ग्राम विकास कार्यनीतियों के प्रकार - Types of Rural Development Strategies
ग्राम विकास कार्यनीतियों के प्रकार - Types of Rural Development Strategies
प्राप्ति के अलग-अलग कार्यनीतियां ग्राम विकास के उद्देश्य की प्राप्ति के लिए कृषि संबंधा उत्पादन की तननीकों और राज्य की नीति के अलग-अलग मिश्रण का महत्व देती है। कुछ संबंधित मुद्दों को समझने के लिए हम वर्गीकरण के उद्देश्य के लिए कृषि संबंधों को प्रमुख महत्व देते हुए निम्नलिखित ग्राम विका कार्यनीतियों की संक्षेप बात कर सकते हैं.
संसाधनों के एकत्रीकरण पर आधारित कार्यनीति
नियंत्रित पूंजीवादी परिप्रेक्ष्य पर आधारित कार्यनीति
श्रमिक कृषि परिप्रेक्ष्य पर आधारित कार्यनीति
अहस्तक्षेप पर आधारित या अनियंत्रित मुक्त बाजार पूंजीवादी परिप्रेक्ष्य पर आधारित कार्यनीति ग्रामीण भूमि का एकत्रीकरण को प्रथम योजना में अत्यधिक महत्व दिया गया है। भूमि का निजी स्वामित्व समाप्त कर दिया जाए, जिससे न केवल भूमि के स्वामित्व की विषमताएं समाप्त हो जाएगी अपितु भूमि के उपयोग को और अधिक उत्पादक बना कर किया जा सकेगा। अधिक उत्पादकता हासिल की जा सकती है, क्योंकि छोटे भूखंडों को जोड़कर बड़े पैमाने पर कृषि करने से कृषि उत्पादन में आर्थिक पैमाना लाया जा सकता है। बड़े स्तर पर खेती से उत्पादकता भी बढ़ती है। आधुनिक प्रौद्योगिकीय ट्रैक्टर और हार्वेस्टर के रूप में उपयोग की संभवना भी उत्पन्न होती है। इस कार्यनीति का पालन सोवियत संघ चीन और पूर्वी यूरोप के देशों ने काफ़ी सफलता के साथ किया। इन देशों ने इस योजना को प्रारंभ करके अपने उत्पादन में तीव्र वृद्धि की।
दूसरी कार्ययोजना में पूंजीवादी क्षेत्र और श्रमिक क्षेत्र एक साथ रहते है और राज्यसे सहायता और सुरक्षा प्राप्त करते हैं किसी भी बड़े स्तर के भूमि का पुनर्वितरण या भूमि की पुर्नसंरचना नहीं की जाती है। ऐसी आशा की जाती है कि जब तक गैर-कृषि क्षेत्र तीव्र गति से विकास करना नहीं प्रारंभ करता। तीव्र विकास के उद्देश्य का ध्यान पूंजीवादी वर्ग रखेगा और साथ में बेरोजगारी की समस्या का हल कृषि क्षेत्र करेगा, जब तक कि गैर-कृषि क्षेत्र तीव्र गति से विकास करना नहीं प्रारंभ करता। ग्राम विकास के इस पद्धति ने ग्रामीण क्षेत्रों में व्याप्त आधारभूत विषमताओं पर ध्यान न दे पाने के कारण से आलोचना की गई। ऐसा कहा गया कि सार्थक भूमि सुधार के बिना यह कार्यनीति सीमित रूप से सफल होगा क्योंकि इस कार्यनीति में ग्रामीण असमानताओं की उपेक्षा की गई है।
गांव के गणमान्य व्यक्ति भूमि के असमान्य वितरण पर नियंत्रण रखते है और उसमें परिवर्तन नहीं होने देते और दूसरी तरफ गरीबों के जीवन को बेहतर बनाने वाले बाहर से प्रदान किए गए संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा हथिया लेते हैं। किसान और कृषि के दृष्टिकोण पर आधारित कार्यनीति यह दावा करती है कि भूमि का ठीक से पुनर्वितरण और भूमि संबंधों को सुधारा जाना चाहिए। यह छोटी कृषक इकाइयों का अधिक समर्थन देने पर ध्यान रखती है, जिनसे यह आशा की जाती है कि यह विकास और रोजगार के दोनों उद्देश्यों का ध्यान रखेगाा सहकारी संस्थाओं विपणन सुविधाओं आदि को इस कार्यनीति में अत्यंत महत्व दिया जाता है।
