राष्ट्र राज्य की भूमिका - Role of Nation State

राष्ट्र राज्य की भूमिका - Role of Nation State

सोलहवीं शताब्दियों को यूरोप में पूर्व आधुनिक काल मान लिया गया है, क्योंकि इस काल इसकी शुरूआत उत्पादन की पूंजीवादी प्रक्रिया से हुई जिससे औद्योगिकरण को बल मिला। इसी पूंजीवादी औद्योगिकरण के कक्षण उत्पादन के सभी संबंध बदल गए उत्पादन के तरीके बदले और समाज में ऐसे नए वर्गों का उपहुआ जिसकी प्रतिष्ठा पुरातन और पारंपरिक सामाजिक आर्थिक जीवन से जुड़ी हुई नहीं थी। यही वर्ग आधुनिकता के प्रसार का माध्यम बना।


में राष्ट्र राज्यों की स्थापना हुई और एशिया, अफ्रीका व अमेरिका में उनका विस्तार हुआ। आधुनिकता का आरंभ आर्थिक क्षेत्र में औद्योगिक क्रांति और राजनैतिक क्षेत्र में फ्रांसीसी क्रांति से माना जाता है।


फ्रांसीसी क्रांति के कारण राजनीति में भागीदारी व्यापक हुई और शासन को प्रभावित करने की संभावनाओं का जन्म हुआ। इससे गणराज्य के विचार की उत्पत्ति हुई। लोकतंत्र का प्रथम अनुभव हुआ और समाजवाद व उदारबाद जैसा विचारधाराओं की नाब रखी गई। इसी से राष्ट्रराज्य का उदय हुआ जो भाषा, क्षेत्र और संस्कृति पर आधारित माना गया। वर्तमान में ज्यादातर राष्ट्र राज्यों ने लोकतंत्र प्रणाली को अपनाया है। राजनीति के क्षेत्र में समानांतर प्रक्रिया का लोकतंत्रीकरण कहा गया है। करणका अर्थ राज्य का केंद्रीकरण एवं राजनैतिक नेतृत्व के प्रति जवाबदेही प्रजा की परिभाषा यहाँ नागरिक के रूप में की गई। नागरिक राजनैतिक प्रणाली में भाग लेकर राज्य को मात्र सैद्धांतिक रूप में नियंत्रण करते है। इस प्रकार राज्य नागरिकों की आवश्यकता पूरी करने का अतिरिक्त भार अपने ऊपर ले लेता है।


यांति भारतीय संदर्भ में देखे तो ओपनिवेश में स्वतंत्रता के बाद यहाँ लोकतंत्र स्थापित हुआ। इस समय में भारतीय संविधान ने ज्यादातर औपनिवेशिक अधिनियमों को कुछ सुधार के साथ आगे बढ़ाया। कुछ अधिनियम जस के तस आगे बढ़ाए गए। नतीजतन उस समय के राष्ट्र निर्माणकर्ताओं ने जिस भारत के निर्माण के लिए यह सब कुछ किया था उसे स्थिरता प्रदान करने में वे नाकाम रखें परिणामतः युवा असंतोष जैसी चीजे सामने आने लगी स्वतंत्रता पूर्व समस्याओं ने नया रूप धारण कर लिया था। इससे निपटने के लिए शुरुआत में तो राष्ट्रराज्य की भूमिका कल्याणकारी राज्य की तरह थी किंतु बाद में इसमें काफी परिवर्तन आते गए और विचारधारात्मक परिवर्तनों के कारण सामाजिक नीतियों में भी परिवर्तन हुए, जिसका असर सामाजिक अधिनियमों पर भी पढ़ा। जैसे कि 1974 के पहले तक चालकों के प्रति राष्ट्र राज्य ज्यादा नहीं था, किंतु साठ के दशक के बाद की उपल-पुथल के बाद 1974 मे बाल नीति बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा। आग बालक बालिकाओं के बढ़ते शोषण के प्रति सामाजिक विधान के लिए 21वीं सदी तक यह देखनी पड़ी।


भारत को विविधता में एकता वाला देश माना जाता है जहां विभिन्न धर्म जाति समूह के लोग निवास करते हैं। ऐसे में उन सबको एक साथ बनाएं रखते हुए उनके अधिकारों का संरक्षण बड़ा जटिल कार्य है किंतु हम विवाह अधिनियम के संदर्भ देखते हैं किहिंदू विवाह अधिनियम, मुस्लिम विवाह अधिगम तथा क्रिश्चन विवाह अधिनियम के तहत उनके इस अधिकार का संरक्षण सरकार बखूबी बहन कर रही है। इससे हम समझ सकते हैं कि जिस तरह का चराष्ट्रराज्य का होगा उसी के आधार पर वहां सामाजिक अधिनयम का निर्माण भी होता है।