जनजातीय धार्मिक विश्वास - Tribal Religious Beliefs

जनजातीय धार्मिक विश्वास - Tribal Religious Beliefs

जनजातीय भारत धार्मिक विश्वासों तथा व्यवहारों का रंगीन परिदृश्य प्रस्तुत करता है जो उनकी सांस्कृतिकपारिस्थितिक दशाओं के साथ उनके समायोजन कि अभिव्यक्ति है। 1940 के दशक के अंतिम वर्षों तक भारत में जनजाति धर्मों को विभिन्न जनगणना रिपोर्टों तथा साहित्यों में जीववाद की संज्ञा दी गई थी। प्रत्येक जनजाति समुदाय के अपने धार्मिक विश्वास होते हैं। वह देवी शक्तियाँ, भूत-प्रेतों एवं आत्माओं कअस्तित्व पर विश्वास रखते हैं। आत्माओं का आशीर्वाद पाने के लिए कई अनुष्ठान किए होते हैं क्योंकि आधिदैविक शक्तियों एवं आत्मा में विश्वास जनजातीय धर्म का एक महत्वपूर्ण पहलू है। अतः इसे जहात्मवाद कहते हैं। प्रकृति की पूजा करना जनजातियों के धर्म का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू है। संभाल मुंडा, होस एवं बिहार के बिरहोर सूरी को सिंग बोगस कहते हैं जिसका अर्थ है पार्वशक्तिमान ईश्वर गारो सूर्य चाँद एवं सितारों को स्वर्ग में रहने वाली आत्माएँ मानते हैं। केरल के कणिक्कर भी सूर्य को भगवान के रूप में पूजते हैं। इसके लिए वह अपनी झोपड़ियों के सामने एक दिया जला कर रखते हैं और कुछ फल एवं चावल भी साथ में रखते हैं।


जनजातीय लोग मानते है कि बादल कि गड़गड़ाहट बिजली का चमकना, बाद वर्षा इत्यादि स आधिदैविक शक्तियों के द्वारा लाए जाते हैं। इसी तरह वह यह भी मानते है कि प्रत्येक वस्तुजैसे वन, नदी, पर्वत इत्यादि की अपनी एक संरक्षक आत्मा होती है। मृत्यु के पश्चात भी आत्मा की वजह से मनुष्य का अस्तित्व बना रहता है अथवा यह संतान के रूप में पुनः जन्म लेते हैं। वह मानते हैं कि मृत पूर्वजों की आत्मा में शक्ति होती है, जो उनका भाग्य निर्धारित करती है। रोगों को आत्माओं का दुष्प्रभाव माना जाता है। जनजातीय लोगों की मानते हैं कि उपयुक्त धार्मिक अनुष्ठानों के द्वारा रोगों से छुटकारा मिल सकता है। साथ ही जनजातियों में औरतों को कुछ चीजें छूने की अनुमति नहीं होती और पवित्र स्थलों में उनका प्रवेश वर्जित होता है। इस पवित्र विश्वास को 'टेबू' कहते हैं। उनकी मान्यता है कि टैबू का टूटना उनकी जाति पर कहर ला सकता है जैसे यात्रियों को हल ठूने की अनुमति नहीं होती। वह उस दालने का काम भी नहीं कर सकती नीलगिरी पर्वतों में स्त्रियों को ढेरी से संबंधित कई भी काम करने नहीं देते.


क्योंकि वह उत्पाद पवित्र माना जाता है। शमनवाद: विश्व भर के जनजतीय और गैर-जनजातीय ग्रामीण समाजों में शमनवाद अथवा शमन (ओझागिरी) व्यापक रूप में दिखाई देता है। शमनवाद के अर्तगत अंधविश्वास और झाडफेंक के बहुत से तरीके शामिल है, जो इस सिद्धांत पर आधारित हैं कि कोई रूड या आत्मा किसी अन्य जीवित व्यक्ति के शरीर में प्रवेश करके तथा उस पर हवी होकर उससे तरह-तरह के कृत्य और अभिचार कर सकती है। इस प्रकार की क्रिया करने वालो को शमन या ओझा कहलाते है। अनुयायी लोगों के विश्वास के अनुसार "शमन' या ओझा' लोगों के पास अति-मानुषी शक्तियाँ होती हैं जो शुभ और अशुभ दोनों प्रकार की होती हैं। अधिकांशतः उनका इस्तेमाल परोपकार के लिए किया जाता है। शमन या ओझा भूत बचार', 'शे या आत्मा" आदि से परामर्श करके बाधा शांति का उपाय बताता है। उपायों में हवन टोना टोटका, पशुपति आदि कोई भी अद्भुत कृत्य हो सकता है।