आरक्षण के मुद्दे - reservation issues

आरक्षण के मुद्दे - reservation issues

आरक्षण को लेकर भारत में हाल ही में हुए दो आंदोलन प्रमुख हैं राजस्थान के गुर्जर समुदाय का आन्दोलन तथा गुजरात के पटेलों का आंदोलन। यह आंदोलन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इन आंदोलनों में आरक्षण की मांग को लेकर बढ़ी मात्रा में हिंसा भी हुई है। साल 2006 में भी गुर्जर आंदोलन सुर्ख़ियों में रहा था। 2007 में भी चले आंदोलन में 23 मार्च को पुलिस कार्रवाई में 26 लोग मारे गए थे।


2008 में भी ये आंदोलन फिर से चल पड़ा। दौसा से भसपुर तक पटरियों और सड़कों पर बैठे गुर्जरों ने रास्ता रोके रखा। पुलिस की कार्रवाई में उन दिनों 38 लोग मारे गए देश भर में उत्तर पश्चिमी भारत के कई राज्यों में गुर्जर समुदाय के करीब साढ़े पांच करोड़ लोग हैं इनमें 1 फीसदी यानी करीब 6 लाख लोग राजस्थान में है। जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में इन्हें अनुसूचित जनजाति का दर्जा हासिल है। जबकि राजस्थान में वो ओ.बी.सी में आते हैं और इस तौर पर उन्हें आरक्षण के फायदे मिलते हैं।


लेकिन गुर्जर समुदाय को लगता रहा है कि उन तक पिछड़ा वर्ग के लाभ पहुंच नहीं पा रहे। उनकी मा कि उन्हें आदिवासियों में शामिल किया जाए। हालांकि इस मार्ग के खिलाफ राज्य का मीणा समुदाय भी आंदोलन कर चुका है जिसे लगता है कि अगर गुर्जरों को आदिवासी मान लिया गया तो उनके हक मारे जाएंगे।


फिलहाल राजस्थान में गुर्जरी के आंदोलन को विश्राम मिला है। सरकार ने कानून बनाकर उन्हें विशेष पिछड़ा वर्ग के तौर पर 5 फीसदी आरक्षण देने का वादा किया है। केंद्र सरकार और आंदोलनकारियों की बातचीत के बाद ये फैसला हुआ है।


दूसरी ओर गुजरात के पटेल समुदाय ने गुर्जरों से प्रेरणा लेते हुए जुलाई015 में अपने पाटीदार आरक्षण आदोलन की शुरुआत की। पाटीदार समुदाय जिसे पटेल उपनाम से भी जाना जाता है के युवाओं ने जुलाई 2015 से सार्वजानिक आंदोलन शुरू कर दिया। इन्हें सामुदायिक सेवा में लगे संगठन सरदार पटेल सेवादल का समर्थन प्राप्त है। युवा सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण के लिए अपने समुदाय का नाम भी अन्य पिछड़ी जातियों में चाहते हैं। पटेल आरक्षण आंदोलन के दबाव के मद्देनत्र गुजरात की भाजपा सरकार ने सामान्य वर्ग में पाटीदारों सहित सभी आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण देने का एलान किया है। घोषणा के मुताबिक छह लाख रूपए से कम सालाना आय वाले परिवार आरक्षण के पात्र जागे महाराष्ट्र में भी मराठाओं को आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की बात चली है किंतु इस पर अमल होना बाकी है। ऐसे कई सारे मामले देखे जा रहे हैं जिनमें जातियां, समुदाय अपने उन्नति के लिए सामाजिक आर्थिक स्तर पर आरक्षण की मांग कर रही हैं।


इन सबके बावजूद भारत में समकालीन स्थितियों में विभिन्न सामाजिक मुद्दे उभसे हुए दिखते हैं। सूचना के बाद समस्याओं में और भी इजाफा हो गया है। अल जमीन और जंगल जैसे बुनियादी अधिकारों के साथ-साथ सायबर अधिकार की बात भी सामने आ रही है। स्वास्थ्य से संबंधित मुद्दे आगे आने लगे हैं, उसपर नीतियाँ बनाने की प्रक्रिया तथा संशोधन में तीव्रता आ रही हैं। स्वास्थ्य सुरक्षा के बाद आज स्वास्थ्य अधिकार की बात की जा रही है। बाल श्रम को नए संशोधनों के अंतर्गत फिर से व्याख्यायित किया जा रहा है।


इसके बावजूद राजनीति, जातिवाद, लिंगभेद नव-उदारवाद और सांप्रदायिकता जैसी गलत धारणाओं के कारण कुछ समूहों का लगातार शोषण आज भी जारी है। इसके संदर्भ में कई अधिनियमों की आलोचना भी हो रही है। वन अधिकार कानून तथा बाल श्रम अधिनियम में 2016 में किया गया संशोधन समाज का गलत दिशा में ले जा रहे हैं। ऐसे मामलों में सामाजिक कार्यकर्ता लोगों को जागरूक कर उन्हें सही राह दिखाने का कार्य कर सकता है तथा सही दिशा में जनमत जुटाने का कार्य भी उसे करना होगा