स्त्रियों की प्रस्थिति में सुधार हेतु किए गए प्रमुख प्रयास - Major efforts made to improve the status of women
स्त्रियों की प्रस्थिति में सुधार हेतु किए गए प्रमुख प्रयास - Major efforts made to improve the status of women
19 वीं शताब्दी से ही स्त्रियों की स्थिति में सुधार हेतु प्रयास किए जाने लगे या महिलाओं को लेकर किए जाने वाले भेदभावपूर्ण नजरिए में बदलाव को आगे भी महत्व दिया गया। इन सुधारों को मूल रूप से तीन भागों में वर्गीकृत करके देखा जा सकता है
1. समाज सुधारकों द्वारा किए गए प्रयास स्त्रियों की स्थिति में सुधार का सर्वप्रथम प्रयास
राजाराम मोहन राय द्वारा किया गया। इनके द्वारा 1828 में ब्रह्म समाज की स्थापना की गई और इनके प्रयास के कारण ही 1829 में सती प्रथा उन्मूलन कानून की व्यवस्था की गई। इनके द्वारा बाल विवाह के निषेध और विधवा पुनर्विवाह के प्रवलन के लिए बहुत प्रयास किए गए। स्वामी दयानंद सरस्वती ने हिंदू समाज का वैदिक संस्कृति की ओर लौटने का आह्वान किया। इन्होंने बाल विवाह पर रोक की शिक्षा को बढ़ावा देना और पर्दा प्रथा को समाप्त करने की दिशा में उल्लेखनीय प्रवास किए। ईश्वरचंद्र विद्यासागर द्वारा बहुपत्नी विवाह और विधवा पुनर्विवाह निषेध की कटु आलोचना की और उनके प्रयासों के परिणामस्वरूप सन 1856 में विधवा पुनर्विवाह अधिनियम को नियोजित किया गया। इन्होंने की शिक्षा को भी महत्व दिया और कहा कि महिलाओं की जागृति के लिए आवश्यक है कि वे शिक्षित हो केशवचंद्र सेन के प्रयत्नों के फलस्वरूप सन 1872 में विशेष विवाह अधिनियम को क्रियान्वित किया गया और इसके द्वारा विधवा पुनर्विवाह और अंतर्जातीय विवाह को मान्यता प्रदान की गई। साथ ही इसके द्वारा एक विवाह को भी अनिवार्य स्वरूप प्रदान किया गया। इस शताब्दी के मध्य में श्री शिक्षा को बढ़ावा दिए जाने के रूप में कई प्राथमिक स्कूलों की स्थापना की गई और सन 1902 में विभिन्न शिक्षण संस्थानों में लड़कियों की संख्या 2,56,000 हो गई। कई स्त्रियों शिक्षा के कारण जागरूक हुई और नौकरियों में शामिल हो गई। इसी दौरान कई महिलाएं भी आगे आई और महिलाओं के हितों को लेकर आवाज बुलंद की यथा प. रमाबाई, मैडम कामा तोरुदत्त, स्वर्णकुमारी देवी आदि। इनके अलावा महात्मा गांधी ने स्त्रियों को राष्ट्रीय आंदोलन में भागीदारी हेतु प्रेरित किया और उन्हें स्वयं की शक्ति को पहचानने का मौका दिया जिससे वे प्रगति के मार्ग पर उन्मुख हुई। उन्होंने बाल विवाह और कुलीन विवाह का विरोध किया तथा विधवा पुनर्विवाह और अंतर्जातीय विवाह का पुरजोर समर्थन किया।
2. महिला संगठनों द्वारा किए गए प्रयास
20 वीं शताब्दी की शुरुआत में ही स्त्रियों को उचित स्थान दिलाने के प्रयोजन से सी आंदोलन का प्रादुर्भाव होता है। एनी बेसेंट मारग्रेट नोबल व मारप्रेट कुशनस ऐसी पश्चिमी महिलाएँ थीं, जिन्होंने भारत में खी आंदोलन को मजबूत स्थिति पर काबिज होने के लिए उपयुक्त दशाएँ उपलब्ध कराई मद्रास 1917 में भारतीय महिला समिति की स्थापना की गई। अनेक महिला संगठनों के प्रयास के पश्चात अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की स्थापना की गई और पूना में सन 1927 में इसका पहला अधिवेशन आयोजित किया गया। इस संगठन ने की शिक्षा को विशेष महत्व दिया और इसके प्रचारप्रसार हेतु अनेक प्रयास किए। बाद में इसने बाल विवाह, बहुपत्नी