पंचायत राज - Panchayat Raj
पंचायत राज - Panchayat Raj
पंचायत राज यह सत्ता के विकेंद्रीकरण और विकास संबंधी गतिविधियों में जनता की सक्रिय भागीदारी का एक महत्वपूर्ण व्यवस्था है। 1957 में बलवंतराय मेहता की अध्यक्षता में गठित सामुदायिक विकास तथा राष्ट्रीय विस्तार सेवाओं पर अध्ययन समिति ने सामुदायिक विकास कार्यक्रमों में लोगों की भागीदारी नहीं होने पर चिंता जताई थी। उस समिति ने पंचायत राज की तीन स्तरीय जिसमें जिला स्तर ( जिला परिषद ), माध्यमिक स्तर (खंड समिति), निचला स्तर (ग्राम पंचायत) व्यवस्था की सिफारिश की थी, जिसके उद्देश्य थे.
1) लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण
2) नियोजित कार्यक्रमों में स्थानीय भागीदारी
1959 तक सभी राज्य पंचायत अधिनियमों को पारित कर चुके थे। राजस्थान पंचायत राज व्यवस्था को 1959 में अपनाने वाला पहला राज्य बना और आंध्र प्रदेश दूसरे राज्य बना। 1960 के दशक के मध्य तक देश के सभी हिस्सों में पंचायतों का गठन हो चुका था। उस समय तक2, 17,300 ग्राम पंचायतें अस्तित्व में आ चुकी थी। पंचायती राज संस्था को विकास प्रक्रिया में लोगों की भागीदारी करवाने के लिए और मूल्यांकन कर उसे सुधारने के लिए समय-समय पर अध्ययन समितियों का गठन किए गए वह निम्नलिखित है:
अशोक मेहता समिति
1977 में पंचायती राज संस्थाओं की कार्यप्रणाली की समीक्षा के लिए अशोक मेहता की अध्यक्षता में एक अध्ययन समिति नियुक्त की गई थी। इस समिति ने पंचायत राज के असफल होने के कारणों को बताया। इस समिति की सर्वाधिक महत्वपूर्ण सिफ़ारिश दो स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था के विषय में दी थी, जो जिला स्तर पर जिला परिषद की स्थापना विकेटकरण के प्रथम बिंदु के रूप में की जानी थी। समिति ने मंडल पंचायतों के गठन की भी सिफारिश की थी जिसमें मंडल को गायों के समूह के रूप में देखा गया था जिसे केंद्र बिंदुओं को विकसित करने के क्रम में व्यवस्था के साथ आवश्यक संपर्क बनाने थे। इसे ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच संपर्क सूत्र बनाने थे। जी. वी. के. राव समिति 1985 में ग्राम विकास के प्रशासनिक प्रबंधों और पंचायत संस्थाओं की भूमिका तथा प्रशासनिक व्यवस्था के साथ उनके संबंधों की पड़ताल करने के लिए समिति का गठन किया गया था जिसने निम्नलिखित सिफारिश दी थी.
जिला परिषदों को मजबूत किया जाए -
> जिला स्तर पर अनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली उप समितियां हो
> योजना संबंधी कुछ कार्योंको जिला स्तर पर स्थानांतरित किया जा सकता है स्थानीय एजेंसी के चुनाव नियमित रूप से हो.
> एल. एम. सिंघवी समिति 1986 में इस समिति का गठन किया गया था। इस समिति ने ग्राम सभा को आधारभूमि माना था। इस समिति की प्रमुख सिफारिश निम्नलिखित हैं
> स्थानीय स्वायत्त शासन को संवैधानिक मान्यता दी जाए
> पंचायत स्तर के चुनाव नियमित रूप से और अविलंब कराए जाएं
> पंचायती राज की कार्यप्रणाली से संबंधित मामलों से निपटने हेतु प्रत्येक राज्य में पंचायती राज्य न्यायिक अधिकरण की स्थापना की जाए
> पंचायतों के प्रभावी ढंग से कार्य करने को सुनिश्चित करने हेतु पर्याप्त वित्तीय संसाधन हो
> रजीनीतिक दलों से जुड़े व्यक्तियों की भागीदारी को हतोत्साहित किया जाए
> न्याय पंचायत को मध्यस्थता और मुद्दों को निपटने का काम दिया जाए
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