पिछड़े वर्गों की समस्याएं - Backward Classes Problems

पिछड़े वर्गों की समस्याएं - Backward Classes Problems

गणेश पाण्डेय ने अपनी किताब भारतीय सामाजिक व्यवस्था में पिछड़े वर्गों की कुछ समस्याओं की चर्चा की है, जो विभिन्न सरकारी सुविधाओं के बावजूद भी आज बरकरार है। वे निम्नलिखित है.


भूमिहीन कृषक की समस्या: 


भारत के अधिकतर भाग में ऊंची जातियों का एकाधिकार माना जाता है।

इस कारण पिछड़े वर्गों के सदस्यों का भूमि पर अधिकार बहुत कम होता है। वे गांवों में अधिकतर भूमिहीन कृषक के रूप में ही बने रहते हैं एवं उस रूप में उन्हें उच्च जातियों के खेतों में कार्य करना पड़ता है। सुबह से शाम तक खेतों में कड़ी मेहनत करते हैं लेकिन उनको उनकी मेहनत का मेहनताना उसी रूप में नहीं मिलता। वे शोषण का शिकार बनते हैं वह उन मालिकों की दया पर अपना जीवनयापन करते हैं इसलिए उन्हें किसी भी प्रकार से आर्थिक रूप से समृद्ध होने का अवसर नहीं मिल पाता है।


व्यवसाय (पेशा) चुनने की समस्या पिछड़े वर्गों के सदस्य सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक तौर पर अन्य वर्गों से पिछड़े हुए होते हैं। इस कारणवश उनके सामने पेशों को चुनने की समस्या स्वतः ही उत्पन्न होती है। अच्छे किस्म के व्यवसाय को चुनने के लिए आर्थिक एवं शैक्षणिक तौर पर समृद्ध होना आवश्यक है, परंतु पिछड़े वर्ग के सदस्य इस मामले में पिछड़े हुए होते हैं इस कारणवश प्रतियोगी परीक्षाओं में वे अन्य वर्गों के साथ समान स्तर की प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाते हैं एवं उन्हें अच्छी नौकरियां नहीं मिल पाती है। उसी प्रकार से व्यवसाय भी शुरू नहीं कर पाते हैं। परिणामस्वरूप वे आर्थिक रूप से समृद्ध होने से वंचित रह जाते हैं।


श्रम विभाजन में विभिन्न स्थान: 


अपने पिछड़ेपन के कारण मिल, फैक्टरी आदि में पिछड़े वर्गों के सदस्यों को अच्छे पदों पर कम करने का अवसर ही नहीं मिल पाता है। उन्हें वहीं काम मिल पाते हैं जो निम्न स्तर के होते हैं। अर्थात श्रम विभाजन में उनके हिस्सों में अच्छे काम नहीं आते हैं। वे जिंदगी भर अकुशल श्रमिक ही बने रहते हैं। उन्हें वेतन कम मिलता है एवं उनकी आर्थिक स्थिति गिर जाती है। पारिश्रमिक की समस्या उन्हें काम का उचित पारिश्रमिक नहीं मिल पाता है। वे लोग जो गांव खेतों में काम कर रहें हैं, उन्हें नगद वेतन कम ही मिलता है। अधिकतर मामलो मेखत का मालिक उन्हें काम के बदले अनाज दे देता है जो की पर्याप्त नहीं होता है। गांव एवं शहरों में धोबी कुम्हार, नाई आदि अपना छोटा-छोटा धंधा करते हैं पर इससे कमाई बहुत कम होती है एवं उनके परिवार का भरण पोषण मुश्किल से ही हो पाता है। इस प्रकार से वे आर्थिक रूप में पिछड़े ही रह जाते हैं।


शिक्षा संबंधी समस्या 


अपने पिछड़ेपन के कारण पिछड़े वर्गों के लोग अपने बच्चों के लिए उचित शिक्षा का प्रबंध नहीं कर पाते हैं। वैसे भी भारत में शिक्षा विशेषकर उच्च एवं तकनीकी शिक्षा बहुत मंहगी है। उस शिक्षा तक पहुंचना पिछड़े वर्गों के बच्चों के लिए दूर का सपनासा लगता है। इस परिणामस्वरूप आर्थिक एवं सामाजिक दोनों स्तर पर ये बच्चे पिछड़ते चले जाते हैं एवं देश की प्रगति में सच्चे भागीदार नहीं बन पाते।


ऋणग्रस्तता की समस्या: 


अधिकतर पिछड़े वर्गों में आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण ऋणग्रस्तता की समस्या हमेशा बनी रहती है। उनकी आमदनी कम होने से वे भोजन कपड़ा एवं मकान की बुनियादी आवश्यकता भी उचित ढंग से पूरी नहीं कर पाते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि बीमारी जन्म, मृत्यु, विवाह, दुर्घटना आदि के समय उन्हें अनिवार्य रूप में उधार मांगकर अपनी आवश्यकताओं को पूरा करना होता है। यह कण वे अधिकतर साहूकार जमींदार या महाजनों से ले लेते हैं, जो कि एक और ब्याज की ऊंची दर पर ऋण देते हैं एवं दूसरी ओर ऋण के कागजात में हेगारी करके ऋण लेने वाले को हमेशा के लिए अपने चंगुल में फंसा लेते हैं। परिणामस्वरूप ऋण पीढ़ीदर-पीढ़ी चलता रहता है।

उच्च वर्गों द्वारा भेदभाव एवं अत्याचार की समस्या आजादी के बाद संवैधानिक तौर पर भारत के प्रत्येक नागरिक को समान दर्जा एवं समान अधिकार दिया गया ताकि भेदभाव एवं अत्याचार कम हो जाएगा एवं पिछड़े वर्गों को सामाजिक न्याय एवं बराबरी का दर्जामिल जाएगा, लेकिन वास्तव में ऐसा हुआ नहीं। उच्च वर्गों द्वारा पिछड़े वर्गों पर अनेक प्रकार की नियाँम्यताएं लादी जाती हैं बल्कि उनके प्रति भेदभाव एवं अत्याचार का सिलसिला भी जारी रखा जाता है। गांव में उच्च जातियों के हाथों में आर्थिक एवं राजनीतिक शक्तियाँ होती है तथा उसी शक्ति के बल पर वे गांव के निर्बल वर्गों पर अनेक प्रकार के अत्याचार करते हैं, उनकी बस्तियों में आग लगा देते हैं, उन्हें बेघर कर देते हैं बंदूक की नोक पर उनकी बहू-बेटियों की इज्जत लूटते हैं तोड़फोड़ एवं लूटपाट करते हैं। चुनाव के समय एक विशेष प्रत्याशी के पक्ष में जोर-जबरदस्ती वोट डलवाने के लिए पहले से ही अत्याचार एवं आतंक का माहौल भी बनवाते हैं।