जनजातीय क्षेत्रों को सामाजिक-राजनीतिक स्वायत्तता - Socio-political autonomy to tribal areas
जनजातीय क्षेत्रों को सामाजिक-राजनीतिक स्वायत्तता - Socio-political autonomy to tribal areas
संविधान के अनुच्छेद 244 (2) एवं 275(1) से संबद्ध छठी अनुसूची में असम के जनजातीय क्षेत्रों को पर्याप्त सामाजिक सांस्कृतिक एवं राजनैतिक स्वायत्तता प्रदान की गई है। यह स्वतत्तता जिला एवं स्वायत्त क्षेत्रों को क्रमशः जिला परिषदों एवं क्षेत्रीय परिषदों के निर्माण के माध्यम प्राप्त है। ये परिषदें भूमि आवंटन चनों एवं नहरों के जल के प्रयोग झूम खेती के नियमन ग्राम अथवा नगर समितियों की स्थापना एवं उनकी शक्तियों, विवाह एवं अन्य सामाजिक रस्मों के संबंध में कानून बनाती है। परिषदें सामाजिक स्मों के अनुसार आल इंडिया सिविल एंड पैनल कोड में संशोधन करके न्याय व्यवस्था को भी संचालित करती हैं।
वे प्राइमरी विद्यालय स्थापित कर सकती है एवं भूमि लगन का निर्धारण औरउसका संग्रह करके तथा कर लगाकर अपने चनकोष में वृद्धि कर सकती है। परिषद खनिज उत्पादन के लिए लाइसेन्स भी जारी करती हैं। जिला परिषदें ऋण के लेनदेन द्वारा गैरूजनजातीय लोगों और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों को भी व्यवस्थित कर सकती है। भारत के जनजातीय लोगों के गांव अथवा गांवों के समूह में पारंपरिक परिषदें है। इसमें कुछ परिषदों की बैठकों की अध्यक्षता जनजातियों के निर्वाचित मुखिया करते हैं जबकि अन्य में वंशानुगत मुखिया समिति की बैठकों का संचालन करते हैं। नागालैंड में मान्यता प्राप्त ग्राम परिषदेप्रदेश परिषदें एवं जनजातीय परिषद हैं जिनके पास प्रशासन और विकास एवं प्रचलित कानूनों तथा उनके व्यवहार के उल्लंघन से संबंधित मामलों में व्यापक शक्तियाँ है।
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