ग्राम विकास प्रशासनिक प्रणाली - Rural Development Administrative System

ग्राम विकास प्रशासनिक प्रणाली - Rural Development Administrative System

ग्राम विकास से जुड़ी नौकरशाही की वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था को बेहतर ढंग से समझे के लिए या आवश्यक है कि योजना युग से ही इसकी जड़ों का पता लगाया जा सकता है। भारत को उसकी वर्तमान प्रशासन व्यवस्था औपनिवेशिक शासकों से विरासत में प्राप्त हुई। इसी ढांचे को प्रमुख रूप से ग्राम विकास के कार्य और उसकी जिम्मेदारियां सौंपी गई है। वैसे समय समय पर इसमें कुछ संशोधन भी किए गए हैं। राजस्व और सामान्य प्रशासनिक संगठन और ढांचे को ग्राम विकास के कार्यों के लिए सक्रिय किया गया है।

1952 में सामुदायिक विकास कार्यक्रम की स्थापना के बाद से कई बदलाव भी हुए है। इस कार्यक्रम ने पहली बार बड़े पैमाने पर सीधे फील्ड के स्तर पर विकास प्रशासन गठित करने का प्रयास किया। इसके अनंर्गत आने वाली विभिन्न योजनाओं को लागू करने के लिए इसमें तकनीकी विशेषज्ञों की नियुक्तिनौर मानव शक्ति के प्रशिक्षण को सम्मिलित किया गया।

अधिक अन्न उत्पादन जांच समिति ने ही 1952 में प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में पहली बार ग्राम विकास के लिए एक एकीकृत संगठनात्मक ढांचे की आवश्यकता पर जोर दिया था। इस समिति ने राष्ट्र राज्य, ने जिला, खंड और गांव के विभिन्न स्तरों पर व्यवस्था का प्रारूप भी किया। इसी ने 100-200 गांवों को लेकर एक विकास खंड के रूप में तालुका की स्थापना की सिफारिश की थी, जिसे राजस्व प्रभागीय अधिकारी स्तर के खंड विकास अधिकारी के अधीन रहना था।

इस अधिकारी की सहायता के लिए चार तकनीकी अधिकारी (कृषि पशुपालन सहकारिता और इंजीनियरी प्रत्येक क्षेत्र से एकएक) और 5 से 10 गांवों पर एक के हिसाब से ग्राम स्तर के कार्यकर्ता भी होने थे। इस रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की गई थी कि जिला स्तर पर विकास संबंधी गतिविधियों को कलेक्टर के अधीन एकीकृत किया जाए और उसकी सहायता के लिए विशेषज्ञ अधिकारी हो। इसमें नीतियों के समन्वय और संयुक्त कार्रवाई को सुगम बनाने हेतु राज्य स्तर पर मुख्यमंत्री ही अध्यक्षता में मंत्रिमंडल समिति की तथा एक गैर सरकारी बोर्ड की भी सिफारिश की गई थी।


सामुदायिक विकास कार्यक्रम के क्रियान्वयन के समय संकल्पित प्रशासनिक व्यवस्था विशेष कार्यक्रम शुरू करने और ग्राम विकास कार्यक्रमों की कार्यनीति में परिवर्तन के बाद चौथी तथा पांचवी योजना की अवधि के दौरान जिला स्तर पर किए गए कुछ बदलावों के साथ व्यापक रूप से जारी रही है। ग्राम विकास की कार्यनीति में धीरे-धीरे क्षेत्र आधारित और पात्र विशेष आधारित विकास पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया गया है।