तृतीय जन समलैंगिक - third mass gay

तृतीय जन समलैंगिक - third mass gay

समलैंगिक से तात्पर्य है, समलैंगिक इच्छा रखने वाले लोग या सेम सेक्स की इच्छा रखने वाले लोग यह जरूरी नहीं कि समलैंगिक इच्छा रखने वाले लोग अपनी पहचानों (जैसे- औरत, मर्द, दलित, हिंदू मुसलमान इत्यादि में बौनिकता से जुड़ी पहचान भी शामिल करें। जो लोग अपनी पहचानको यौनिकता से जोड़ते हैं जैसे गे लेस्बियन इत्यादि उनमें ज्यादातर ऐसे लोग हैं जिन्हें इस तरह की पहचान के बारे में जानकारी है। तृतीय पंथी समुदाय समाज का सबसे वंचित वर्ग माना जाता है।

तृतीय जन समलैंगिक - third mass gay

वर्तमान समय में विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों द्वारा अंतरराष्ट्रीय तथा राष्ट्रीय स्तर पर एल.जी.बी.टी. अधिकार या यौनिक अधिकारों पर काम किया जा रहा है। यह देखा जाता रहा है कि यौनिक अल्पसंख्यकों के साथ सरकार तथा लोगों द्वारा भेदभाव पूर्ण व्यवहार किया जा रहा है। ऐसे मामले भी प्रकाश में आए हैं जो गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनकी स्थिति को दर्शाते हैं।


सुप्रीम कोर्ट ने 11 दिसंबर 2013 को अपने एक फैसले में देश में होमोसेक्शुअलिटी को गैरकानूनी मानते हुए इसे संक्शन 377 के तहत अपराध करार दिया था। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को दरकिनार कर दिया था जिसमें सेक्शन 377 को अपराध की श्रेणी से हटाया गया था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से भारत के एलजीबीटी समुदाय के लोगों को करारा झटका लगा तृतीय जनों के प्रति सरकारी रवैया कुछ इस प्रकार है. 

तृतीय जन समलैंगिक - third mass gay

भारतीय दंड संहिता धारा 377 (अप्राकृतिक अपराध) जो भी कोई स्वेच्छा से किसी पुरुष महिला या पशु के साथ प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध कामुक संभोग करता है उसे आजीवन कारावास या फिर 10 वर्षों तक बढ़ाई जा सकती है और जुर्माना भी हो सकता है।" धारा 377 की मुख्य बातें पारा यह स्पष्ट नहीं करती कि अप्राकृतिक यौन में क्या क्या शामिल हैं, न ही यह सहमति युक्त तथा जबरन यौन आचरण में कोई फर्क करती है।


• धारा के तहत यह स्पष्ट कहा गया है कि 'लिंग प्रवेश यौनिक संभोग को स्थापित करने के लिए पर्याप्त है। इस व्याख्या के कारण इसमें मुख गुदा भी शामिल हो जाता है।


• विषम-लगिक के संदर्भ में मुख व गुदा मैथुनशादी के अंतर्गत भी प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध है।


● पूरे भारतीय कानून में यौनिक भिन्नता को कहीं भी मान्यता नहीं मिली हुई है। • यह धारा भिन्नता पर एकरूपता थोपती है और इस तरह यह भिन्न यौनिकता का अपराधिकरण करती है।

तृतीय जन समलैंगिक - third mass gay

मानव होने के नाते प्रत्येक व्यक्ति का यह अधिकार है कि वह अपने क्षमताओं का विकास करते हुए सम्मान तथा आत्मनिर्णय के अधिकारों के आधार पर अपना जीवन-यापन कर सके। वर्तमान में भारत में एल.जी.बी.टी. के अधिकारों से संबंधित गैरसरकारी संगठनों का कार्य जोरों पर है। परिणामत भारत में तृतीय पंथी जन के अधिकारों से संबंधि मुद्दे ने एक नए आंदोलन का रूप धारण किया है।