलाओं ने मार-पीट, जमीदारों, निजामों आदि द्वारा किए जाने वाले उत्पीड़न का आक्रामक विरोध किया। इस आंदोलन में भागीदार महिलाओं में कामरेड स्वराज्य अखला कमाला देवी, जुमालुन्निसा बेगम, इलमा, चकली, सरोजिनी, प्रमिला आदि प्रमुख हैं। इनके द्वारा कुछ महिला संगठनों की स्थापना भी की गई, यथा- आंध्र महिला सभा आंध्र युवती मंडल और महिला संघमा 1950 के दशक में चलाए गए भूदान आंदोलन में भी बड़ी संख्या में महिलाओं की भागीदारी देखी जा सकती है। 970 में महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में मूल्यवृद्धि के विरोध में चलाए गए आदोलन में यूनाइटेड विमेन्स एंटी प्राइस राइज फ्रंटा की स्थापना की गई। इस आंदोलन में थाली और बेलन का प्रयोग घोषणा चित्र के रूप में किया गया। इस विरोध में हजारों की संख्या में गृहणियाँ सम्मिलित हुई 1975 में मार्क्सवादी लेनिनवादी समूह 'स्त्री जागृति समिति अथवा स्वचेतन नारीवादियों द्वारा मुंबई में अन्नपूर्णा महिला मंडल की स्थापना की गई। इसका मुख्य उद्देश्य गृहणियों की सुरक्षा व्यवस्था करना था। अखिल भारतीय जनवादी महिला संगठन (AIDWA) महिला केंद्रित संगठन है और यह जनतंत्र समानता और महिलाओं के उद्धार की दिशा में काम करता है। यह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की महिला शाखा है। राष्ट्रीय स्तर पर इस संगठन को 1981 में स्थापित किया गया। यह संगठन स्त्री शिक्षा रोजगार महिलाओं के अधिकार आदि के लिए काम करता है और साथ ही बाल अधिकार, जातिवाद, सांप्रदायिकता व आपदा सहायता के कार्यों में भी यह महत्वपूर्ण भूमिका वहन करता है। इसके क्षेत्रीय संगठनों में पश्चिम बंगाल गणतांत्रिक महिला समिति त्रिपुरा में गणतांत्रिक महिला समिति और महाराष्ट्र में जनवादी महिला संगठन प्रमुख हैं।
माओबादियों द्वारा 1986 में आदिवासी महिला संगठन की स्थापना की गई और इसकी शाखा क्रांतिकारी आदिवासी महिला संगठन है जो भारत में प्रतिबंधित है। यह संगठन भारत के सर्वोच्च पाँच संगठनों में से एक है और इसके पंजीकृत सदस्यों की संख्या90,000 के आस-पास है। इस संगठन का प्रयोजन बलात विवाह, महिलाओं के अपहरण बहुपत्नीत्व आदि जैसे गंभीर मुद्दों का विरोध करना है। 1975 के बाद से भारत में अनेक महिला संगठन बने जिनका मुख्य उद्देश्य महिला के उत्पीड़न के विरुद्ध उठाना था और उन संगठनों ने शिक्षा के क्षेत्र में परिवर्तन करके महिलाओं की स्थिति में सुधार हेतु सरकार 23 स्वतंत्र भारत के प्रमुख श्री आंदोलन भारत में नारीवादी आंदोलनों के इतिहास में उतनी स्पष्टता परिलक्षित नहीं होती है जितनी कि स्वतंत्र भारत में हुए नारीवादी आंदोलनों में दिखती है। ये आंदोलन महिला केंद्रित थे और उन्होंने महिलाओं के विरुद्ध हो रहे शोषण के विरोध में खुले तौर पर आवाज बुलंद की। यहाँ कुछ प्रमुख आंदोलनों का विवरण संक्षेप में प्रस्तुत किया जा रहा है.
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