राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग - National Commission for Scheduled Tribes

राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग - National Commission for Scheduled Tribes

अनुसूचित जनजाति के लिए अलग आयोग 1990 के 65वें संविधान संशोधन अधिनियम के रा अनुसूचित जातियाँ एवं जनजातियों के लिए। 992 में राष्ट्रीय जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग की स्थापना की गई। संविधान के अनुच्छेद 338 के द्वारा इस आयोग की स्थापना अनुसूचित जाति जनजाति को संविधान या अन्य विधियों के अंतर्गत संरक्षण प्रदान करने के उद्देश्य सेकी गई है। भौगोलिक सांस्कृतिक रूप से अनुसूचित जनजातियाँ अनुसूचित जातियों से भिन्न है तथा उनकी समस्याएँ भी अनुसूचित जातियों में भिन्न हैं। 1999 में अनुसूचित जनजातियों के कल्याण एवं विकास के कार्यों को गति देने के लिए एक नए मंत्रालय की स्थापना की गई। यह महसूस किया गया कि अनुसूचित जनजातियों से संबंधित सभी योजनाओं में समन्वय स्थापित करने के लिए जनजातीय मंत्रालय का होना आवश्यक है। चूंकि सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के लिए इस भूमिका को निभाना प्रशानिक दृष्टि से संभव नहीं था।

इसलिए अनुसूचित जनजातियों के हितोंकी अधिक प्रभावी तरीके से रक्षा के लिए यह प्रस्ताव रखा गया कि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग एवं जनजाति आयोग का विभाजन कर दिया जाए तथा दोनों के लिए पृथक-पृथक आयोगों की स्थापना की जाए इसकी स्थापना अंततः 2003 के 89वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा की गई इसके लिए संविधान के अनुच्छेद में संशोधन किया गया तथा उसमें एक नया अनुच्छेद 338 के जोड़ा गया और वर्ष 2004 से राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग अस्तित्व में आया। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की तरह राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग भी एक संवैधानिक निकाय है। इस आयो में एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष एवं तीन अन्य सदस्य हैं। वे राष्ट्रपति के आदेश द्वारा नियुक्त किए जाते हैं। उनके सेवा शर्तें एवं कार्यकाल भी राष्ट्रपति द्वारा ही निर्धारित किए जाते है।