वृद्ध कल्याण तथा सेवाएं - Aged Welfare & Services

वृद्ध कल्याण तथा सेवाएं - Aged Welfare & Services

वृद्ध की सेवा करना भारतीय परिदृश्य में कोई नई बात नहीं है। वैसे भी विश्वभर के तमाम धर्मों में वृद्ध सेवा मानवीय कर्तव्य का महत्वपूर्ण पक्ष माना गया है। हिंदू धर्म के साहित्य में उल्लेख मिलता है कि वृद्धों के लिए आश्रम प्रणाली में वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम के अंतर्गत जीवन यापन करने पर बल दिया गया था। तथा विभिन्न धर्म ग्रंथों में जैसे मनुस्मृति शुक्रनीति और महाभारत में वृद्धों की भोजन और सेवा आदि से संबंधित अनेक रूपों में विभिन्न प्रकार से सेवा करने के निर्देश दिए गए हैं। मुस्लिम धर्म में वृद्धों की आवश्यकता पूर्ति धर्म निर्देशित उपकार कार्यों के अंतर्गत जकात और खैरात के रूपमें की जाती है।

औद्योगिक युग ने समाजों को समृद्धि दी और समृद्धि ने व्यक्ति को अनेक आलंबन प्रदान कर दीर्घ जीवन दिया। स्वास्थ्य शिक्षा और मानसिक संतुलन के अनेक साधनों का विकास और प्रसार होने से व्यक्ति के जीवन की दीर्घकालिक संभावना बढ़ी है और समाज में वृद्धवस्था के व्यक्तियों की संख्या भी बढ़ी है फलतः उनके कल्याण के कार्यों की व्यापकता तथा भौतिकता में भी विकास और प्रसार हुआ है। इसके अतिरिक्त वृद्ध एवं उनके लिए सेवाकार्यों की मान्यता में बढ़ोतरी हुई है और इसके कारण भी वृद्ध कल्याण की अनेक सेवाएं संचालित एवं बढ़ई जा रही है। आधुनिकीकरण के दौर में पुराने मूल्य ढहते नज़र आते हैं, जिसमें वृद्धों के कल्याण की बात सामने आने लगती है। भारत में वृद्धों की एक बड़ी संख्या निवास करती है और उनके कल्याण पर समुचित ध्यान देने की आवश्यकता है। वृद्ध और जयजर्जरित व्यक्तियों की संगठित या संस्थागत सहायता के कार्य की शुरूआत 1840 से मानी जा सकती हैं। इस साल बैंगलोर में 'दि फ्रेंड इन नीड' नामक संस्था खुली जिसने इस श्रेणी के व्यक्तियों की देखभाल का कार्य किया। इसके बाद पूना में 1865 में डेविड सैसून इनफर्म एसाबलम खुला। फिर 1882 में कलकत्ता में एक ऐसी ही संस्था खुली जिसने अनेक राज्यों तथा नगरों में अपनी शाखाएँ खोली फिर और भी अनेक स्वयंसेवी संस्थाओं का आस्तित्व सामने आया ॥

951 तक ऐसी कुल नौं संस्थाएँ थी। राष्ट्रीय स्तर पर सन 1961 तक इस क्षेत्र में कोई प्रयास नहीं किया गया। कई राज्य सरकारों ने वृद्ध पेंशन योजनाएं चलाई जिनमें कि वृद्धों को आजीवन या कुछ वर्षों तक के लिए आर्थिक सहायता दी जाती है। दूसरी योजना अवधि में दिल्ली देहरादून कलकत्ता तथा पूना में कुल चार और महत्वपूर्ण इसी क्षेत्र के गृह स्थापित हुए। कई स्थानीय सरकारों ने भी वृद्धों की सहायता के कार्यक्रम चलाए। वृद्धों के मनोरंजन स्वास्थ्य, आवास, भोजन तथा रखरखाव के तमाम कार्यों द्वारा भारत में इनकी ओर ध्यान दिया गया। इसके बावजूद 60 के दशक में देश के विभिन्न राज्यों में वृद्ध पेंशन योजनाएँ चलाई जाने लगी। इस समय में वृद्ध कल्याण इन समान्य प्रयासों से आगे नहीं बढ़ पाया। राष्ट्रीय वृद्धजन नीति- (1999)


सन् (1999) में पहली बार सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण मंत्रालय ने राष्ट्रीय वृद्धजन नीति का निर्माण किया और वृद्ध कल्याण कार्यों में तेजी आई। सन 1991 में भारत की वृद्ध जनसंख्या 57 करोड़ हो चुकी थी जो स्वतंत्रता के बाद 1951 में 2 करोड़ के आस-पास थी। इस जनसांख्यिकीय वृद्धि ने नीति निर्माताओं को आकर्षित कर लिया था। साथ ही 991 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा वृद्ध जनों के लिए संयुक्त राष्ट्र नीति अपनाई गई थी इसका प्रभाव भी भारत की इस नीति निर्माण में दिखता है। इस नीति का प्रमुख उद्देश्य बुजुर्गों की समस्याओं संबंधी मुद्दों को व्यापक रूप से समाधान किया जाना था। इस नीति में निम्नलिखित प्रावधान किया गया


भारत के संविधान में वृद्धजनों के कल्याण का प्रावधान है। राज्य के नीति निर्देशित तत्व (अनुच्छेद 41) के अनुसार राज्य अपनी आर्थिक क्षमता एवं विकास को ध्यान में रखते हुए वृद्धजनों हेतु सरकारी •सहायता का अधिकार सुनिश्चित करेंगे। इसके अतिरिक्त अन्य प्रावधान भी है जो राज्य को निर्देशित करते है कि वह अपने नागरिकों के जीवन में गुणात्मक सुधार लाएं। हमारे संविधा में समानता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है। इसके प्रावधान वृद्धों के लिए भी प्रभावी है और सामाजिक सुरक्षा का दायित्व राज्य एवं केंद्र सरकारों पर समान रूप से है। इस नीति के अंतर्गत मुख्य क्षेत्र निम्नलिखित हैं


● आर्थिक सुरक्षा


• स्वास्थ्य की देखभाल एवं पोषण


● शिक्षा


• कल्याण कार्य:-


 इसके अंतर्गत निसहाय वृद्धों की पहचान कर जो गरीब, विकलांग रोगी अथवा जटिल रोग से ग्रस्त है और जिन्हें परिवार का सहयोग भी प्राप्त नहीं होता है उन्हें प्राथमिकता के आधार पर कल्याणकारी सेवा देने का आश्वासन इस नीति में है। वृद्धाश्रमों का निर्माण, स्वैच्छिक और गैर-संस्थागत सेवाओं को प्रोत्साहन कल्याण कोष का निर्माण, आदि को शामिल किया गया।


• जीवन एवं संपत्ति की सुरक्षा।


इन प्रमुख क्षेत्रों के बावजूद अन्य कार्यक्षेत्र निम्नवत के पहचान पत्र जारी करना, यातायात में छूट, यातायात में आरक्षण, यातायात गाड़ियों में सुलभ प्रवेश और निर्गमन के लिए आवश्यक परिवर्तन आदि। 15 जून को राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस तथा वर्ष 2000 को राष्ट्रीय वृद्धजन वर्ष घोषित किया गया। इस नीति में वृद्धजन कल्याण के लिए गैरसरकारी संगठनों की आवश्यकता को महसूस किया गया। प्रसार माध्यमों के सहयोग और वृद्धजन के लिए अनुसंधान का क्षेत्र खोला गया।