विवाह, दहेज आदि प्रकार की कुप्रथाओं का विरोध किया और खियों के लिए पुरुषों के ही समान संपत्ति पर अधिकार व वयस्क मताधिकार की माँग की। इस संगठन के अतिरिक्त विश्वविद्यालय महिला संघ भारतीय ईसाई महिला मंडल अखिल भारतीय श्री शिक्षा संस्था कस्तूरबा गांधी स्मारक ट्रस्ट आदि संगठन भी स्थापित किए गए, जिन्होंने महिलाओं पर लगे निषेध और असमानता के व्यवहार का विरोध किया तथा उनके लिए समतापूर्ण समाज की व्यवस्था करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किए।
3. संवैधानिक प्रयास
स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी समस्या तत्कालीन परिवर्तनशील समाज को सुव्यवस्थित रखना था जिसके कारण संविधान में समाज की लगभग सभी समस्याओं को शामिल किया गया। इन समस्याओं में महिला समाज की समस्या भी शामिल थी। इस कारण से संविधान में न केवल उनको विशेषाधिकार प्रदान किए गए अपितु राज्य के नीति-निदेशक तत्वा को भी इसे सम्मिलित किया गया। खियों की प्रमुख समस्याओं के उन्मूलन अनुच्छेदों को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है. से संबंधित कुछ
• अनुच्छेद 14 में खियों को विधि के समक्ष समानता' और विधियों का समान संरक्षण दिया गया है।
• अनुच्छेद 15 (1) के माध्यम से धर्म, जाति, जन्म स्थान अथवा लिंग आधारित भेदभाव पर निषेध लगाया गया है।
• अनुच्छेद 15 (3) में खियों की स्थिति में सुधार हेतु विशेष उपबंधों की व्यवस्था की गई। • अनुच्छेद 16 (1) के माध्यम से लिंग आधारित भेदभाव को सरकारी नियोजनों में प्रतिबंधित रखने का प्रावधान किया गया है।
• अनुच्छेद 19 के माध्यम से स्त्रियों को समान रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करने का प्रावधान रखा गया।
• अनुच्छेद 21 स्त्रियों के प्राण व दैहिक स्वाधीनता से वंचित न रखे जाने से संबंधित है।
• अनुच्छेद 23 में मानव तस्करी, बलात श्रम के उन्मूलन संबंधी प्रावधान बनाए गए हैं।
• अनुच्छेद 39 में स्त्रियों को समान रूप से आजीविका के साधन उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया है।
• अनुच्छेद 39 (घ) स्त्री कामगारों के स्वास्थ्य के दुरुपयोग को रोकने से संबंधित है।
• अनुच्छेद 39 (इ) के माध्यम से स्त्री कामगारों को दिए गए कार्य का उनकी क्षमता के अनुरूप होने संबंधी प्रावधान किए गए हैं।
• अनुच्छेद 40 में 73 वे और 74 वें संशोधन के पश्चात पंचायती राज व्यवस्थाओं में स्त्रियों को 33 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था करने का प्रावधान है। • अनुच्छेद 42 में स्त्रियों के लिए प्रसूति संबंधी मदद के प्रबंध किए गए हैं।
• अनुच्छेद 44 में समान आचार संहिता के कानून को शामिल किया गया है। • अनुच्छेद 47 खियों के लिए उचित पोषाहार, जीवन स्तर व लोक स्वास्थ्य में सुधार के उपबंध से संबंधित है।
• अनुच्छेद 51 में इस बात पर जोर दिया गया है कि प्रत्येक नागरिक का यह मौलिक कर्तव्य होना चाहिए कि वह उन प्रथाओं, परंपराओं को त्याग द्वेजी स्त्रियों के सम्मान को बाधित करें।
• अनुच्छेद 51 (क) सभी के मौलिक कर्तव्यों से संबंधित है।
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय अनुच्छेदों के अलावा कुछ कानूनों की भी व्यवस्था की गई जो महिलाओं को उनके अधिकार दिला सके और उनके प्रति भेदभावपूर्ण व्यवहार को प्रतिबंधित कर सकें। कुछ प्रमुख प्रावधान निम्नानुसार है।
• हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के माध्यम से स्त्रियों को उत्तराधिकार संबंधी अधिकार प्रदान किए गए।
• हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 में स्त्रियों को विवाह के क्षेत्र में समानता के अधिकार प्रदान किया गया।
• हिंदू अवयस्कता और संरक्षण अधिनियम 1956 में बच्चों के संरक्षण में माता को अधिकार प्रदान किया गया है।
● प्रसूति सुविधा अधिनियम 1961 में किसी भी संस्थान में स्त्री को 80 दिन काम कर
लेने के पश्चात प्रसव अथवा गर्भपात हेतु निर्धारित अवकाश व अन्य चिकित्सीय सुविधाएँ उपलब्ध कराने का प्रावधान शामिल किया गया है।
● दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 में दहेज और घरेलू उत्पीड़न पर प्रतिबंध लगाया गया है।
• बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 1976 अवयस्क बालक व बालिकाओं के वैवाहिक निषेध से संबंधित है।
• समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 के माध्यम से स्त्रियों को पुरुषों के समान ही वेतन दिए जाने का प्रावधान बनाया गया है। एक निर्णय में सर्वाच न्यायलय (SC) ने कहा fequal pay for equal work is not fundamental right but a Constitutional goal.
● वेश्यावृत्ति निवारण अधिनियम, 1986 में स्त्रियों से वेश्यावृत्ति कराने वालों के विरुद्ध दंडात्मक कार्यवाई करने का प्रावधान है।
• श्री अशिष्ट निरूपण निषेध अधिनियम, 1986 में स्थियों के सम्मान को ठेस पहुँचाने वाले विज्ञापनों व अन्य प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगाया गया है।
● सती निषेध अधिनियम, 1987 विधवा स्त्री के सती निषेध से संबंधित है।
● प्रसव और निदान तकनीक, 1994 में भ्रूण के लिंग की चिकित्सीय जाँच पर प्रतिबंध लगाया गया।
बागान श्रम अधिनियम, 1951 के माध्यम से स्त्री कामगारों को सतानों को दूध पिलाने हेतु अवकाश देने का प्रावधान कियागया है।
• घरेलू हिंसा संरक्षण अधिनियम 2006 में शारीरिक हिंसा आर्थिक हिंसा यौनिक हिंसा मौखिक हिंसा को घरेलू हिंसा के रूप में विश्लेषित किया गया है और इसपर निषेध लगाया गया है।
सरकार की विभिन्न योजनाओं द्वारा भी स्वीसशक्तिकरण के प्रयास हुए है। गैर सरकारी संगठनों ने भी उल्लेखनीय पहल की है। पंचायत स्तर पर सीटों को आरक्षित कर कई राज्यों में आधा प्रतिनिधित्व दिया गया है। सम्पत्ति में महिलाओं को समान अधिकार दिया गया।
स्त्रियाँ समाज के आधे हिस्से का प्रतिनिधित्व करती है और यदि उनकी स्थिति पर विचार किया जाए, तो सदैव से उन्हें दोयम दर्जे की मान्यता दी गई है तथा उनके साथ भेदभाव किया गया है। इस इकाई में स्त्रियों की ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में स्थिति पर विवेचन प्रस्तुत किया गया है जिसमें वैदिक काल, उत्तर- वैदिक काल, धर्मशास्त्रीय काल, मध्य काल और ब्रिटिश काल शामिल है। साथ ही स्वतंत्रता से पूर्व के भारत में उनकी हीन दशा के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारणों के बारे में बांध कराने का प्रयास किया गया है। स्त्रियों की प्रमुख समस्याओं पर भी प्रकाश डाला गया है। इस इकाई के अंत में क्षियों की स्थिति में घुार हेतु किए गए प्रमुख प्रयासों के बारे में भी वर्णन प्रस्तुत किया गया है।
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