अन्य पिछड़े वर्ग आरक्षण की पृष्ठभूमि - Background of Other Backward Classes Reservation

अन्य पिछड़े वर्ग आरक्षण की पृष्ठभूमि - Background of Other Backward Classes Reservation

परंपरागत व्यवसायों के आधार पर कुछ जातियों को हिंदू और गैरहिंदू दोनों समुदायों में स्थान प्राप्त है। जातियों के सूचीकरण का एक लंबा इतिहास है मनु के साथ इस इतिहास के प्रारंभिक काल की शुरुआत होती है। मध्ययुगीन वृतांतों में देश के विभिन्न में स्थित समुदायों के विवरण शामिल हैं। ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान, 1806 के बाद व्यापक पैमाने पर जातियों के सूचीकरण का काम किया गया था। 1881 से 1931 की जनगणना के दौरान इस प्रक्रिया में तेजी आई।


विंध्य के दक्षिण में प्रेसीडेंसी क्षेत्रों और रियासतों के एक बड़े क्षेत्र में पिछड़े वर्गों(बीसी) के लिए आज़ादी से बहुत पहले आरक्षण की शुरुआत हुई थी। महाराष्ट्र में कोल्हापुर केमहाराजा छत्रपति साहूजी महाराज ने 1902 में पिछड़े वर्ग से गरीबी दूर करने और राज्य प्रशासन में उन्हें उनकी हिस्सेदारी देने के लिए आरक्षण का प्रारंभ किया था। यह भारत में दलित वर्गों के कल्याण के लिए आरक्षण उपलब्ध कराने चाला पहला सरकारी आदेश है। पिछड़े वर्गों का आंदोलन भी सबसे पहले दक्षिण भारत विशेषकर तमिलनाडु में ज़ोर पकड़ा। देश के समाज सुधार को रेतामलई परिवार अयोथीदास, फुले, अबेडकर, साहूजी महाराज आदि ने सतत प्रयासों से अगड़े वर्ग द्वारा अपने और अछूतों के बीच बनायी गई दीवार को तोड़ने का प्रयास किया।


1882- हंटर आयोग की नियुक्ति हुई तो आयोग के सामने ज्योतिराव फुले ने निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा के साथ सरकारी नौकरियों में सभी के लिए आनुपातिक आरक्षणप्रतिनिधित्व की मांग की थी। आवनकोर के सामंती रियासत में 1891 के आरंभ में सार्वजनिक सेवा में योग्य मूल निवासियों की अनदेखी करके विदेशियों को भर्ती करने के खिलाफ प्रदर्शन के साथ सरकारी नौकरियों में आरक्षण के लिए मांग की गई। 1908 में अंग्रेजों द्वारा बहुत सारी जातियों और समुदायों के पक्ष में तथाप्रशासन में जिनका थोड़ा-बहुत हिस्सा था. उनके लिए भारत सरकार अधिनियम 1909 में आरक्षण शुरू किया गया। भारत सरकार अधिनियम 1919 में भी आरक्षण का प्रावधान किया गया था।


1935 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने प्रस्ताव पास किया जो पूना समझौता कहलाता है जिसमें दलित वर्ग के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र आवंटित किए गए। साथ ही भारत सरकार अधिनियम 1935 में आरक्षण का प्रावधान किया गया। 1942 में अंबेडकर ने अनुसूचित जातियों की उन्नति के समर्थन के लिए अखिल भारतीय दलित वर्ग महासघ की स्थापना की थी। उन्होंने सरकारी सेवाओं और शिक्षा के क्षेत्र में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण की मांग की थी1947 में भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात डॉ. में अंबेडकर को भारतीय संविधान के लिए मसौदा समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया।

भारतीय संविधान ने केवल धर्म, नस्ल, जाति, लिंग और जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध करता है बल्कि सभी नागरिकों के लिए समान अवसर प्रदान करते हुए सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों या अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की उन्नति के लिए संविधान में विशेष धाराएं भी रखी गई हैं। 10 सालों के लिए उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए अलग से निर्वाचन क्षेत्र आवंटित किए गए हैं। हर दस साल के बाद सांविधानिक संशोधन के जरिए इन्हें बढ़ा दिया जाता है।