द्वितीय और तृतीय कार्यनीतियों में वह विचार किया गया है कि राज्य ग्रामीण क्षेत्रों में गैर-कृषि आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने और सशक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा जिससे कृषि पर आवश्यकता से अधिक श्रमिकों का भार कम होगा और यह आगे के लिए उचित जीवनयापन के अवसर उत्पन्न करने का मार्ग प्रशस्त करेगा। इसके अतिरिक्त यह मान लिया जाता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में उपयुक्त आधारभूत सुविधाओं की समस्या पर राज्य ध्यान देगा और सामाजिक क्षेत्रनेसे कि स्वास्थ्य, शिक्षा आदि में भी निवेश करेगा।
चतुर्थ कार्यनीति के अनुसार संपन्न भूस्वामी कृषि उत्पादन में तीव्र वृद्धि के लिए बड़माने की अर्थव्यवस्था का लाभ उठाते हुए अग्रणी भूमिका निभाएंगे और धीरधार छोटी कृषि ईकाइयाँ लुप्त हो जाएंगी। यह सुझाव दिया गया है कि राज्य पूंजीवादी क्षेत्र के विस्तार में हस्तक्षेप नहीं करेगा और स्वामित्व की कोई सीमा नहीं होगी। इस क्षेत्र से यह आशा की जाती है कि यह गतिशीलता उपलब्ध कराएगा, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था और इसमें प्राप्त होने वाले लाभों में सुधार लाएगा और ये लाभ रोजगार और आय में वृद्धि के माध्यम से निम्न वर्गों तक पहुंचेगा। इस तरह की योजना में असमता और वितरणात्मक न्याय के मुद्दों को कोई मुद्दा नहीं माना जाता है। राज्य की एक सीमा तक ही भूमिका होती है, जो आधारभूत ढाँचागत सुविधाओं से संबंधित होती, लेकिन यहां भी इसे आवश्यक रूप से प्रमुख कर्ता के रूप में नहीं देखा जाता।
ऐसा इसलिए है क्योंकि यह न केवल अनेक विकास के मुद्दों की उपेक्षा करता है, बल्कि जहाँ तक विकास और उसके प्रसार का संबंध है इसके अधिक आशावाद की भी अवहेलना करता है। ग्रामीण विकास के किसी भी कार्यनीति का चयन कर सकते हैं लेकिन निम्नलिखित ग्राम विकास योजना के प्रमुख विषय केंद्रबिंदु होना चाहिए किसानों के लिए कृषि अनुसंधान विस्तार, ग्रामीण शिक्षा और प्रशिक्षण कार्यक्रम संस्था निर्माण कार्यकलापों का एक भाग हैं,
ii. आधारभूत ढाँचागत सुविधाओं के निर्माण की गतिविधिजो सिंचाई सुविधा में वृद्धि यातायात के साधन, दूर संचार और स्वास्थ्य सुविधाओं से संबंधित है।
III कृषि की लागतों और औजारों के वितरण के लिए विपणन, कृषि उत्पादों का मूल्य और कृषि आय की कर निर्धारण से संबंधित नीतियाँ।
बाजार अर्थव्यवस्था से संबंधित अनुभव पर आधारित भूवितरण का प्रस्ताव कृषि क्षेत्र की वृद्धि सुनिश्चित करने वाली योजनाओं के प्रकारों का भी वर्गीकरण एक रूपात्मक और द्वि-रूपात्मक योजनाओं में किया जा सकता है। एकरूपात्मक योजना वह है, जिसमें भू-स्वामित्व का समान वितरण होता है। इस योजना का जापान, ताइवान और कोरिया में बहुत सफलता से पालन हुआ। हिरूपात्मक योजना कृषि क्षेत्र में वृद्धि के लिए कृषि उत्पादन में वृद्धि का प्रयास और ग्रामीण क्षेत्रों में आय और भूमि के विषम वितरण में कठोरता से परिवर्तन के उपाय के बिना ही करती है। इस योजना के लैटिन अमेरिका के कई देश उदाहरण के रूप में समझे जा सकते हैं।
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